जगदीप की पुण्यतिथि: 'सूरमा भोपाली' से हिंदी सिनेमा को अमर हास्य देने वाले इश्तियाक अहमद जाफरी को याद
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के अविस्मरणीय हास्य अभिनेता जगदीप (पूरा नाम इश्तियाक अहमद जाफरी) की 8 जुलाई 2020 को मुंबई स्थित उनके निवास पर निधन हुई थी। 29 मार्च 1939 को जन्मे इस फनकार ने सात दशकों के करियर में कॉमेडी को एक नई ऊँचाई दी, और उनका 'सूरमा भोपाली' का किरदार आज भी हिंदी सिनेमा की पहचान बना हुआ है।
संघर्ष से सिनेमा तक का सफर
जगदीप के पिता का असमय देहांत और 1947 के भारत-विभाजन की त्रासदी ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह तोड़ दी। कहा जाता है कि 1951 में निर्देशक बीआर चोपड़ा अपनी पहली फिल्म 'अफसाना' के लिए बाल कलाकारों की तलाश में थे। सड़कों पर काम खोज रहे इश्तियाक को एक एजेंट ने फिल्म के एक नाटकीय दृश्य में ताली बजाने के बदले 3 रुपए की दिहाड़ी की पेशकश की।
जब सेट पर मुख्य बाल कलाकार कठिन उर्दू संवाद बोलने में असमर्थ रहा, तो उर्दू पर पकड़ रखने वाले इश्तियाक ने तुरंत मूंछ-दाढ़ी लगाकर वे संवाद बोल डाले। इस अप्रत्याशित आत्मविश्वास से प्रभावित होकर बीआर चोपड़ा ने उनकी फीस दोगुनी कर 6 रुपए कर दी — और यहीं से एक असाधारण सफर की शुरुआत हुई।
बाल कलाकार से कॉमेडी के बादशाह तक
शुरुआती वर्षों में जगदीप ने गंभीर और भावुक बाल कलाकार के रूप में ख्याति अर्जित की। फिल्म 'फुटपाथ' (1953) में उन्होंने महान अभिनेता दिलीप कुमार के बचपन का किरदार निभाया। बिना ग्लिसरीन के रोने का उनका दृश्य इतना सजीव था कि दिलीप कुमार ने उन्हें 100 रुपए नकद पुरस्कार दिया। उनकी प्रतिभा से तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी प्रभावित हुए, जब फिल्म 'हम पंछी एक डाल के' (1957) ने सफलता पाई।
करियर का निर्णायक मोड़ तब आया जब दिग्गज निर्देशक बिमल रॉय ने उन्हें क्लासिक फिल्म 'दो बीघा जमीन' (1953) में जूता पॉलिश करने वाले 'लालू उस्ताद' का हास्य किरदार सौंपा। इसके बाद जगदीप ने हमेशा के लिए कॉमेडी को अपना लिया।
यादगार किरदार जो इतिहास बन गए
1968 की हिट फिल्म 'ब्रह्मचारी' ने उन्हें एक पूर्ण हास्य अभिनेता के रूप में स्थापित किया। लेकिन उनकी असली पहचान बनी 1975 की कालजयी फिल्म 'शोले' में निभाया गया 'सूरमा भोपाली' का किरदार, जो आज भी दर्शकों की स्मृति में जीवित है। इसके बाद 1994 में 'अंदाज अपना अपना' में उन्होंने 'बांकेलाल भोपाली' की भूमिका से एक बार फिर दर्शकों को लोटपोट किया।
गौरतलब है कि जगदीप ने केवल हल्के-फुल्के किरदारों तक खुद को सीमित नहीं रखा। 'पुराना मंदिर' (1984) के डाकू 'मच्छर सिंह' से लेकर निर्देशक प्रियदर्शन की फिल्म 'मुस्कुराहट' (1992) के 'बद्रीप्रसाद चौरसिया' जैसे जटिल किरदारों को भी उन्होंने अपनी बेमिसाल कॉमिक टाइमिंग से जीवंत किया।
विरासत और परिवार
जगदीप ने अपनी कला की अनमोल विरासत अगली पीढ़ियों को सौंपी। उनके बेटे जावेद जाफरी (अभिनेता) और नावेद जाफरी (टेलीविजन निर्माता) तथा पोते मीजान जाफरी इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। यह ऐसे समय में और भी उल्लेखनीय है जब हिंदी सिनेमा में शुद्ध हास्य की परंपरा धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही है।
अंतिम विदाई
गिरते स्वास्थ्य के कारण 8 जुलाई 2020 को मुंबई स्थित अपने निवास पर इस महान कलाकार ने अंतिम सांस ली। उनकी पुण्यतिथि पर हिंदी सिनेमा जगत उस अद्वितीय फनकार को श्रद्धांजलि अर्पित करता है, जिसने मुफलिसी के दौर में 3 रुपए की दिहाड़ी से शुरुआत कर भारतीय हास्य सिनेमा में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराया।