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जगदीप की पुण्यतिथि: 'सूरमा भोपाली' से हिंदी सिनेमा को अमर हास्य देने वाले इश्तियाक अहमद जाफरी को याद

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जगदीप की पुण्यतिथि: 'सूरमा भोपाली' से हिंदी सिनेमा को अमर हास्य देने वाले इश्तियाक अहमद जाफरी को याद

सारांश

3 रुपए की दिहाड़ी से शुरू हुआ सफर 'सूरमा भोपाली' की अमर विरासत पर जाकर थमा। जगदीप ने विभाजन की त्रासदी झेलकर हिंदी सिनेमा को सात दशकों की बेमिसाल कॉमेडी दी — और उनकी कला आज भी जावेद जाफरी व मीजान जाफरी के ज़रिए जीवित है।

मुख्य बातें

जगदीप (इश्तियाक अहमद जाफरी) का जन्म 29 मार्च 1939 को हुआ; 8 जुलाई 2020 को मुंबई में निधन।
करियर की शुरुआत 1951 में बीआर चोपड़ा की फिल्म 'अफसाना' से मात्र 3 रुपए दिहाड़ी पर हुई।
दिलीप कुमार ने 'फुटपाथ' (1953) में उनके सजीव रोने के दृश्य से प्रभावित होकर 100 रुपए नकद पुरस्कार दिया।
'शोले' (1975) में 'सूरमा भोपाली' और 'अंदाज अपना अपना' (1994) में 'बांकेलाल भोपाली' उनके सबसे यादगार किरदार रहे।
विरासत अगली पीढ़ियों में — बेटे जावेद जाफरी , नावेद जाफरी और पोते मीजान जाफरी — में जीवित है।

हिंदी सिनेमा के अविस्मरणीय हास्य अभिनेता जगदीप (पूरा नाम इश्तियाक अहमद जाफरी) की 8 जुलाई 2020 को मुंबई स्थित उनके निवास पर निधन हुई थी। 29 मार्च 1939 को जन्मे इस फनकार ने सात दशकों के करियर में कॉमेडी को एक नई ऊँचाई दी, और उनका 'सूरमा भोपाली' का किरदार आज भी हिंदी सिनेमा की पहचान बना हुआ है।

संघर्ष से सिनेमा तक का सफर

जगदीप के पिता का असमय देहांत और 1947 के भारत-विभाजन की त्रासदी ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह तोड़ दी। कहा जाता है कि 1951 में निर्देशक बीआर चोपड़ा अपनी पहली फिल्म 'अफसाना' के लिए बाल कलाकारों की तलाश में थे। सड़कों पर काम खोज रहे इश्तियाक को एक एजेंट ने फिल्म के एक नाटकीय दृश्य में ताली बजाने के बदले 3 रुपए की दिहाड़ी की पेशकश की।

जब सेट पर मुख्य बाल कलाकार कठिन उर्दू संवाद बोलने में असमर्थ रहा, तो उर्दू पर पकड़ रखने वाले इश्तियाक ने तुरंत मूंछ-दाढ़ी लगाकर वे संवाद बोल डाले। इस अप्रत्याशित आत्मविश्वास से प्रभावित होकर बीआर चोपड़ा ने उनकी फीस दोगुनी कर 6 रुपए कर दी — और यहीं से एक असाधारण सफर की शुरुआत हुई।

बाल कलाकार से कॉमेडी के बादशाह तक

शुरुआती वर्षों में जगदीप ने गंभीर और भावुक बाल कलाकार के रूप में ख्याति अर्जित की। फिल्म 'फुटपाथ' (1953) में उन्होंने महान अभिनेता दिलीप कुमार के बचपन का किरदार निभाया। बिना ग्लिसरीन के रोने का उनका दृश्य इतना सजीव था कि दिलीप कुमार ने उन्हें 100 रुपए नकद पुरस्कार दिया। उनकी प्रतिभा से तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी प्रभावित हुए, जब फिल्म 'हम पंछी एक डाल के' (1957) ने सफलता पाई।

करियर का निर्णायक मोड़ तब आया जब दिग्गज निर्देशक बिमल रॉय ने उन्हें क्लासिक फिल्म 'दो बीघा जमीन' (1953) में जूता पॉलिश करने वाले 'लालू उस्ताद' का हास्य किरदार सौंपा। इसके बाद जगदीप ने हमेशा के लिए कॉमेडी को अपना लिया।

यादगार किरदार जो इतिहास बन गए

1968 की हिट फिल्म 'ब्रह्मचारी' ने उन्हें एक पूर्ण हास्य अभिनेता के रूप में स्थापित किया। लेकिन उनकी असली पहचान बनी 1975 की कालजयी फिल्म 'शोले' में निभाया गया 'सूरमा भोपाली' का किरदार, जो आज भी दर्शकों की स्मृति में जीवित है। इसके बाद 1994 में 'अंदाज अपना अपना' में उन्होंने 'बांकेलाल भोपाली' की भूमिका से एक बार फिर दर्शकों को लोटपोट किया।

गौरतलब है कि जगदीप ने केवल हल्के-फुल्के किरदारों तक खुद को सीमित नहीं रखा। 'पुराना मंदिर' (1984) के डाकू 'मच्छर सिंह' से लेकर निर्देशक प्रियदर्शन की फिल्म 'मुस्कुराहट' (1992) के 'बद्रीप्रसाद चौरसिया' जैसे जटिल किरदारों को भी उन्होंने अपनी बेमिसाल कॉमिक टाइमिंग से जीवंत किया।

विरासत और परिवार

जगदीप ने अपनी कला की अनमोल विरासत अगली पीढ़ियों को सौंपी। उनके बेटे जावेद जाफरी (अभिनेता) और नावेद जाफरी (टेलीविजन निर्माता) तथा पोते मीजान जाफरी इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। यह ऐसे समय में और भी उल्लेखनीय है जब हिंदी सिनेमा में शुद्ध हास्य की परंपरा धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही है।

अंतिम विदाई

गिरते स्वास्थ्य के कारण 8 जुलाई 2020 को मुंबई स्थित अपने निवास पर इस महान कलाकार ने अंतिम सांस ली। उनकी पुण्यतिथि पर हिंदी सिनेमा जगत उस अद्वितीय फनकार को श्रद्धांजलि अर्पित करता है, जिसने मुफलिसी के दौर में 3 रुपए की दिहाड़ी से शुरुआत कर भारतीय हास्य सिनेमा में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराया।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह उस दौर के हिंदी सिनेमा का दर्पण है जब प्रतिभा को 'स्टार-पावर' से नहीं, बल्कि 'मंच पर क्षण भर में दिखाई गई काबिलियत' से मापा जाता था। विडंबना यह है कि 'शोले' जैसी फिल्म में उनका किरदार महज कुछ मिनटों का था, फिर भी वह पाँच दशक बाद भी सांस्कृतिक स्मृति में जीवित है — जो साबित करता है कि हास्य की गहराई, स्क्रीन टाइम की लंबाई से नहीं नापी जाती। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उनके 'कॉमेडियन' लेबल पर रुक जाती है, जबकि 'दो बीघा जमीन' से 'मुस्कुराहट' तक उनके किरदारों की विविधता एक गहरे कलाकार की गवाही देती है। आज जब ओटीटी युग में हास्य अभिनेताओं को अलग श्रेणी में रखा जाता है, जगदीप का संघर्ष और सफलता यह याद दिलाती है कि असली कॉमेडी त्रासदी की कोख से जन्म लेती है।
RashtraPress
7 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जगदीप कौन थे और उनका असली नाम क्या था?
जगदीप हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध हास्य अभिनेता थे, जिनका पूरा नाम इश्तियाक अहमद जाफरी था। उनका जन्म 29 मार्च 1939 को हुआ था और उन्होंने 1951 से लेकर सात दशकों तक हिंदी फिल्मों में काम किया।
'सूरमा भोपाली' का किरदार किस फिल्म में था?
'सूरमा भोपाली' का किरदार 1975 की कालजयी फिल्म 'शोले' में था, जिसे जगदीप ने निभाया था। यह किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि 1994 में 'अंदाज अपना अपना' में उन्होंने 'बांकेलाल भोपाली' की भूमिका से इसे और विस्तार दिया।
जगदीप का फिल्मी करियर कैसे शुरू हुआ?
कहा जाता है कि 1951 में निर्देशक बीआर चोपड़ा की फिल्म 'अफसाना' के एक दृश्य में ताली बजाने के लिए उन्हें 3 रुपए दिहाड़ी मिली थी। जब मुख्य बाल कलाकार उर्दू संवाद नहीं बोल पाया, तो इश्तियाक ने तुरंत वह भूमिका संभाली और बीआर चोपड़ा ने उनकी फीस दोगुनी कर 6 रुपए कर दी।
जगदीप के परिवार में कौन-कौन हैं?
जगदीप के दो बेटे हैं — अभिनेता जावेद जाफरी और टेलीविजन निर्माता नावेद जाफरी। उनके पोते मीजान जाफरी भी अभिनय की दुनिया में सक्रिय हैं और इस परिवार की कलात्मक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
जगदीप का निधन कब और कहाँ हुआ?
जगदीप का निधन 8 जुलाई 2020 को मुंबई स्थित उनके निवास पर हुआ। गिरते स्वास्थ्य के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली; वे 81 वर्ष के थे।
राष्ट्र प्रेस
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