उमेश मेहरा: 'अलीबाबा' से 'खिलाड़ियों का खिलाड़ी' तक, बॉलीवुड के हिटमेकर का अनोखा सफर
सारांश
मुख्य बातें
बॉलीवुड के दिग्गज निर्देशक उमेश मेहरा का जन्म 6 अगस्त 1953 को हुआ था। वे मशहूर फिल्म निर्माता एफ.सी. मेहरा के पुत्र हैं, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान केवल पारिवारिक विरासत के बल पर नहीं, बल्कि अपनी रचनात्मक प्रतिभा और फिल्मी समझ के दम पर बनाई। 80 और 90 के दशक में उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक सुपरहिट फिल्में दीं, जो आज भी दर्शकों के ज़ेहन में ताज़ा हैं।
फिल्मी माहौल में पली-बढ़ी प्रतिभा
उमेश मेहरा का बचपन सिनेमा की छाँव में बीता। उनके पिता एफ.सी. मेहरा हिंदी सिनेमा के प्रमुख निर्माताओं में शुमार थे, इसलिए फिल्मों के प्रति उनका झुकाव स्वाभाविक था। उन्होंने एच.आर. कॉलेज से वाणिज्य की पढ़ाई पूरी की, मगर उनका मन हमेशा फिल्मी दुनिया में ही रमा रहा। अभिनय और निर्देशन की बारीकियाँ सीखने के लिए उन्होंने जागीरदार की एक्टिंग अकादमी में प्रशिक्षण लिया।
इसके बाद उन्हें दिग्गज अभिनेता-निर्देशक शम्मी कपूर के साथ फिल्मों 'मनोरंजन' और 'बंडलबाज' में सहायक निर्देशक के रूप में काम करने का अवसर मिला। उमेश मेहरा हमेशा शम्मी कपूर को अपना गुरु और पिता तुल्य मानते रहे।
निर्देशन की शुरुआत और 'अलीबाबा' की धूम
बतौर निर्देशक उमेश मेहरा को पहला बड़ा अवसर फिल्म 'हमारे तुम्हारे' से मिला, जिसमें संजीव कुमार और राखी जैसे दिग्गज कलाकार थे। हालाँकि, उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई साल 1980 में रिलीज़ हुई फिल्म 'अलीबाबा और 40 चोर' ने। यह भारत और सोवियत संघ की संयुक्त निर्मित फिल्म थी, जिसमें धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और जीनत अमान ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। अपने दौर की सबसे भव्य कॉस्ट्यूम ड्रामा फिल्मों में गिनी जाने वाली यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भी जबरदस्त सफल रही।
मिथुन और अक्षय के साथ हिट फिल्मों का सिलसिला
इसके बाद उमेश मेहरा ने लगातार हिट फिल्मों की झड़ी लगाई। मिथुन चक्रवर्ती के साथ 'अशांति', 'मुजरिम', 'गुरु' और 'यार गद्दार' जैसी फिल्मों ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। रोमांटिक फिल्म 'सोहनी महिवाल' आज भी अपने संगीत और कथानक के लिए याद की जाती है।
जब अक्षय कुमार बॉलीवुड में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, उमेश मेहरा ने उन्हें तीन बड़ी फिल्मों में मौका दिया — 'सबसे बड़ा खिलाड़ी', 'खिलाड़ियों का खिलाड़ी' और 'इंटरनेशनल खिलाड़ी'। इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया और अक्षय कुमार की 'खिलाड़ी' छवि को स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। विशेष रूप से 'खिलाड़ियों का खिलाड़ी' आज भी हिंदी एक्शन सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में गिनी जाती है।
दिलीप कुमार की आखिरी फिल्म का निर्देशन
उमेश मेहरा ने नए चेहरों को मौका देने के साथ-साथ दिग्गज सितारों के साथ भी काम किया। साल 1998 में उन्होंने हिंदी सिनेमा के महानायक दिलीप कुमार को फिल्म 'किला' में निर्देशित किया — जो दिलीप कुमार के करियर की अंतिम फिल्म साबित हुई।
टेलीविजन की दुनिया में नई पारी
साल 2002 में 'ये मोहब्बत है' के बाद उमेश मेहरा ने फिल्मों से किनारा कर लिया और अपने पारिवारिक बैनर ईगल फिल्म्स के ज़रिए टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा। उनके निर्माण में बने धारावाहिक 'ऑफिस ऑफिस' और 'चला मुसद्दी - ऑफिस ऑफिस' दर्शकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुए और आज भी भारतीय टेलीविजन के यादगार कॉमेडी शोज़ में शुमार किए जाते हैं। उमेश मेहरा का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि असली प्रतिभा किसी एक माध्यम की मोहताज नहीं होती।