नसीरुद्दीन शाह: दिलीप कुमार की 'घर लौटो' वाली सलाह ठुकराई, ₹7.50 से शुरू हुआ सफर और बने भारतीय सिनेमा के दिग्गज
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं में शुमार नसीरुद्दीन शाह का संघर्ष उतना ही प्रेरणादायक है जितना उनका करियर। बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के, उत्तर प्रदेश के एक रूढ़िवादी परिवार से निकलकर उन्होंने हिंदी सिनेमा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी — और यह सफर शुरू हुआ था मात्र ₹7.50 की मेहनताना से। यहाँ तक कि दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार ने उन्हें वापस घर लौटकर पढ़ाई करने की सलाह दी थी, लेकिन नसीर ने अपना इरादा नहीं बदला।
बाराबंकी से मुंबई तक का सफर
नसीरुद्दीन शाह का जन्म 20 जुलाई 1950 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुआ था। उनके पिता अली मोहम्मद शाह एक ऐसे व्यक्ति थे जो शिक्षा और सुरक्षित रोज़गार को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे। परिवार चाहता था कि नसीर भी अपने भाइयों की तरह किसी अच्छी नौकरी में जाएँ, लेकिन उनका मन बचपन से ही थिएटर, फिल्मों और नाटकों में रमता था।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद नसीरुद्दीन शाह ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) का रुख किया। पिता इस फैसले से नाराज थे, परंतु नसीर अपने सपने से पीछे नहीं हटे। बाद में उन्होंने पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट (FTII) में भी प्रशिक्षण लेकर अभिनय की बारीकियाँ सीखीं।
₹7.50 का पहला मेहनताना और दिलीप कुमार की सलाह
संघर्ष के शुरुआती दिनों में नसीरुद्दीन शाह को साल 1967 में फिल्म 'अमन' में एक्स्ट्रा कलाकार के तौर पर काम मिला। उस छोटे से रोल के लिए उन्हें मात्र ₹7.50 मिले थे — और उस वक्त वह केवल 16 साल के थे। यह वही दौर था जब उन्होंने अभिनेता दिलीप कुमार से मुलाकात की। दिलीप कुमार उनके परिवार को जानते थे और नसीर उनका गहरा सम्मान करते थे।
जब नसीर ने उनसे अपनी अभिनय की महत्वाकांक्षा जाहिर की, तो दिलीप कुमार ने उन्हें वापस घर लौटकर पढ़ाई जारी रखने की सलाह दी। यह बात नसीर के लिए चौंकाने वाली थी, लेकिन उन्होंने इसे हतोत्साहित करने वाले शब्दों की बजाय एक चुनौती की तरह लिया और अपने फैसले पर अडिग रहे।
समानांतर सिनेमा का स्वर्णिम दौर
नसीरुद्दीन शाह को असली पहचान साल 1975 में निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म 'निशांत' से मिली। इसके बाद उन्होंने 'आक्रोश', 'स्पर्श', 'मंडी', 'अर्ध सत्य', 'मिर्च मसाला' और 'जाने भी दो यारों' जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाएँ निभाईं। गौरतलब है कि इन फिल्मों ने भारतीय समानांतर सिनेमा को एक नई पहचान और गरिमा दिलाई।
व्यावसायिक सिनेमा में भी अलग छाप
धीरे-धीरे नसीरुद्दीन शाह ने मुख्यधारा की व्यावसायिक फिल्मों में भी अपनी जगह बनाई। 'कर्मा', 'मोहरा', 'सरफरोश', 'इकबाल', 'ए वेडनेसडे' और 'द डर्टी पिक्चर' जैसी फिल्मों में उन्होंने हीरो, खलनायक और जटिल किरदार — हर भूमिका में अपनी अलग छाप छोड़ी। यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण था।
पुरस्कार और सम्मान
उनकी असाधारण अदाकारी के लिए उन्हें तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया — 'स्पर्श', 'पार' और 'इकबाल' के लिए। भारत सरकार ने उन्हें 1987 में पद्मश्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। फिल्मों के अलावा उनका थिएटर से भी गहरा नाता रहा है, और टेलीविज़न पर 'मिर्जा गालिब' तथा 'भारत एक खोज' जैसे शोज़ में उनका अभिनय आज भी अविस्मरणीय माना जाता है। नसीरुद्दीन शाह की यह यात्रा यह साबित करती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रतिभा के आगे हर बाधा छोटी पड़ जाती है।