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संजीव कुमार जयंती: 'कोशिश' के मूक किरदार से 'शोले' के ठाकुर तक, अभिनय के सम्राट की अमर विरासत

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संजीव कुमार जयंती: 'कोशिश' के मूक किरदार से 'शोले' के ठाकुर तक, अभिनय के सम्राट की अमर विरासत

सारांश

रंगमंच से रुपहले पर्दे तक का सफर तय करने वाले संजीव कुमार ने 'कोशिश' में मूक-बधिर की वेदना और 'शोले' में ठाकुर का प्रतिशोध — दोनों को समान गहराई से जिया। दो राष्ट्रीय पुरस्कार और अनगिनत यादगार किरदारों की विरासत छोड़ने वाले इस अभिनय सम्राट की आज जयंती है।

मुख्य बातें

संजीव कुमार का जन्म 9 जुलाई 1938 को गुजरात के सूरत में हुआ; असली नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला ।
'दस्तक' (1971) और 'कोशिश' (1973) — दोनों के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) मिला।
'नया दिन नयी रात' (1974) में एकल फिल्म में नौ अलग-अलग किरदार निभाए — हिंदी सिनेमा की दुर्लभ उपलब्धि।
'शोले' (1975) का ठाकुर बलदेव सिंह और 'कोशिश' का मूक-बधिर किरदार उनके अभिनय की बेमिसाल रेंज के प्रतीक हैं।
गृहनगर सूरत में ₹108 करोड़ की लागत से 'संजीव कुमार ऑडिटोरियम' बना; 2013 में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया।
6 नवंबर 1985 को निधन; मात्र 47 वर्ष की आयु में हिंदी सिनेमा का यह सितारा अस्त हो गया।

संजीव कुमार — असली नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला — का जन्म 9 जुलाई 1938 को गुजरात के सूरत में हुआ था। प्यार से 'हरिभाई' कहे जाने वाले इस अभिनेता की नींव मुंबई के इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) और इंडियन नेशनल थिएटर के मंच पर पड़ी थी। रंगमंच से सिनेमा तक का उनका सफर हिंदी फिल्म इतिहास के सबसे विलक्षण अध्यायों में से एक है।

रंगमंच से रुपहले पर्दे तक

मात्र 22 वर्ष की आयु में संजीव कुमार ने आर्थर मिलर के नाटक 'ऑल माई संस' में एक वृद्ध पिता की भूमिका निभाई — एक ऐसी उम्र में जब अधिकांश अभिनेता युवा नायक की भूमिकाओं के लिए संघर्ष करते हैं। इसके बाद एके हंगल के निर्देशन में नाटक 'डमरू' में उन्होंने 60 वर्षीय पिता का किरदार जीवंत किया। जब उन्होंने फिल्मों की ओर रुख किया, तो निर्देशक एस्पी ईरानी की सलाह पर उन्होंने अपना नाम 'संजय कुमार' से बदलकर 'संजीव कुमार' रख लिया — ताकि उभरते अभिनेता संजय खान के नाम से भ्रम न हो।

1960 में फिल्म 'हम हिंदुस्तानी' में एक छोटी-सी भूमिका से सिनेमाई यात्रा शुरू करने वाले संजीव कुमार ने अपनी सहजता और असाधारण प्रतिभा के बल पर हिंदी सिनेमा के स्थापित नायकों को चुनौती दी।

विनम्रता और समर्पण का पाठ

फिल्म 'आंधी' (1975) के सेट पर एक प्रसंग उनके अभिनय-धर्म की गहराई को उजागर करता है। एक दृश्य में उनके गुरु और वरिष्ठ कलाकार एके हंगल को संजीव कुमार का कोट उठाना था। संजीव कुमार ने आपत्ति जताई कि वे अपने सीनियर से ऐसा नहीं करवाएंगे। तब हंगल ने उन्हें समझाया कि कैमरे के सामने कलाकार केवल अपने चरित्र के प्रति जवाबदेह होता है, वास्तविक जीवन के पदानुक्रम के प्रति नहीं — और संजीव कुमार ने यह बात जीवनभर आत्मसात रखी।

अभिनय की बेमिसाल रेंज

संजीव कुमार की विविधता हिंदी सिनेमा में अद्वितीय रही। 'कोशिश' (1973) में उन्होंने एक मूक-बधिर व्यक्ति की मूक वेदना को इतनी गहराई से जिया कि संवाद की अनुपस्थिति भी दर्शकों को भीतर तक छू गई। 'नया दिन नयी रात' (1974) में उन्होंने नौ अलग-अलग रसों को दर्शाते नौ भिन्न किरदार एकल फिल्म में निभाए — एक ऐसा प्रदर्शन जिसे आज भी भारतीय सिनेमा की दुर्लभ उपलब्धि माना जाता है।

'शोले' (1975) में उनका ठाकुर बलदेव सिंह का किरदार तो इतिहास में अमर हो गया — बाहें कटी होने के बावजूद जो प्रतिशोध की ज्वाला आँखों से बोलती थी, वह संजीव कुमार के अभिनय की ताकत थी। 'अंगूर' (1982) में उनकी दोहरी हास्य भूमिका को समीक्षकों ने हिंदी सिनेमा का श्रेष्ठ कॉमेडी प्रदर्शन माना।

पुरस्कार और सम्मान

1968 में 'शिकार' के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार से उनकी प्रतिभा को पहली बड़ी पहचान मिली। 'खिलौना' (1970) ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। 'दस्तक' (1971) और 'कोशिश' (1973) — दोनों के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) प्राप्त हुआ। 'आंधी' (1975) और 'अर्जुन पंडित' (1976) के लिए उन्होंने फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार जीते।

अधूरा निजी जीवन और अमर विरासत

संजीव कुमार का निजी जीवन एक अधूरी दास्तान बनकर रह गया। कहा जाता है कि 'सीता और गीता' (1972) की शूटिंग के दौरान महाबलेश्वर में एक ट्रॉली हादसे में वे और हेमा मालिनी बाल-बाल बचे, जिसने दोनों को करीब ला दिया। विवाह की बात चली, उनकी माता शांतशरण ने सहमति भी दी — किंतु संजीव कुमार की यह पारंपरिक शर्त कि हेमा शादी के बाद अभिनय छोड़ दें, हेमा की माँ को स्वीकार्य नहीं थी, और यह रिश्ता टूट गया। बाद में सुलक्षणा पंडित ने उन्हें विवाह का प्रस्ताव दिया, लेकिन कथित तौर पर अपनी अकाल मृत्यु के पूर्वाभास के चलते उन्होंने किसी की ज़िंदगी न उजाड़ने का फैसला करते हुए मना कर दिया।

6 नवंबर 1985 को संजीव कुमार इस संसार से विदा हो गए। उनकी स्मृति में उनके गृहनगर सूरत में ₹108 करोड़ की लागत से 'संजीव कुमार ऑडिटोरियम' का निर्माण किया गया, और 2013 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया। उनकी विरासत आज भी हर उस अभिनेता को प्रेरित करती है जो किरदार को जीने में विश्वास रखता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि चरित्र के प्रति पूर्ण समर्पण से संभव हुआ। यह विचारणीय है कि आज जब OTT और डिजिटल मंच 'कैरेक्टर एक्टर' को नई प्रतिष्ठा दे रहे हैं, तब संजीव कुमार का मॉडल पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक लगता है। उनका अधूरा निजी जीवन भी उनकी कला की तरह ही बहुस्तरीय था — और शायद इसीलिए उनके किरदारों में इतनी मानवीय पीड़ा थी।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संजीव कुमार का असली नाम क्या था और उनका जन्म कब हुआ?
संजीव कुमार का असली नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला था और उनका जन्म 9 जुलाई 1938 को गुजरात के सूरत में हुआ था। उन्हें परिवार और करीबी लोग 'हरिभाई' कहकर बुलाते थे।
'कोशिश' (1973) में संजीव कुमार की भूमिका क्यों खास मानी जाती है?
'कोशिश' में संजीव कुमार ने एक मूक-बधिर व्यक्ति का किरदार निभाया और बिना एक भी संवाद बोले अपनी आँखों और शारीरिक भाषा से दर्शकों को भीतर तक छू लिया। इस अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) से सम्मानित किया गया।
संजीव कुमार ने अपना नाम क्यों बदला?
निर्देशक एस्पी ईरानी की सलाह पर उन्होंने 'संजय कुमार' से अपना नाम बदलकर 'संजीव कुमार' रखा, ताकि उभरते अभिनेता संजय खान के नाम से भ्रम की स्थिति न बने। यह बदलाव उनके फिल्मी करियर की शुरुआत के समय किया गया।
संजीव कुमार को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले?
संजीव कुमार को 'दस्तक' (1971) और 'कोशिश' (1973) के लिए दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) मिले। इसके अलावा 'शिकार' (1968) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और 'आंधी' (1975) तथा 'अर्जुन पंडित' (1976) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार भी उनके नाम हैं।
संजीव कुमार की विरासत को किस रूप में याद किया जाता है?
उनके गृहनगर सूरत में ₹108 करोड़ की लागत से 'संजीव कुमार ऑडिटोरियम' बनाया गया है। भारत सरकार ने 2013 में उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया और 6 नवंबर 1985 को मात्र 47 वर्ष की आयु में निधन के बावजूद उनके किरदार आज भी हिंदी सिनेमा की अमर धरोहर हैं।
राष्ट्र प्रेस
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