मनोज कुमार: भिखारी से 'भारत कुमार' बनने की प्रेरक कहानी
सारांश
Key Takeaways
- मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को हुआ था।
- उन्होंने 1955 में अपने करियर की शुरुआत की।
- 'उपकार' ने उन्हें 'भारत कुमार' की उपाधि दिलाई।
- उनकी फिल्म 'क्रांति' 1981 की सबसे बड़ी हिट थी।
- उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
मुंबई, 3 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। 1947 का विभाजन हरिकिशन (मनोज) से उनका गृह स्थान छीन लिया, लेकिन उनके हृदय में 'मातृभूमि' के प्रति एक गहरा प्रेम अंकित कर दिया, जो आगे चलकर उनके सिनेमा की आत्मा बन गया। 1955 में जब वे दिल्ली से हीरो बनने के सपने के साथ मुंबई (तब बॉम्बे) आए, तो उनके लिए राह सरल नहीं थी।
24 जुलाई 1937 को जन्मे मनोज कुमार ने अपने करियर की शुरुआत 1956 की फिल्म 'गंगू तेली' में एक छोटे से किरदार से की। इसके पश्चात 1957 में 'फैशन' फिल्म में उन्होंने एक भिखारी का चरित्र निभाया। भिखारी के रोल से शुरू करने वाला यह युवा जल्द ही 'हरियाली और रास्ता' (1962) जैसी फिल्म से एक सितारा बन गया। फिर आई 1964 की सस्पेंस-थ्रिलर 'वो कौन थी?', जिसने मनोज कुमार को फिल्म उद्योग का एक स्थापित सितारा बना दिया। परंतु, मनोज कुमार के भीतर एक फिल्मकार कुछ और ही खोज रहा था।
1965 का वर्ष भारतीय सिनेमा और मनोज कुमार, दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया। उन्होंने शहीद भगत सिंह के जीवन पर आधारित फिल्म 'शहीद' का निर्माण किया। यह फिल्म इतनी प्रभावशाली थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसे देखा और मनोज कुमार से एक विशेष अनुरोध किया। प्रधानमंत्री ने कहा, "क्यों न तुम मेरे नारे 'जय जवान, जय किसान' पर एक फिल्म बनाओ?"
इसी एक वाक्य ने 1967 की कालजयी फिल्म 'उपकार' को जन्म दिया। मनोज कुमार ने इस फिल्म का निर्देशन किया और इसमें 'भारत' नाम के एक युवक का किरदार निभाया, जो किसान और सैनिक दोनों था। "मेरे देश की धरती सोना उगले..." जब यह संवाद पर्दे पर गूंजा, तो दर्शकों की आंखें नम हो गईं। यह केवल एक फिल्म नहीं थी। मनोज कुमार के अनुसार, यह 16,000 फीट लंबा सेल्युलाइड का भारतीय ध्वज था। इसी फिल्म ने उन्हें 'भारत कुमार' की उपाधि प्रदान की।
मनोज कुमार केवल कैमरे के सामने का चेहरा नहीं थे। वे भारतीय सिनेमा के उन अद्वितीय कलाकारों में से थे, जो कहानी लिखते थे, संपादन करते थे और निर्देशन की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर लेते थे।
उनकी फिल्म निर्माण की शैली बिल्कुल अलग थी। उनकी नजर की सूझ-बूझ का कमाल था कि उन्होंने 60 के दशक के सबसे खतरनाक विलेन 'प्राण' को 'उपकार' में 'मलंग चाचा' का सकारात्मक किरदार देकर सबका दिल जीत लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974) में संघर्षरत अमिताभ बच्चन को भी एक बड़ा मौका दिया।
1981 में मनोज कुमार ने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर, भारी कर्ज लेकर ऐतिहासिक महाकाव्य 'क्रांति' बनाई। उन्होंने अपने आदर्श दिलीप कुमार को संन्यास से वापस लाकर इस फिल्म में शामिल किया। यह फिल्म 1981 की सबसे बड़ी हिट साबित हुई, जिसने बॉक्स ऑफिस के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए।
दिग्गज बॉलीवुड अभिनेता, निर्माता और निर्देशक मनोज कुमार को वर्ष 2015 के लिए प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उन्हें 3 मई 2016 को 63वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में प्रदान किया गया।
जीवन के अंतिम वर्षों में 'भारत कुमार' कई गंभीर बीमारियों, विशेषकर लीवर सिरोसिस से जूझते रहे। 4 अप्रैल 2025 को मुंबई के एक अस्पताल में उनकी सांसें थम गईं।