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'दोस्ती' के अभिनेता सुशील कुमार: ₹300 की मासिक तनख्वाह और 3 साल के कॉन्ट्रैक्ट से बदली तकदीर

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'दोस्ती' के अभिनेता सुशील कुमार: ₹300 की मासिक तनख्वाह और 3 साल के कॉन्ट्रैक्ट से बदली तकदीर

सारांश

₹300 की मासिक तनख्वाह और 3 साल के कॉन्ट्रैक्ट से शुरू हुई सुशील कुमार की कहानी 'दोस्ती' (1964) के ज़रिए राष्ट्रीय पुरस्कार और मॉस्को फिल्म महोत्सव तक पहुँची — और फिर परदे से हटकर एयर इंडिया की वर्दी तक। एक किरदार, एक फिल्म, पर अमर पहचान।

मुख्य बातें

सुशील कुमार का जन्म 4 जुलाई 1945 को कराची में हुआ; विभाजन के बाद परिवार 1953 में मुंबई आया।
राजश्री प्रोडक्शंस ने उन्हें 3 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर साइन किया और ₹300 प्रति माह वेतन दिया।
फिल्म 'दोस्ती' (1964) को हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार और 1965 के फिल्मफेयर में कई सम्मान मिले।
फिल्म को मॉस्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी प्रदर्शित किया गया।
फिल्मों से दूरी बनाने के बाद सुशील कुमार ने एयर इंडिया में नौकरी की और 2003 में सेवानिवृत्त हुए।
1973 में देव आनंद की फिल्म 'हीरा पन्ना' में वे अपने असली पद फ्लाइट पर्सर के रूप में दिखाई दिए।

अभिनेता सुशील कुमार उन विरले कलाकारों में से हैं जिन्होंने एकमात्र प्रमुख फिल्म से ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि छह दशक बाद भी उनका नाम उसी किरदार के साथ जीवित है। 1964 में रिलीज हुई फिल्म 'दोस्ती' ने उन्हें हिंदी सिनेमा के इतिहास में दर्ज कर दिया — लेकिन इस मुकाम तक पहुँचने की राह न तो सीधी थी, न आसान।

विभाजन की पीड़ा से मुंबई तक का सफर

सुशील कुमार का जन्म 4 जुलाई 1945 को कराची के एक सिंधी परिवार में हुआ था। देश के बँटवारे के बाद परिवार सबकुछ पीछे छोड़कर भारत आ गया। पहले गुजरात के नवसारी में बसने की कोशिश हुई, लेकिन वहाँ कारोबार जम नहीं सका। अंततः 1953 में परिवार मुंबई के चेंबूर में आकर टिका। यहाँ पढ़ाई के साथ-साथ बचपन से पला नृत्य का शौक भी परवान चढ़ता रहा — स्कूली कार्यक्रमों और त्योहारी आयोजनों में सुशील की उपस्थिति नियमित रहती थी।

परिवार के एक परिचित, जो फिल्म उद्योग से जुड़े थे, ने उनकी माँ को सलाह दी कि सुशील की प्रतिभा को परदे पर आज़माया जाए। घर की आर्थिक तंगी को देखते हुए माँ ने सहमति दे दी — और यहीं से एक नई कहानी शुरू हुई।

बाल कलाकार से लेकर 'दोस्ती' तक

सुशील कुमार ने 1958 में सिंधी फिल्म 'अबाना' से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। इसके बाद बाल कलाकार के रूप में उन्होंने 'फिर सुबह होगी', 'धूल का फूल', 'काला बाजार', 'श्रीमान सत्यवादी', 'दिल भी तेरा हम भी तेरे', 'संपूर्ण रामायण', 'एक लड़की सात लड़के' और 'फूल बने अंगारे' जैसी फिल्मों में काम किया।

असली मोड़ तब आया जब राजश्री प्रोडक्शंस के मालिक ताराचंद बड़जात्या अपनी आगामी फिल्म 'दोस्ती' के लिए दो युवा चेहरों की तलाश में थे। बताया जाता है कि उनकी बेटी राजश्री ने फिल्म 'फूल बने अंगारे' में सुशील कुमार का अभिनय देखा और वह उनकी अदाकारी से प्रभावित हुईं। उन्होंने अपने पिता को सुशील का नाम सुझाया।

₹300 की तनख्वाह और तीन साल का कॉन्ट्रैक्ट

राजश्री प्रोडक्शंस ने सुशील कुमार के साथ तीन साल का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया और उन्हें ₹300 प्रति माह का वेतन तय किया गया। आज की दृष्टि से यह राशि नगण्य लग सकती है, लेकिन उस दौर में किसी नवोदित कलाकार के लिए यह एक निश्चित और सम्मानजनक आय थी — जिसने परिवार को आर्थिक सहारा भी दिया। किसी नए चेहरे के साथ इस तरह का दीर्घकालिक करार उस समय अपने आप में असाधारण था।

'दोस्ती': एक फिल्म जो इतिहास बन गई

1964 में रिलीज हुई 'दोस्ती' में सुशील कुमार ने बैसाखी के सहारे चलने वाले रामनाथ का किरदार निभाया, जबकि सुधीर कुमार ने उनके नेत्रहीन मित्र मोहन की भूमिका अदा की। दोनों की सहज और भावपूर्ण अदाकारी ने दर्शकों के दिल को छू लिया। फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने तैयार किया और मोहम्मद रफी की आवाज़ में गाए गीत आज भी लोकप्रिय हैं।

फिल्म की सफलता केवल व्यावसायिक नहीं थी — इसे हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 1965 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में इसने सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ कहानी, सर्वश्रेष्ठ संवाद, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन और सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायन सहित कई बड़े सम्मान जीते। फिल्म को प्रतिष्ठित मॉस्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी प्रदर्शित किया गया।

परदे से परे: एयर इंडिया और नई पारी

'दोस्ती' की अपार सफलता के बाद कई फिल्मों के प्रस्ताव आए, लेकिन अलग-अलग कारणों से वे आगे नहीं बढ़ सके। धीरे-धीरे सुशील कुमार ने फिल्मों से दूरी बनाई, अपनी पढ़ाई पूरी की और एयर इंडिया में नौकरी शुरू की। 2003 में वे सेवानिवृत्त हुए। एक दिलचस्प संयोग यह भी रहा कि नौकरी के दौरान 1973 में देव आनंद की फिल्म 'हीरा पन्ना' की विमान में हुई शूटिंग के एक दृश्य में वे अपने वास्तविक पद — फ्लाइट पर्सर — के रूप में कैमरे के सामने आए। सुशील कुमार की यह यात्रा बताती है कि कभी-कभी एक ही भूमिका किसी कलाकार की पूरी पहचान बन जाती है — और वह पहचान समय की कसौटी पर खरी उतरती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बिना सोशल मीडिया, बिना मार्केटिंग मशीनरी के। यह भी उल्लेखनीय है कि 'दोस्ती' जैसी संवेदनशील फिल्म ने राष्ट्रीय पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय मंच दोनों एक साथ हासिल किए — जो आज के व्यावसायिक दबाव में दुर्लभ संयोग है। सुशील कुमार का फिल्मों से एयर इंडिया तक का सफर यह भी रेखांकित करता है कि उस युग में फिल्मी सफलता कोई स्थायी आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं थी।
RashtraPress
3 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुशील कुमार कौन हैं और 'दोस्ती' में उनका किरदार क्या था?
सुशील कुमार हिंदी और सिंधी फिल्मों के अभिनेता हैं, जो 1964 की फिल्म 'दोस्ती' में बैसाखी के सहारे चलने वाले रामनाथ की भूमिका के लिए जाने जाते हैं। इस फिल्म ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई और यह किरदार आज भी उनकी पहचान बना हुआ है।
राजश्री प्रोडक्शंस ने सुशील कुमार को कितनी तनख्वाह और किस शर्त पर साइन किया था?
राजश्री प्रोडक्शंस ने सुशील कुमार को 3 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर साइन किया और ₹300 प्रति माह वेतन तय किया गया। उस दौर में किसी नवोदित कलाकार के लिए इस तरह का दीर्घकालिक करार एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।
'दोस्ती' फिल्म को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
'दोस्ती' (1964) को हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 1965 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में इसने सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ कहानी, सर्वश्रेष्ठ संवाद, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन और सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायन सहित कई सम्मान जीते। फिल्म को मॉस्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी प्रदर्शित किया गया।
सुशील कुमार ने फिल्मों के बाद क्या किया?
'दोस्ती' के बाद फिल्मी करियर आगे न बढ़ने पर सुशील कुमार ने एयर इंडिया में नौकरी शुरू की और 2003 में सेवानिवृत्त हुए। 1973 में देव आनंद की फिल्म 'हीरा पन्ना' की विमान-शूटिंग में वे अपने वास्तविक पद फ्लाइट पर्सर के रूप में भी कैमरे के सामने आए।
सुशील कुमार को 'दोस्ती' के लिए कैसे चुना गया?
राजश्री प्रोडक्शंस के मालिक ताराचंद बड़जात्या की बेटी राजश्री ने फिल्म 'फूल बने अंगारे' में सुशील कुमार का अभिनय देखा और वह उनसे प्रभावित हुईं। उन्होंने अपने पिता को सुशील का नाम सुझाया, जिसके बाद उन्हें 'दोस्ती' के लिए साइन किया गया।
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