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किशोर कुमार की पुण्यतिथि: वह आवाज़ जो 37 साल बाद भी करोड़ों दिलों में गूँजती है

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किशोर कुमार की पुण्यतिथि: वह आवाज़ जो 37 साल बाद भी करोड़ों दिलों में गूँजती है

सारांश

13 अक्टूबर को किशोर कुमार की 37वीं पुण्यतिथि है — वह आवाज़ जो प्यार, दर्द और मस्ती को एक साथ बयाँ कर सकती थी। खंडवा से मुंबई तक का सफर, आपातकाल में सत्ता से टकराने का साहस और बेमिसाल अतरंगी अंदाज़ — किशोर दा आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

मुख्य बातें

किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में हुआ; असली नाम आभास कुमार गांगुली था।
उन्होंने 1948 में फ़िल्म 'जिद्दी' से हिंदी फ़िल्मी गायकी की शुरुआत की।
आपातकाल (1975-77) के दौरान सरकारी कार्यक्रम में गाने से इनकार पर ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर उनके गीतों का प्रसारण बंद किया गया।
उन्होंने हिंदी के अलावा बंगाली, मराठी, गुजराती, असमिया, कन्नड़ और भोजपुरी में भी गाने गाए।
उनके चार विवाह हुए — रूमा गुहा ठाकुरता, मधुबाला, योगिता बाली और लीना चंदावरकर ।
13 अक्टूबर 1987 को उनका निधन हुआ; आज उनकी 37वीं पुण्यतिथि है।

हिंदी सिनेमा के अमर गायक किशोर कुमार को आज 13 अक्टूबर को उनकी 37वीं पुण्यतिथि पर याद किया जा रहा है। 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे इस बहुआयामी कलाकार की आवाज़ ने रोमांस, विरह और उल्लास — हर भाव को ऐसी गहराई दी कि दशकों बाद भी उनके गीत नई पीढ़ी की ज़ुबान पर हैं। 13 अक्टूबर 1987 को उनके निधन के साथ हिंदी संगीत का एक युग समाप्त हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी उतनी ही ताज़ी है।

खंडवा से मुंबई तक का सफ़र

किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। उनके बड़े भाई अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के स्थापित अभिनेता थे, और घर के फ़िल्मी माहौल ने किशोर दा को मनोरंजन जगत की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित किया। उन्होंने 1948 में फ़िल्म 'जिद्दी' के लिए पहला हिंदी फ़िल्मी गाना गाया और उसके बाद संगीत की दुनिया में एक ऐसी पहचान बनाई जो आज तक अटूट है।

गौरतलब है कि किशोर कुमार ने कभी औपचारिक संगीत प्रशिक्षण नहीं लिया। उनकी प्रतिभा सहज और अकादमिक परंपरा से परे थी — यही उनकी गायकी को बाकी सबसे अलग बनाता था।

गायकी का विस्तार: हर भाषा, हर भाव

'मेरे सपनों की रानी', 'रूप तेरा मस्ताना', 'ओ मेरे दिल के चैन', 'पल पल दिल के पास', 'जिंदगी एक सफर है सुहाना' और 'आने वाला पल जाने वाला है' — ये गीत किशोर दा की बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण हैं। रोमांटिक धुनें हों, दर्द भरे नग़मे हों या उन्मुक्त मस्ती के गीत — उनकी आवाज़ हर रंग में ढल जाती थी।

उन्होंने केवल हिंदी तक खुद को सीमित नहीं रखा। बंगाली, मराठी, गुजराती, असमिया, कन्नड़ और भोजपुरी सहित कई भाषाओं में उन्होंने गाने गाए। यह विविधता उन्हें उपमहाद्वीप के सर्वाधिक लोकप्रिय गायकों में शुमार करती है।

अतरंगी अंदाज़ और यादगार किस्से

किशोर कुमार का व्यक्तित्व उनकी गायकी जितना ही अनूठा था। जहाँ आमतौर पर लोग अपने घर के बाहर 'कुत्तों से सावधान' का बोर्ड लगाते हैं, वहीं किशोर दा ने अपने घर के बाहर 'किशोर कुमार से सावधान' लिखवा रखा था — यह उनकी बेफ़िक्र जीवनशैली का सटीक प्रतीक था।

फ़िल्म निर्माता आरसी तलवार से जुड़ा एक मशहूर किस्सा आज भी इंडस्ट्री में दोहराया जाता है। कहा जाता है कि जब तलवार पर उनके कुछ पैसे बकाया रहे, तो किशोर दा रोज़ सुबह उनके घर पहुँचकर ज़ोर से पुकारते थे — 'हे तलवार, दे दे मेरे आठ हज़ार।' यह किस्सा उनकी बेबाकी और निडरता का उदाहरण बन गया।

आपातकाल और विरोध का साहस

किशोर कुमार की जीवनगाथा का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय 1975-77 के आपातकाल से जुड़ा है। बताया जाता है कि उन्होंने सरकार के एक कार्यक्रम के लिए गाने का अनुरोध अस्वीकार कर दिया था। इसके प्रत्युत्तर में ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर उनके गीतों के प्रसारण पर रोक लगा दी गई। यह ऐसे समय में आया जब अधिकांश कलाकार दबाव में झुक जाते थे — किशोर दा का यह रुख उनके स्वाभिमान का प्रतीक बन गया।

निजी जीवन और विरासत

किशोर कुमार की निजी ज़िंदगी भी उतनी ही विविधरंगी रही। उन्होंने चार विवाह किए — पहली पत्नी रूमा गुहा ठाकुरता, फिर अभिनेत्री मधुबाला, उसके बाद योगिता बाली और अंत में लीना चंदावरकर।

13 अक्टूबर 1987 को किशोर कुमार का निधन हुआ, किंतु उनकी आवाज़ आज भी करोड़ों श्रोताओं के दिलों में जीवित है। वह ऐसे विरले कलाकार थे जिन्होंने गीत-संगीत को महज़ पेशे के रूप में नहीं, बल्कि जीवन दर्शन के रूप में जिया। उनकी पुण्यतिथि पर भारतीय संगीत-प्रेमी एक बार फिर उनके गीतों में डूबकर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

और इसकी कीमत उन्होंने अपने करियर के सबसे उत्पादक दौर में रेडियो-प्रतिबंध झेलकर चुकाई। यह विडंबना है कि मुख्यधारा की श्रद्धांजलियाँ अक्सर उनके गीतों तक सीमित रह जाती हैं, जबकि उनका सांस्कृतिक प्रतिरोध उतना ही महत्त्वपूर्ण है। बिना औपचारिक प्रशिक्षण के कई भाषाओं में महारत हासिल करने वाला यह कलाकार संस्थागत संगीत शिक्षा की सीमाओं पर भी एक गहरा सवाल छोड़ जाता है।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

किशोर कुमार की पुण्यतिथि कब है और उनका निधन कैसे हुआ?
किशोर कुमार का निधन 13 अक्टूबर 1987 को हुआ था। इस वर्ष उनकी 37वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है। उनकी मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई थी।
किशोर कुमार का असली नाम और जन्मस्थान क्या था?
किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। उनका जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा शहर में हुआ था। उनके बड़े भाई अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता थे।
किशोर कुमार पर आपातकाल के दौरान प्रतिबंध क्यों लगाया गया था?
बताया जाता है कि 1975-77 के आपातकाल के दौरान किशोर कुमार ने सरकार के एक कार्यक्रम के लिए गाने का अनुरोध अस्वीकार कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर उनके गीतों के प्रसारण पर रोक लगा दी गई।
किशोर कुमार ने कितनी शादियाँ कीं और उनके जीवनसाथी कौन थे?
किशोर कुमार ने अपने जीवन में चार विवाह किए। उनकी पहली पत्नी रूमा गुहा ठाकुरता , दूसरी पत्नी अभिनेत्री मधुबाला , तीसरी पत्नी योगिता बाली और चौथी पत्नी लीना चंदावरकर थीं।
किशोर कुमार के कौन-से गाने सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हैं?
' मेरे सपनों की रानी ', ' रूप तेरा मस्ताना ', ' ओ मेरे दिल के चैन ', ' पल पल दिल के पास ', ' जिंदगी एक सफर है सुहाना ' और ' आने वाला पल जाने वाला है ' उनके सर्वाधिक चर्चित गीतों में शामिल हैं। उन्होंने हिंदी के अलावा बंगाली, मराठी, गुजराती समेत कई भाषाओं में भी गाने गाए।
राष्ट्र प्रेस
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