यश जौहर जयंती: मिठाई की दुकान से धर्मा प्रोडक्शंस तक, जिन्होंने बॉलीवुड को दी वैश्विक पहचान
सारांश
मुख्य बातें
धर्मा प्रोडक्शंस के संस्थापक यश जौहर का नाम हिंदी सिनेमा के उन विरले निर्माताओं में शामिल है, जिन्होंने बॉलीवुड को महज़ घरेलू मनोरंजन से उठाकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया। 6 सितंबर 1929 को जन्मे यश जौहर का जीवन — पिता की मिठाई की दुकान से लेकर भारतीय सिनेमा के सबसे भव्य प्रोडक्शन हाउस की स्थापना तक — किसी प्रेरणादायक फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
यश जौहर का जन्म 6 सितंबर 1929 को पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था। 1947 के विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया, जहाँ उनके पिता ने मिठाई की दुकान खोली। अपने 9 भाई-बहनों में सबसे अधिक पढ़े-लिखे होने के कारण पिता ने उन्हें दुकान का हिसाब-किताब सँभालने की जिम्मेदारी सौंपी — एक ऐसा काम जो उन्हें रास नहीं आता था। माँ के सहयोग से यश जौहर मुंबई चले गए, जहाँ शुरुआती दिनों में उन्होंने एक प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी अखबार में सहायक फोटोग्राफर के रूप में काम किया। कहा जाता है कि उस दौर में मशहूर अभिनेत्री मधुबाला किसी को भी फोटो खींचने की अनुमति नहीं देती थीं, लेकिन यश की धाराप्रवाह अंग्रेज़ी से प्रभावित होकर उन्होंने उनसे तस्वीरें खिंचवाईं।
फिल्म उद्योग में पहले कदम
1950 के दशक की शुरुआत में यश जौहर ने शशिधर मुखर्जी के फिल्मिस्तान स्टूडियो के साथ पब्लिसिस्ट और स्टिल फोटोग्राफर के रूप में अपना सिनेमाई सफर शुरू किया। उन्होंने 'लव इन शिमला' (1960) में प्रोडक्शन एग्जीक्यूटिव की भूमिका निभाई और 1962 में सुनील दत्त की अजंता आर्ट्स से जुड़े, जहाँ 'मुझे जीने दो' (1963) और 'ये रास्ते हैं प्यार के' (1963) जैसी फिल्मों का प्रोडक्शन सँभाला।
इसके बाद देव आनंद की नवकेतन फिल्म्स के साथ उनका जुड़ाव उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। यहाँ उन्होंने 'गाइड' (1965), 'ज्वेल थीफ' (1967), 'प्रेम पुजारी' (1970) और 'हरे रामा हरे कृष्णा' (1971) जैसी चर्चित फिल्मों के प्रोडक्शन का दायित्व निभाया और एक कुशल प्रोडक्शन कंट्रोलर के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई। 1971 में उन्होंने मार्शल आर्ट्स स्टार ब्रूस ली और अभिनेता जेम्स कोबर्न के साथ भारत में एक संभावित फिल्म के लिए लोकेशन रेकी की, हालाँकि वह परियोजना कभी परदे पर नहीं आ सकी।
धर्मा प्रोडक्शंस की स्थापना और शुरुआती सफलताएँ
1976 में यश जौहर ने धर्मा प्रोडक्शंस की नींव रखी — एक ऐसा बैनर जो अपनी भावनात्मक, परिवार-केंद्रित कहानियों और उच्च-गुणवत्ता प्रोडक्शन के लिए जाना गया। 1980 में धर्मा की पहली फिल्म 'दोस्ताना' रिलीज़ हुई, जिसमें अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा और ज़ीनत अमान मुख्य भूमिकाओं में थे। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई।
इसके बाद 'दुनिया' (1984), 'अग्निपथ' (1990), 'गुमराह' (1993) और 'डुप्लिकेट' (1998) ने धर्मा की साख और मज़बूत की। 'अग्निपथ' रिलीज़ के समय बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी, लेकिन अमिताभ बच्चन का 'विजय दीनानाथ चौहान' का किरदार आज भारतीय सिनेमा की क्लासिक धरोहर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि यश जौहर ने हॉलीवुड फिल्म 'द जंगल बुक' (1994) में एसोसिएट प्रोड्यूसर की भूमिका भी निभाई, जिससे भारतीय सिनेमा की सीमाओं से परे भी उनकी पहचान बनी।
करण जौहर का उदय और वैश्विक पहचान
1990 के दशक के अंत में यश जौहर के पुत्र करण जौहर ने निर्देशन में कदम रखा। यश जौहर ने अपने बेटे की दूरदर्शिता पर पूरा विश्वास जताया। 1998 में रिलीज़ 'कुछ कुछ होता है' ने भारतीय सिनेमा के इतिहास में नया अध्याय लिखा और दुनियाभर में अभूतपूर्व रिकॉर्ड बनाए। इसके बाद 'कभी खुशी कभी ग़म' (2001) और 'कल हो ना हो' (2003) ने प्रवासी भारतीय (NRI) दर्शकों के बीच बॉलीवुड की एक भव्य, भावनात्मक और विश्वस्तरीय छवि गढ़ी। भव्य सेट, पारिवारिक रिश्ते, खूबसूरत विदेशी लोकेशन और मधुर संगीत — ये सब धर्मा प्रोडक्शंस के ट्रेडमार्क बन गए।
विरासत और निधन
पूरे फिल्म उद्योग में यश जौहर एक सज्जन, दयालु और अनुशासनप्रिय व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते थे। वे केवल निर्माता नहीं, बल्कि कलाकारों और क्रू के लिए एक संरक्षक की भूमिका निभाते थे। 26 जून 2004 को मुंबई में कैंसर के कारण उनका निधन हो गया। उनके बाद उनके पुत्र करण जौहर और पत्नी हीरू जौहर ने धर्मा प्रोडक्शंस की कमान सँभाली। आज धर्मा प्रोडक्शंस भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े और सफल प्रोडक्शन हाउस में से एक है — यश जौहर की दृष्टि और मूल्यों की जीवंत गवाही।