के. आसिफ जयंती: 'मुगल-ए-आजम' के लिए 12 साल की जिद और ₹1.5 करोड़ का दांव
सारांश
मुख्य बातें
के. आसिफ — मूल नाम आसिफ करीम — का जन्म 14 जून 1922 को इटावा, उत्तर प्रदेश में हुआ था। पारंपरिक शिक्षा से मोहभंग होने के बाद उन्होंने आठवीं कक्षा के बाद ही स्कूल छोड़ दिया और बंबई (अब मुंबई) का रुख किया। यह वही शहर था जहाँ उनके सपनों को आकार मिलना था — और जहाँ भारतीय सिनेमा को उसकी सबसे भव्य विरासत।
निर्देशन की शुरुआत: 'फूल' से भव्यता की नींव
के. आसिफ ने निर्देशन की दुनिया में कदम रखा 1945 में, सामाजिक-पारिवारिक फिल्म 'फूल' के साथ। कमाल अमरोही के धारदार संवादों से सजी यह फिल्म उस दौर की पहली भव्य 'मल्टी-स्टारर' फिल्म मानी जाती है। इसमें पृथ्वीराज कपूर अभिनीत सफदर की बेटी की कहानी थी, जो रूढ़िवादी समाज की परवाह किए बिना एक अधूरी मस्जिद का निर्माण पूरा कराती है — उस युग के लिए यह कथावस्तु बेहद साहसी थी। फिल्म 1945 की चौथी सबसे बड़ी हिट साबित हुई।
इसके बाद 1951 में उन्होंने दिलीप कुमार और नरगिस को लेकर 'हलचल' बनाई। इस फिल्म ने उन्हें बड़े सितारों और जटिल सेट को संभालने का व्यावहारिक अनुभव दिया — एक ऐसा हुनर जो आगे चलकर उनकी महत्त्वाकांक्षी परियोजना के लिए अनिवार्य साबित हुआ।
'मुगल-ए-आजम': 12 साल की जिद, ₹1.5 करोड़ का महाकाव्य
1960 में परदे पर उतरी 'मुगल-ए-आजम' के. आसिफ के सपनों की पराकाष्ठा थी। इस फिल्म को पूरा करने में उन्होंने अपने जीवन के लगभग 12 अमूल्य वर्ष लगाए। देश के विभाजन की मार, मुख्य अभिनेता चंद्रमोहन का असमय निधन और वित्तपोषक शिराज अली का पाकिस्तान चले जाना — इन सब बाधाओं के बावजूद के. आसिफ का संकल्प नहीं टूटा।
पारसी उद्योगपति शापूरजी पालनजी के सहयोग से फिल्म दोबारा शुरू हुई, तो के. आसिफ ने भव्यता की हर सीमा को पार कर दिया। कहा जाता है कि फिल्म का कुल बजट ₹1.5 करोड़ रहा, जो तत्कालीन भारत की सबसे महंगी फिल्म थी। संगीतकार नौशाद की संतुष्टि के लिए मशहूर गीत 'प्यार किया तो डरना क्या' को 105 बार लिखा गया — यह किस्सा खुद आसिफ की पूर्णतावादी सोच का प्रमाण है।
निजी जीवन: अशांत दास्तान
रुपहले परदे पर अमर प्रेम को जीवंत करने वाले के. आसिफ का अपना निजी जीवन उतना ही उथल-पुथल भरा था। उन्होंने चार निकाह किए। उनका चौथा निकाह दिलीप कुमार की छोटी बहन अख्तर बेगम से हुआ, जिसका दिलीप कुमार ने कड़ा विरोध किया। 'मुगल-ए-आजम' की बची हुई शूटिंग के दौरान दोनों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद थी और दिलीप कुमार फिल्म के ऐतिहासिक प्रीमियर शो में भी शामिल नहीं हुए।
'लव एंड गॉड': अधूरे सपने की शापित कहानी
'मुगल-ए-आजम' के बाद के. आसिफ ने 1963 में लैला-मजनू की अमर दास्तान पर आधारित देश की पहली पूर्ण रंगीन महाकाव्यात्मक फिल्म 'लव एंड गॉड' की शुरुआत गुरु दत्त के साथ की। लेकिन 1964 में गुरु दत्त की अचानक मृत्यु से काम रुक गया। के. आसिफ ने हार नहीं मानी और 1970 में संजीव कुमार को लेकर फिल्म दोबारा शुरू की।
किंतु 9 मार्च 1971 को के. आसिफ भी इस दुनिया से विदा हो गए। बाद में नवंबर 1985 में संजीव कुमार का भी निधन हो गया। कुछ पैचवर्क और बॉडी डबल के सहारे 27 मई 1986 को यह फिल्म अधूरी अवस्था में रिलीज हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल रही। गुरु दत्त, के. आसिफ और संजीव कुमार — तीन प्रमुख हस्तियों की असमय मृत्यु के कारण 'लव एंड गॉड' को भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे 'शापित' फिल्मों में गिना जाता है।
के. आसिफ की विरासत यह है कि उन्होंने भारतीय सिनेमा को दिखाया कि दृष्टि और दृढ़ता मिलकर असंभव को संभव बना सकती है — भले ही वह सफर कितना भी कठिन और लंबा क्यों न हो।