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नवरात्र में गरबा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व: यूनेस्को मान्यता प्राप्त इस परंपरा के पीछे की पौराणिक कथा

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नवरात्र में गरबा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व: यूनेस्को मान्यता प्राप्त इस परंपरा के पीछे की पौराणिक कथा

सारांश

गरबा सिर्फ नृत्य नहीं — यह ब्रह्मांड के अनंत चक्र और मां दुर्गा की केंद्रीय शक्ति का जीवंत अनुभव है। संस्कृत के 'गर्भ' से जन्मी और दिसंबर 2023 में यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त इस परंपरा में तीन तालियाँ, गर्भ दीप और नंगे पाँव नृत्य हर कदम पर एक गहरा आध्यात्मिक संदेश देते हैं।

मुख्य बातें

' गरबा ' शब्द संस्कृत के ' गर्भ ' से बना है, जिसका अर्थ सृजन या गर्भाशय है।
गरबे का गोलाकार नृत्य जन्म, जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के अनंत चक्र का प्रतीक है; केंद्र में मां दुर्गा को स्थापित माना जाता है।
केंद्र में रखे मिट्टी के घड़े ' गरबो ' के भीतर जलता ' गर्भ दीप ' जीवन ऊर्जा का प्रतीक है।
गरबे की तीन तालियाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिशक्ति तथा मां अंबा की जागृति का प्रतीक हैं।
डांडिया रास में प्रयुक्त छड़ियाँ मां दुर्गा की तलवार — बुराई पर अच्छाई की विजय — का प्रतीक मानी जाती हैं।
दिसंबर 2023 में यूनेस्को ने गरबा को ' अमूर्त सांस्कृतिक विरासत ' की सूची में शामिल किया।

नवरात्र के पावन अवसर पर गरबा नृत्य केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि मां दुर्गा की शक्ति-उपासना का एक गहन आध्यात्मिक अनुष्ठान है, जिसे दिसंबर 2023 में यूनेस्को ने 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' की प्रतिष्ठित सूची में स्थान दिया। मूलतः गुजरात की पहचान रहा यह नृत्य आज पूरे भारत और विश्वभर में शक्ति-उपासना का पर्याय बन चुका है। नवरात्र के नौ दिनों में लाखों श्रद्धालु गरबे की गोलाकार लय में अपनी भक्ति और ऊर्जा को देवी के चरणों में अर्पित करते हैं।

गरबा का शाब्दिक और पौराणिक अर्थ

'गरबा' शब्द संस्कृत के 'गर्भ' से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है गर्भाशय अथवा सृजन। यह नाम इस नृत्य के केंद्र में रखे उस विशेष मिट्टी के घड़े से भी जुड़ा है, जिसे 'गरबो' कहते हैं। इस घड़े में छेद होता है और उसके भीतर एक जलता हुआ दीपक — जिसे 'गर्भ दीप' कहते हैं — रखा जाता है। यह दीपक जीवन की ऊर्जा और मां दुर्गा की अखंड शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

गोल घेरे में घूमकर किया जाने वाला यह नृत्य हिंदू दर्शन में जन्म, जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के अनंत चक्र का प्रतिनिधित्व करता है। इस चक्र के केंद्र में मां दुर्गा को ब्रह्मांड की आदिशक्ति और धुरी के रूप में स्थापित किया गया है।

तीन तालियाँ और डांडिया का प्रतीकात्मक अर्थ

गरबा के दौरान बजाई जाने वाली तीन तालियाँ त्रिदेव — ब्रह्मा (इच्छा शक्ति), विष्णु (कार्य शक्ति) और शिव (ज्ञान शक्ति) — के तीनों स्वरूपों तथा मां अंबा की जागृति का प्रतीक मानी जाती हैं। यह ताल-क्रम श्रद्धालु को मानसिक एकाग्रता और आध्यात्मिक जागरण की ओर ले जाता है।

नवरात्र में गरबे के साथ खेला जाने वाला डांडिया रास भी उतना ही प्रतीकात्मक है। इसमें प्रयुक्त छड़ियाँ (डंडे) मां दुर्गा की तलवार का प्रतीक मानी जाती हैं, जो बुराई पर अच्छाई की विजय को दर्शाती हैं।

नंगे पाँव नृत्य और सामाजिक समरसता

पारंपरिक रूप से गरबा नंगे पाँव किया जाता है, ताकि शरीर सीधे धरती की ऊर्जा से जुड़ सके। सनातन परंपरा में जूते-चप्पल सांसारिकता और अहंकार के प्रतीक माने जाते हैं; इन्हें उतारकर नृत्य करना समर्पण और विनम्रता को व्यक्त करता है — ठीक उसी तरह जैसे मंदिर या किसी पवित्र स्थान में प्रवेश के समय किया जाता है।

गरबे की गोलाकार संरचना में एक और सामाजिक संदेश भी निहित है। कोई भी व्यक्ति किसी भी समय इस वृत्त में सम्मिलित हो सकता है और बाहर आ सकता है — यह व्यवस्था समाज में भेदभाव की भावना को दूर करती है और भाईचारे, एकता तथा सामूहिक ऊर्जा को बढ़ावा देती है। गोल-गोल घूमने की लय शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

यूनेस्को की मान्यता और वैश्विक प्रसार

यह नृत्य-परंपरा मूल रूप से गुजरात से उत्पन्न हुई, किंतु आज यह भारत के हर कोने और विश्व के अनेक देशों में उत्साहपूर्वक मनाई जाती है। दिसंबर 2023 में यूनेस्को ने गरबा को अपनी 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' की सूची में शामिल किया, जो इस भारतीय परंपरा को वैश्विक मंच पर मिली सबसे बड़ी सांस्कृतिक स्वीकृति है।

गौरतलब है कि यह मान्यता ऐसे समय में मिली जब भारतीय सांस्कृतिक उत्सवों की वैश्विक उपस्थिति तेज़ी से बढ़ रही है। आने वाले नवरात्र उत्सवों में इस मान्यता के साथ गरबे का महत्व और गहरा होता जाएगा, और नई पीढ़ी इसे एक जीवंत धरोहर के रूप में आगे ले जाएगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इससे एक बड़ा प्रश्न भी उठता है — क्या हम इस परंपरा के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को वैश्विक मंच पर उतना ही सहेज पा रहे हैं जितना इसके मनोरंजन पक्ष को? गरबे की व्यावसायिक प्रस्तुतियों और 'डीजे गरबा' की बढ़ती लोकप्रियता के बीच, 'गर्भ दीप' और नंगे पाँव नृत्य की मूल पवित्रता अक्सर पीछे छूट जाती है। परंपरा की जड़ें तभी मज़बूत रहती हैं जब उत्सव और उपासना का संतुलन बना रहे — और यह ज़िम्मेदारी नई पीढ़ी पर उतनी ही है जितनी पुरानी पर।
RashtraPress
17 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवरात्र में गरबा क्यों किया जाता है?
नवरात्र में गरबा मां दुर्गा की शक्ति-उपासना का अनुष्ठानिक रूप है। गोलाकार नृत्य ब्रह्मांड के अनंत चक्र और मां की केंद्रीय शक्ति का प्रतीक है; नौ दिनों तक श्रद्धालु इस नृत्य के माध्यम से अपनी भक्ति और ऊर्जा देवी को अर्पित करते हैं।
गरबा शब्द का अर्थ क्या है?
'गरबा' शब्द संस्कृत के 'गर्भ' से बना है, जिसका अर्थ गर्भाशय या सृजन है। यह नाम उस मिट्टी के घड़े 'गरबो' से जुड़ा है जिसके भीतर जलता 'गर्भ दीप' रखा जाता है — यह दीपक जीवन ऊर्जा और मां दुर्गा की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
गरबे में तीन तालियाँ बजाने का क्या महत्व है?
गरबे की तीन तालियाँ त्रिदेव — ब्रह्मा (इच्छा शक्ति), विष्णु (कार्य शक्ति) और शिव (ज्ञान शक्ति) — के तीनों स्वरूपों तथा मां अंबा की जागृति का प्रतीक मानी जाती हैं। यह ताल-क्रम श्रद्धालु को आध्यात्मिक एकाग्रता की ओर ले जाता है।
यूनेस्को ने गरबा को कब और क्यों मान्यता दी?
दिसंबर 2023 में यूनेस्को ने गरबा को 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' की सूची में शामिल किया। यह मान्यता गरबे की सदियों पुरानी धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर स्वीकृति देती है।
गरबा नंगे पाँव क्यों किया जाता है?
पारंपरिक मान्यता के अनुसार जूते-चप्पल सांसारिकता और अहंकार के प्रतीक हैं। नंगे पाँव नृत्य करना समर्पण और विनम्रता दर्शाता है, साथ ही शरीर धरती की ऊर्जा से सीधे जुड़ता है — ठीक उसी तरह जैसे मंदिर में प्रवेश से पहले जूते उतारे जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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