महबूब खान: अस्तबल से 'मदर इंडिया' तक — घोड़ों की नाल ठोकने वाले ने रचा भारतीय सिनेमा का इतिहास
सारांश
मुख्य बातें
महबूब खान — वह नाम जिसने हिंदी सिनेमा को उसकी सबसे महाकाव्यात्मक रचना 'मदर इंडिया' दी — की जीवन-यात्रा किसी पटकथा से कम नहीं थी। 9 सितंबर 1907 को गुजरात में जन्मे महबूब खान ने मुंबई के एक अस्तबल में घोड़ों की नाल ठोकने से लेकर ऑस्कर की दहलीज तक का सफर तय किया — और इस सफर में उन्होंने भारतीय सिनेमा को एक नई वैश्विक पहचान दिलाई।
मुंबई आगमन और संघर्ष के शुरुआती दिन
बचपन से ही फिल्मों की दुनिया की ओर खिंचे महबूब खान अभिनेता बनने का सपना लेकर कम उम्र में ही मुंबई पहुँच गए। शुरुआत आसान नहीं थी। यहाँ उनकी मुलाकात नूर मोहम्मद से हुई, जो फिल्मों के लिए घोड़े उपलब्ध कराते थे। नूर मोहम्मद ने उन्हें अस्तबल में घोड़ों की नाल ठोकने का काम दिया। रोज़ घोड़ों के बीच काम करते हुए भी उनके मन में सिनेमा का सपना ज़िंदा रहा।
एक दिन एक फिल्म की शूटिंग के दौरान वह सेट पर जा पहुँचे और फिल्मी दुनिया में काम करने की अपनी इच्छा जाहिर की। उनकी लगन देखकर उन्हें स्टूडियो में छोटे-मोटे काम करने का अवसर मिला। यह साइलेंट फिल्मों का दौर था और महबूब खान ने एक्स्ट्रा कलाकार तथा सहायक के रूप में अपना करियर शुरू किया।
निर्देशक के रूप में उभरना
कैमरे के सामने छोटे किरदार निभाते-निभाते महबूब खान कैमरे के पीछे की दुनिया को भी बारीकी से समझने लगे। फिल्म निर्माण की पूरी प्रक्रिया में उनकी रुचि गहरी होती गई और अंततः 1935 में उन्हें निर्देशक के रूप में अपनी पहली फिल्म 'अल हिलाल' बनाने का मौका मिला। यहीं से उनके निर्देशकीय सफर की नींव पड़ी।
इसके बाद उन्होंने 'दक्कन क्वीन', 'एक ही रास्ता', 'अलीबाबा', 'औरत' और 'बहन' जैसी फिल्में बनाईं, जिन्होंने उन्हें एक संवेदनशील और सामाजिक सरोकार वाले निर्देशक के रूप में स्थापित किया। महबूब खान अपनी फिल्मों में आम लोगों की ज़िंदगी, गरीबी, गाँव, रिश्ते और सामाजिक विसंगतियों को बड़े पर्दे पर उतारते थे। विशेष रूप से महिला किरदारों को उन्होंने असाधारण मज़बूती और गरिमा के साथ प्रस्तुत किया।
'मदर इंडिया' — एक ऐतिहासिक जोखिम
1940 में आई 'औरत' उनके करियर की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी थी। करीब 17 वर्ष बाद महबूब खान ने इसी कहानी को कहीं अधिक विराट रूप में दोबारा पर्दे पर उतारने का साहसिक निर्णय लिया — और इस तरह 1957 में 'मदर इंडिया' का जन्म हुआ।
इस फिल्म के निर्माण में इतनी बड़ी राशि खर्च हुई कि महबूब खान पर कर्ज़ का बोझ बढ़ गया। स्थिति इतनी विकट थी कि जब 'मदर इंडिया' ऑस्कर की दौड़ में शामिल हुई, तब उनके पास अमेरिका जाकर फिल्म का प्रचार करने के लिए भी पर्याप्त धन नहीं था। फिल्म सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के ऑस्कर पुरस्कार से बेहद मामूली अंतर से चूक गई, लेकिन इसने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नई प्रतिष्ठा दिलाई।
'मदर इंडिया' में नरगिस ने राधा की भूमिका निभाई, जबकि सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कुमार अहम भूमिकाओं में थे। फिल्म को अपार जन-समर्थन मिला और इसे भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिना जाने लगा। फिल्मफेयर में इसने सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सहित कई पुरस्कार जीते।
महबूब स्टूडियो और पहचान का विस्तार
'मदर इंडिया' से पहले भी महबूब खान 'अंदाज', 'आन' और 'अमर' जैसी बड़ी फिल्मों से अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके थे। उनकी तुलना हॉलीवुड के प्रख्यात निर्देशक सेसिल बी. डीमिल से की गई और उनकी जीवनी का शीर्षक 'महबूब: इंडियाज़ डीमिल' रखा गया।
1940 के दशक में उन्होंने अपना बैनर महबूब प्रोडक्शंस स्थापित किया और 1954 में मुंबई के बांद्रा में महबूब स्टूडियो की नींव रखी — जो आज भी भारतीय फिल्म उद्योग की एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में खड़ा है।
विरासत और अंतिम यात्रा
भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए 1963 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनकी अंतिम फिल्म 'सन ऑफ इंडिया' 1962 में प्रदर्शित हुई। इसके दो वर्ष बाद, 28 मई 1964 को हृदयाघात के कारण महज़ 56 वर्ष की आयु में महबूब खान का निधन हो गया। एक अस्तबल से अपनी यात्रा शुरू करने वाले इस फिल्मकार ने जो विरासत छोड़ी, वह भारतीय सिनेमा की आत्मा में आज भी जीवित है।