गुजरात नवरात्रि: राजकोट में 19 साल पुरानी 'इंधोनी रास' और जामनगर में 52 साल पुरानी 'स्वास्तिक अंगारा रास' परंपरा
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के राजकोट और जामनगर में नवरात्रि 2026 के अवसर पर पारंपरिक रास की ऐसी अनूठी झलकियाँ सामने आई हैं, जो इस त्योहार को गरबा और डांडिया से कहीं आगे ले जाती हैं। एक ओर जलती हुई इंधोनी सिर पर रखकर नृत्य किया जाता है, तो दूसरी ओर धधकते अंगारों के बीच स्वास्तिक की आकृति में रास प्रस्तुत होती है — आस्था, साहस और संस्कृति का यह संगम श्रद्धालुओं और विदेशी पर्यटकों दोनों को समान रूप से मंत्रमुग्ध कर देता है।
राजकोट में 'इंधोनी रास' की 19 साल पुरानी परंपरा
राजकोट के मावड़ी चौक पर श्री बजरंग गरबी मंडल की ओर से नवरात्रि के दौरान प्रतिवर्ष 'आग वाली इंधोनी रास' प्रस्तुत की जाती है। यह परंपरा 19 वर्षों से अनवरत चली आ रही है। इस विशेष रास में कलाकार सिर पर जलती हुई इंधोनी और गरबे के घड़े संतुलित करते हुए, हाथों में जलती मशालें थामे लगभग 20 मिनट तक लगातार गरबा करते हैं।
आग के बीच ताल और लय बनाए रखना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है, जिसके लिए कलाकार महीनों पहले से तैयारी करते हैं। इस रास में भाग लेने वाली एक युवती ने बताया, 'हमें इस रास के लिए दो महीने से ज़्यादा अभ्यास करना पड़ता है। मेरे माता-पिता को मुझ पर बहुत गर्व है और इसे करते समय ऐसा लगता है जैसे देवी नवदुर्गा हमारे साथ ही नाच रही हों।'
जामनगर में 52 साल पुराना 'स्वास्तिक अंगारा रास'
जामनगर में श्री रंडाल अंबिका कुमारिका गरबी मंडल की 52 साल पुरानी परंपरा नवरात्रि को और विशेष बनाती है। यहाँ का 'स्वास्तिक अंगारा रास' अपनी अनूठी शैली के लिए जाना जाता है, जिसमें पारंपरिक परिधानों में सजे युवा कलाकार जलती हुई लकड़ियों और धधकते अंगारों के बीच स्वास्तिक की आकृति बनाते हुए रास प्रस्तुत करते हैं।
गरबी मंडल के आयोजक सुरेश गोंडालिया के अनुसार, पिछले 52 वर्षों से यह आयोजन निर्बाध जारी है। स्वास्तिक रास के अतिरिक्त मशाल रास, सड़क तीन-तन्नी रास और डाकला रास जैसी पारंपरिक प्रस्तुतियाँ भी इस उत्सव का अभिन्न अंग हैं।
दर्शकों और विदेशी पर्यटकों की भारी भागीदारी
इन दोनों अनूठे आयोजनों को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक उमड़ते हैं। कई श्रद्धालु और उत्सुक दर्शक आसपास की ऊँची जगहों पर खड़े होकर इस नज़ारे का आनंद लेते हैं। उल्लेखनीय है कि जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका सहित विभिन्न देशों से आए विदेशी पर्यटक भी इन परंपराओं में गहरी रुचि दिखाते हैं, जो गुजरात की सांस्कृतिक विरासत की वैश्विक पहुँच को दर्शाता है।
आस्था और साहस का प्रतीक
गौरतलब है कि ये परंपराएँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे इन आयोजनों में युवा कलाकारों की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि ये अनूठी परंपराएँ आने वाले वर्षों में भी जीवित रहें। यह ऐसे समय में आया है जब नवरात्रि का वैश्विक स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है और पारंपरिक रूपों को संरक्षित करने की चिंता बढ़ती जा रही है।