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कुमारी नाज: 'बेबी नाज' से श्रीदेवी की आवाज तक, हिंदी सिनेमा की अनसुनी दास्तान

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कुमारी नाज: 'बेबी नाज' से श्रीदेवी की आवाज तक, हिंदी सिनेमा की अनसुनी दास्तान

सारांश

चार साल की उम्र में कैमरे के सामने खड़ी हुईं, कान फेस्टिवल तक पहुँचीं, फिर श्रीदेवी की आवाज़ बनीं — कुमारी नाज का सफर हिंदी सिनेमा की उस पीढ़ी की कहानी है जिसने परदे के पीछे रहकर इतिहास रचा।

मुख्य बातें

कुमारी नाज (असली नाम: सलमा बेग ) का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ; करीब चार साल की उम्र से अभिनय शुरू किया।
1954 की फिल्म 'बूट पॉलिश' को 1955 के कान फिल्म फेस्टिवल में प्रतियोगिता के लिए चुना गया; नाज को विशेष सम्मान मिला।
'देवदास' , 'कागज़ के फूल' , 'सच्चा झूठा' , 'कटी पतंग' सहित दर्जनों हिंदी और भोजपुरी फिल्मों में अभिनय किया।
रिपोर्टों के अनुसार, श्रीदेवी की शुरुआती हिंदी फिल्मों — 'हिम्मतवाला' , 'मवाली' , 'तोहफा' — के लिए डबिंग की।
अभिनेता सुबीराज से विवाह; 19 अक्टूबर 1995 को 51 वर्ष की आयु में लिवर रोग से निधन।

हिंदी सिनेमा की बाल कलाकार कुमारी नाज — जिनका असली नाम सलमा बेग था — का सफर महज चार साल की उम्र से शुरू होकर डबिंग स्टूडियो तक फैला, जहाँ उन्होंने श्रीदेवी की शुरुआती हिंदी फिल्मों को अपनी आवाज़ दी। 20 अगस्त 1944 को मुंबई में जन्मी नाज ने बचपन की मासूमियत को पर्दे पर उतारकर जो छाप छोड़ी, वह दशकों बाद भी धुंधली नहीं पड़ी।

बचपन और संघर्ष की शुरुआत

कुमारी नाज के पिता मिर्ज़ा दाऊद बेग लेखक थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी। इसी मजबूरी ने नाज को करीब चार साल की उम्र में ही कैमरे के सामने खड़ा कर दिया। जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, उस उम्र में उनका समय शूटिंग सेट पर बीतता था — यह त्याग आगे चलकर उनकी पहचान का आधार बना।

मुख्य घटनाक्रम: 'बूट पॉलिश' और अंतरराष्ट्रीय पहचान

बाल कलाकार के रूप में नाज ने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन 1954 में आई फिल्म 'बूट पॉलिश' उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुई। फिल्म में उन्होंने बेलू नाम की बच्ची का किरदार निभाया, जिसकी भावपूर्ण अदाकारी ने देश-विदेश में तारीफ बटोरी। इस फिल्म को 1955 के कान फिल्म फेस्टिवल में प्रतियोगिता खंड में चुना गया और कुमारी नाज को उनके अभिनय के लिए विशेष सम्मान प्राप्त हुआ।

इसके बाद उन्होंने 'देवदास', 'मुसाफिर', 'लाजवंती', 'दो फूल' और 'कागज़ के फूल' जैसी चर्चित फिल्मों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। गौरतलब है कि यह वह दौर था जब हिंदी सिनेमा अपने स्वर्णिम युग में था और नाज उसकी एक महत्वपूर्ण कड़ी थीं।

बड़े पर्दे पर सहायक भूमिकाएँ और भोजपुरी में पहचान

उम्र बढ़ने के साथ नाज ने हिंदी फिल्मों में सहायक भूमिकाएँ निभाईं। 1970 में आई 'सच्चा झूठा' में उन्होंने राजेश खन्ना की बहन का किरदार अदा किया। 'बहू बेगम', 'कटी पतंग' और 'हाथी मेरे साथी' जैसी फिल्मों में भी उनकी भूमिकाएँ उल्लेखनीय रहीं। हालाँकि, दर्शकों के मन में 'बेबी नाज' की बनी-बनाई छवि से बाहर निकलना उनके लिए एक चुनौती बनी रही।

इसी दौरान उन्होंने भोजपुरी सिनेमा की ओर रुख किया। 1963 में आई 'बिदेसिया' ने उन्हें भोजपुरी दर्शकों के बीच एक नई पहचान दी। इसके बाद 'सैंया से नेहा लगाइबे' और 'अईल बसंत बहार' जैसी फिल्मों में मुख्य भूमिकाएँ निभाकर वह भोजपुरी सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शुमार हो गईं।

श्रीदेवी की आवाज़ बनीं कुमारी नाज

करियर का सबसे अप्रत्याशित और दिलचस्प मोड़ तब आया जब अभिनय के अवसर धीरे-धीरे सिमटने लगे। नाज ने डबिंग आर्टिस्ट के रूप में अपनी नई पारी शुरू की। यह ऐसे समय में आया जब श्रीदेवी दक्षिण भारतीय सिनेमा से हिंदी फिल्मों में अपनी जगह बना रही थीं। रिपोर्टों के अनुसार, कुमारी नाज ने श्रीदेवी की शुरुआती हिंदी फिल्मों — जिनमें 'हिम्मतवाला', 'मवाली' और 'तोहफा' का विशेष उल्लेख मिलता है — के लिए डबिंग की। पर्दे पर श्रीदेवी की छवि थी, लेकिन आवाज़ के पीछे कुमारी नाज की साधना थी — यही उनकी कला की असली परीक्षा थी।

निजी जीवन और विरासत

निजी जीवन में कुमारी नाज ने अभिनेता सुबीराज से विवाह किया। दोनों की मुलाकात फिल्म 'देखा प्यार तुम्हारा' के दौरान हुई थी। उनके दो बच्चे हुए। सुबीराज का संबंध कपूर परिवार से बताया जाता है।

19 अक्टूबर 1995 को मात्र 51 वर्ष की आयु में कुमारी नाज का निधन हो गया। उनके निधन का कारण गंभीर लिवर रोग बताया जाता है। उनका जाना हिंदी सिनेमा के उस दौर की एक अनमोल कड़ी का टूटना था, जब प्रतिभा को चमक-दमक से नहीं, बल्कि समर्पण से मापा जाता था।

संपादकीय दृष्टिकोण

वे अक्सर परदे के पीछे चले जाते हैं। श्रीदेवी जैसी महानायिका की आवाज़ बनना तकनीकी रूप से असाधारण उपलब्धि थी, फिर भी यह श्रेय दशकों तक अनकहा रहा। यह सवाल उठता है कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में डबिंग आर्टिस्टों के योगदान को वह मान्यता क्यों नहीं मिली जो पात्र थे। नाज का सफर केवल एक कलाकार की जीवनगाथा नहीं, बल्कि उस पूरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है जिसने चमक-दमक के बिना सिनेमा की नींव रखी।
RashtraPress
19 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कुमारी नाज कौन थीं और उनका असली नाम क्या था?
कुमारी नाज हिंदी और भोजपुरी सिनेमा की अभिनेत्री व डबिंग आर्टिस्ट थीं, जिनका असली नाम सलमा बेग था। उनका जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ और उन्होंने बाल कलाकार 'बेबी नाज' के रूप में करियर शुरू किया।
'बूट पॉलिश' फिल्म कुमारी नाज के करियर के लिए क्यों खास थी?
1954 में आई 'बूट पॉलिश' में कुमारी नाज ने 'बेलू' नाम की बच्ची का किरदार निभाया, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। इस फिल्म को 1955 के कान फिल्म फेस्टिवल में प्रतियोगिता के लिए चुना गया और नाज को विशेष सम्मान मिला।
कुमारी नाज ने श्रीदेवी के लिए किन फिल्मों में डबिंग की?
रिपोर्टों के अनुसार, कुमारी नाज ने श्रीदेवी की शुरुआती हिंदी फिल्मों के लिए डबिंग की, जिनमें 'हिम्मतवाला', 'मवाली' और 'तोहफा' का विशेष उल्लेख मिलता है। उस दौर में श्रीदेवी हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बना रही थीं और नाज की आवाज़ उनकी परदे पर उपस्थिति का अहम हिस्सा थी।
कुमारी नाज का भोजपुरी सिनेमा में क्या योगदान रहा?
कुमारी नाज ने 1963 में आई भोजपुरी फिल्म 'बिदेसिया' से इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। इसके बाद 'सैंया से नेहा लगाइबे' और 'अईल बसंत बहार' जैसी फिल्मों में मुख्य भूमिकाएँ निभाकर वह भोजपुरी सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगीं।
कुमारी नाज का निधन कब और किस कारण हुआ?
कुमारी नाज का निधन 19 अक्टूबर 1995 को 51 वर्ष की आयु में हुआ। उनके निधन का कारण गंभीर लिवर रोग बताया जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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