जीवन: सिर्फ ₹26 लेकर मुंबई पहुँचे, 60 फिल्मों में 'नारद मुनि' बने ओंकार नाथ धार
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के मशहूर खलनायक ओंकार नाथ धार, जिन्हें दुनिया 'जीवन' के नाम से जानती थी, की पुण्यतिथि 10 जून को मनाई जाती है। 1987 में इसी तारीख को 71 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था। जेब में महज ₹26 लेकर मुंबई पहुँचने वाले इस अभिनेता ने अपने अदम्य संघर्ष से हिंदी, पंजाबी और अन्य भाषाओं की तकरीबन 60 फिल्मों में 'नारद मुनि' की भूमिका निभाई और दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी।
संघर्ष से भरा बचपन और मुंबई का सफर
वर्ष 1915 में कश्मीर में जन्मे जीवन का जीवन शुरू से ही कठिनाइयों से भरा रहा। जन्म के तुरंत बाद माँ का साया उठ गया और 3 वर्ष की उम्र में पिता ने भी साथ छोड़ दिया। वे जिस परिवार में पले-बढ़े, वहाँ अभिनय को उचित नहीं माना जाता था। बचपन से अभिनेता बनने का सपना पालने वाले जीवन ने 18 वर्ष की उम्र में घर छोड़ा और केवल ₹26 लेकर मुंबई की राह पकड़ी।
मुंबई में शुरुआती दिन बेहद मुश्किल रहे। रोज़गार की तलाश में भटकते जीवन को अंततः जाने-माने निर्देशक मोहन लाल सिन्हा के स्टूडियो में काम मिला। जब सिन्हा को पता चला कि जीवन अभिनय में रुचि रखते हैं, तो उन्होंने उन्हें अपनी फिल्म 'फैशनेबल इंडिया' में मौका दिया — यहीं से एक लंबे सफर की शुरुआत हुई।
पहचान और करियर का उभार
वर्ष 1935 में बनी फिल्म 'रोमांटिक इंडिया' ने जीवन को असली पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1950 के दशक में बनी लगभग हर उल्लेखनीय फिल्म में उन्होंने 'नारद मुनि' का किरदार निभाया। यह भूमिका इतनी प्रभावशाली थी कि दर्शक उन्हें हिंदी फिल्म जगत का 'नारद मुनि' ही कहने लगे।
उन्होंने स्वयं यह भाँप लिया था कि उनका व्यक्तित्व पारंपरिक नायक की छवि में नहीं ढलता, इसलिए उन्होंने खलनायकी और चरित्र भूमिकाओं में अपना भविष्य तलाशा — और इसमें वे पूरी तरह सफल रहे।
यादगार फिल्में और विविध भूमिकाएँ
जीवन की फिल्मोग्राफी हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग का आईना है। 'अफसाना', 'स्टेशन मास्टर', 'अमर अकबर एंथनी' और 'धर्म-वीर' उनकी विशेष रूप से यादगार फिल्मों में गिनी जाती हैं। इसके अलावा नागिन, शबनम, हीर-रांझा, जॉनी मेरा नाम, कानून, सुरक्षा और लावारिस जैसी फिल्मों में भी उनके किरदारों ने दर्शकों पर गहरा प्रभाव डाला।
उन्होंने पंजाबी फिल्मों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। फोटोग्राफी, नृत्य, एक्शन और संगीत जैसे क्षेत्रों में भी उन्होंने हाथ आजमाया, हालाँकि इन क्षेत्रों में वह वैसी सफलता नहीं पा सके जैसी अभिनय में मिली।
'जीवन' नाम की कहानी
ओंकार नाथ धार को उनका स्क्रीन नाम 'जीवन' प्रसिद्ध फिल्मकार विजय भट्ट ने दिया था। यह नाम उनके व्यक्तित्व और अभिनय की जीवंतता का प्रतीक बन गया। 10 जून 1987 को 71 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ हिंदी सिनेमा ने एक ऐसा चेहरा खोया, जिसने दशकों तक परदे पर खलनायकी को एक नई ऊँचाई दी।