महबूब खान: चोरी-छिपे ट्रेन से मुंबई जाते थे, पिता ने पकड़ा तो हुई पिटाई — फिर बनाई 'मदर इंडिया'
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सिनेमा के महान निर्माता-निर्देशक महबूब खान की जीवनगाथा किसी फिल्मी पटकथा से कम रोमांचक नहीं थी। बचपन में फिल्मों के प्रति इतना गहरा जुनून था कि वह चुपके से ट्रेन में बैठकर आसपास के कस्बों और मुंबई तक फिल्में देखने निकल जाते थे। जब परिवार को उनके मुंबई भागने की खबर मिली, तो पिता ने उन्हें ढूंढकर वापस लाया और जमकर डाँटा-पीटा। लेकिन वही जिद्दी लड़का आगे चलकर 'मदर इंडिया' जैसी कालजयी फिल्म का सृजन करने वाला दिग्गज बना।
बचपन और फिल्मों का जुनून
महबूब खान का जन्म 9 सितंबर 1907 को गुजरात के बड़ौदा के निकट सरार गाँव में हुआ था। परिवार की आर्थिक स्थिति साधारण थी, लेकिन सिनेमा के प्रति उनका आकर्षण असाधारण था। वह बिना किसी को बताए ट्रेन में सवार होकर पड़ोसी शहरों और मुंबई तक फिल्में देखने चले जाते थे।
कहा जाता है कि उनकी एक रेलवे गार्ड से दोस्ती हो गई थी, जिसने उन्हें मुंबई जाकर फिल्मी दुनिया में किस्मत आज़माने की सलाह दी। महज 16 वर्ष की आयु में वह घर छोड़कर मुंबई पहुँच गए। जैसे ही पिता को भनक लगी, वह मुंबई पहुँचे, बेटे को ढूंढकर वापस गाँव ले आए और पिटाई भी की। परिवार ने उनका ध्यान भटकाने के लिए शादी भी करा दी — लेकिन भीतर का सपना बुझा नहीं।
संघर्ष के वे कठिन दिन
कुछ समय बाद महबूब खान एक बार फिर मुंबई पहुँचे। शुरुआती दिनों में उन्होंने घोर संघर्ष किया। वह मुंबई के वीटी स्टेशन के पास स्थित ज्योति स्टूडियो के बाहर घंटों खड़े रहते थे, उम्मीद में कि कोई काम मिल जाए। कई रातें उन्होंने रेलवे प्लेटफॉर्म पर गुज़ारीं।
आखिरकार उनकी मुलाकात प्रसिद्ध फिल्मकार अर्देशिर ईरानी से हुई, जिन्होंने उन्हें छोटे-छोटे किरदार दिए। यहीं से उनकी फिल्मी यात्रा की नींव पड़ी। जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि अभिनय की बजाय उनकी असली रुचि निर्देशन और कहानी-लेखन में है।
निर्देशक के रूप में उभरना
महबूब खान ने अपनी कहानियाँ लिखनी शुरू कीं और कई निर्माताओं के दरवाज़े खटखटाए। शुरुआती निराशाओं के बाद 1935 में उनकी पहली निर्देशित फिल्म 'अल हिलाल' प्रदर्शित हुई और उन्हें पहचान मिली। इसके बाद 'डेक्कन क्वीन', 'औरत', 'रोटी', 'अनमोल घड़ी', 'अंदाज', 'आन' और 'अमर' जैसी कई सफल फिल्मों ने उनकी छवि एक संवेदनशील और प्रगतिशील फिल्मकार के रूप में स्थापित की। उनकी फिल्मों में मज़बूत महिला किरदारों को सदैव केंद्रीय स्थान मिला।
1952 में उन्होंने मुंबई के बांद्रा इलाके में महबूब स्टूडियो की स्थापना की, जो उस दौर का सबसे आधुनिक फिल्म स्टूडियो माना जाता था। आज भी वहाँ फिल्मों और टेलीविज़न कार्यक्रमों की शूटिंग होती है।
'मदर इंडिया' — भारतीय सिनेमा की अमर धरोहर
महबूब खान के करियर की सर्वोच्च उपलब्धि 1957 में प्रदर्शित फिल्म 'मदर इंडिया' मानी जाती है। नरगिस, सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार अभिनीत इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नई पहचान दिलाई। यह फिल्म ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित भी हुई थी — भारत की ओर से यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। आज भी 'मदर इंडिया' को भारतीय सिनेमा की सबसे महान कृतियों में गिना जाता है।
विरासत और निधन
28 मई 1964 को महज 56 वर्ष की अल्पायु में महबूब खान का निधन हो गया। लेकिन उनकी फिल्में — विशेषकर 'मदर इंडिया' — आज भी भारतीय दर्शकों के दिलों में जीवित हैं। एक साधारण गाँव के लड़के से लेकर भारतीय सिनेमा के शिखर तक की उनकी यात्रा यह साबित करती है कि सपने और संघर्ष मिलें तो इतिहास बदल सकता है।