मराठी अभिनेत्री मधु कांबिकर का 73 साल में निधन, CM फडणवीस ने दी श्रद्धांजलि
सारांश
मुख्य बातें
मराठी सिनेमा, थिएटर और लावणी की प्रतिष्ठित कलाकार मधु कांबिकर का 12 अक्टूबर 2026 को पुणे में निधन हो गया। वे 73 वर्ष की थीं और लंबे समय से बीमार चल रही थीं। उनके जाने से मराठी मनोरंजन जगत और लोक कला की दुनिया में गहरी शोक की लहर है।
चार दशक का यादगार सफर
मधु कांबिकर ने चार दशकों से अधिक लंबे करियर में मराठी फिल्म, प्रोफेशनल थिएटर, लोक नाटक और टेलीविज़न सीरियल्स में अनगिनत यादगार किरदार निभाए। उनकी अभिनय शैली में महाराष्ट्र के ग्रामीण जीवन, स्थानीय बोली और लोक परंपराओं की जीवंत झलक मिलती थी।
उनकी चर्चित मराठी फिल्मों में 'हेच माझा माहेर', 'रघु मैना', 'एक होता विदूषक', 'झपाटलेला', 'शापित', 'देऊल' और 'येऊ का घरात' शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने हिंदी फिल्मों 'सूत्रधार', 'यशवंत' और 'हम दोनों' में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं।
लावणी को नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका
मधु कांबिकर का योगदान केवल अभिनय तक सीमित नहीं था। महाराष्ट्र की पारंपरिक लोक कला लावणी — जिसमें संगीत, नृत्य और अभिनय का विशिष्ट संगम होता है — को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाने में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। उनके प्रदर्शनों ने लावणी को शहरी और ग्रामीण दोनों वर्गों में लोकप्रिय बनाया।
गौरतलब है कि लावणी महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न अंग है, और इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में कांबिकर जैसी कलाकारों की भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है।
मुख्यमंत्री फडणवीस की श्रद्धांजलि
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शोक संदेश जारी करते हुए कहा, 'मधु कांबिकर के निधन की खबर बेहद दुखद है। उन्होंने फिल्मों, लोक नाटकों, प्रोफेशनल थिएटर और टीवी सीरियल्स में कई अहम किरदार निभाए।' फडणवीस ने आगे कहा, 'उन्होंने अपने अभिनय और डांस के शानदार मेल से ग्रामीण जीवन से जुड़ी लोक कलाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए लगातार काम किया। उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। मैं उन्हें दिल से श्रद्धांजलि देता हूँ और उनके परिवार व चाहने वालों के प्रति संवेदना व्यक्त करता हूँ।'
मराठी मनोरंजन जगत पर असर
मधु कांबिकर की विदाई मराठी सांस्कृतिक परिदृश्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है। यह ऐसे समय में आई है जब मराठी सिनेमा और लोक कला के संरक्षण को लेकर राज्य में व्यापक चर्चा हो रही है। उनकी पीढ़ी के कलाकारों ने मराठी मनोरंजन को उस ऊँचाई पर पहुँचाया, जिसकी नींव पर आज का उद्योग खड़ा है।
मधु कांबिकर की स्मृति उनकी फिल्मों, उनके लावणी प्रदर्शनों और महाराष्ट्र की लोक संस्कृति में जीवित रहेगी — एक ऐसी विरासत जिसे आने वाली पीढ़ियाँ याद रखेंगी।