जोहरा सहगल: जब लड़कियाँ घर से नहीं निकल सकती थीं, तब वे पहुँचीं जर्मनी और रच दिया इतिहास
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रंगमंच और सिनेमा की अमर हस्ती जोहरा सहगल उन विरले व्यक्तित्वों में से थीं, जिन्होंने अपने युग की सीमाओं को तोड़कर इतिहास की इबारत लिखी। जिस दौर में लड़कियों का अकेले घर से निकलना भी असंभव माना जाता था, उस समय जोहरा ने जर्मनी जाकर आधुनिक नृत्य की शिक्षा ली और भारतीय कला जगत को एक नई दिशा दी। उनका जीवन केवल अभिनय की कहानी नहीं, बल्कि साहस, स्वतंत्र सोच और अदम्य जिजीविषा का दस्तावेज़ है।
बचपन और शिक्षा
जोहरा सहगल का जन्म 27 अप्रैल 1912 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुआ था। उनका पूरा नाम साहिबजादी जोहरा मुमताज़ उल्लाह खान बेगम था। उनका बचपन उत्तराखंड के चकराता में बीता, जहाँ उन्होंने प्रकृति के बीच पली-बढ़ीं। छोटी उम्र में ही माँ का साया उठ जाने के बावजूद उनका हौसला कभी नहीं टूटा। उन्होंने लाहौर के प्रतिष्ठित क्वीन मैरी कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। पेड़ों पर चढ़ना, खुले मैदान में खेलना और नई चीज़ें सीखने का उनका जुनून बचपन से ही उन्हें अपने समकालीनों से अलग करता था।
यूरोप की ऐतिहासिक यात्रा
पढ़ाई पूरी करने के बाद जोहरा ने वह कदम उठाया जो उस युग में अकल्पनीय था। वे जर्मनी के ड्रेसडेन शहर पहुँचीं और वहाँ प्रख्यात नृत्य-गुरु मैरी विगमैन के बैले स्कूल में दाखिला लिया। यह वह दौर था जब भारत में महिलाओं का अकेले घर से बाहर निकलना भी सामाजिक वर्जना मानी जाती थी — ऐसे में किसी युवती का अकेले यूरोप जाकर आधुनिक नृत्य सीखना अपने आप में एक क्रांतिकारी निर्णय था। उन्होंने वहाँ तीन वर्षों तक कठोर परिश्रम किया और नृत्य की बारीकियाँ आत्मसात कीं। इस एक फैसले ने उनके पूरे जीवन की दिशा बदल दी।
करियर की शुरुआत और अंतरराष्ट्रीय पहचान
भारत लौटने के बाद 1935 में जोहरा ने मशहूर नृत्य-गुरु उदय शंकर की डांस मंडली से अपने करियर की नींव रखी। इस मंडली के साथ उन्होंने जापान, मिस्र, यूरोप और अमेरिका सहित दर्जनों देशों में भारतीय नृत्य का परचम लहराया। बाद में वे उसी संस्थान में प्रशिक्षक भी बनीं। यहीं उनकी मुलाकात वैज्ञानिक, चित्रकार और नर्तक कामेश्वर सहगल से हुई। अलग धर्म और उम्र के अंतर के बावजूद दोनों ने विवाह किया — एक और निर्णय जिसने समाज में चर्चा तो जगाई, लेकिन जोहरा ने उसकी परवाह नहीं की।
विभाजन के बाद: रंगमंच और फिल्मों में नई पारी
देश के विभाजन के बाद जोहरा अपने परिवार के साथ मुंबई (तत्कालीन बंबई) आ गईं। यहाँ उन्होंने पृथ्वी थिएटर और इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) के साथ लंबे समय तक सक्रिय भूमिका निभाई। फिल्मों में उनकी पहली उपस्थिति 1946 में 'धरती के लाल' से हुई। इसके बाद 'नीचा नगर' ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई। दशकों के सफर में उन्होंने 'दिल से', 'हम दिल दे चुके सनम', 'वीर-ज़ारा', 'चीनी कम', 'कल हो ना हो' और 'साँवरिया' जैसी फिल्मों में यादगार किरदार निभाए। गौरतलब है कि उन्होंने नब्बे की उम्र के बाद भी अभिनय जारी रखा — यह अपने आप में एक अनूठी मिसाल है।
सम्मान और विरासत
जोहरा सहगल को कला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाज़ा गया। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, पद्म भूषण, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, कालिदास सम्मान और देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया। 10 जुलाई 2014 को 102 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनकी विरासत आज भी हर उस युवा को प्रेरित करती है जो सामाजिक बंधनों से परे अपने सपनों को जीना चाहता है।