कुमारी नाज: गरीबी से 'बूट पॉलिश' की शोहरत तक, सेट पर सुब्बिराज से रचाई थी शादी
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा की बाल कलाकार कुमारी नाज — जिनका असली नाम सलमा बेग था — का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था। उनके पिता मिर्जा दाऊद बेग फिल्म लेखक थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमज़ोर थी, जिसके चलते सलमा को बचपन में ही मंच पर नृत्य प्रस्तुत कर परिवार का बोझ उठाना पड़ा। मात्र आठ वर्ष की उम्र में शुरू हुआ उनका फ़िल्मी सफर आगे चलकर कान फिल्म फेस्टिवल तक पहुँचा और उन्हें बॉलीवुड की सबसे महँगी बाल कलाकार का दर्जा दिलाया।
बचपन का संघर्ष और फिल्मों में प्रवेश
एक साक्षात्कार में कुमारी नाज ने खुलासा किया था कि उनकी माँ उनके साथ शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्व्यवहार करती थीं और उन्हें अपने आराम के लिए काम करने पर मजबूर किया जाता था। इस कठिन पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद लगभग आठ साल की उम्र में उन्हें फिल्म 'रेशम' (1952) में काम मिला और तभी उनका नाम सलमा से बदलकर नाज रखा गया।
इसके बाद 'बूट पॉलिश' (1954) ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। फिल्म में उनके अभिनय की व्यापक सराहना हुई और 1955 के कान फिल्म फेस्टिवल में उन्हें विशेष सम्मान प्रदान किया गया। उस दौर में वे बॉलीवुड की सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाली बाल कलाकार मानी जाती थीं।
हिंदी और भोजपुरी सिनेमा में विस्तार
कुमारी नाज ने 'देवदास', 'दो फूल', 'कागज के फूल', 'गंगा जमुना', 'कटी पतंग', 'बहू बेगम' और 'सच्चा झूठा' जैसी प्रतिष्ठित हिंदी फिल्मों में भी भूमिकाएँ निभाईं। बड़े होने पर उन्होंने चरित्र भूमिकाओं की ओर रुख किया।
1963 में प्रदर्शित 'बिदेसिया' के साथ उन्होंने भोजपुरी सिनेमा में कदम रखा और इस क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई। 'सैंया से नेहा लगाइबे' और 'अईल बसंत बहार' में मुख्य भूमिकाएँ निभाकर वे भोजपुरी सिनेमा की चर्चित अभिनेत्रियों में शुमार हो गईं।
फिल्म सेट पर प्रेम और अनोखी शादी
1963 में रिलीज़ फिल्म 'देखा प्यार तुम्हारा' की शूटिंग प्रतापगढ़ के एक किले में चल रही थी। फिल्म में हीरो की भूमिका में थे सुब्बिराज — जो दिग्गज अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के भांजे थे। शूटिंग के दौरान सुब्बिराज और कुमारी नाज के बीच घनिष्ठता बढ़ती गई और यह मुलाकात धीरे-धीरे प्रेम में बदल गई।
इस रिश्ते के रास्ते में दो बड़ी अड़चनें थीं — दोनों का अलग धर्म और यह तथ्य कि नाज की आय पर उनका पूरा परिवार निर्भर था। इन चुनौतियों के बावजूद सुब्बिराज ने एक दिन शूटिंग के दौरान ही कुमारी नाज की मांग में सिंदूर भरकर उनसे विवाह कर लिया। उस समय इस खबर ने फिल्म इंडस्ट्री में खलबली मचा दी थी। विवाह के बाद नाज ने हिंदू धर्म अपनाया और अपना नाम बदलकर 'अनुराधा' रख लिया।
श्रीदेवी की आवाज़ और करियर का अंतिम दौर
जब श्रीदेवी हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बना रही थीं, उस दौर में कुमारी नाज ने उनकी शुरुआती हिंदी फिल्मों के लिए पार्श्व आवाज़ दी। कई रिपोर्टों के अनुसार 'हिम्मतवाला', 'मवाली' और 'तोहफा' जैसी फिल्मों में परदे पर श्रीदेवी दिखती थीं, लेकिन उनकी आवाज़ नाज की होती थी।
जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने अभिनय से दूरी बना ली और डबिंग का कार्य करती रहीं। 19 अक्टूबर 1995 को 51 वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया। उनकी कहानी भारतीय सिनेमा के उस स्वर्णिम युग की याद दिलाती है जब बाल कलाकारों ने अपनी प्रतिभा से अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रोशन किया।