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क्या यादों में महेंद्र देशभक्ति की आवाज हैं, जो हर बार 'अजनबी' बनने के लिए बेचैन रहे?

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क्या यादों में महेंद्र देशभक्ति की आवाज हैं, जो हर बार 'अजनबी' बनने के लिए बेचैन रहे?

सारांश

महेंद्र कपूर का सफर भारतीय संगीत के आकाश में एक अद्वितीय कहानी है। उनका जीवन उत्कृष्टता, संघर्ष और समर्पण का प्रतीक है। जानिए कैसे उन्होंने अपनी आवाज से देशभक्ति और भावनाओं को बखूबी व्यक्त किया।

मुख्य बातें

महेंद्र कपूर का जन्म 9 जनवरी 1934 को हुआ था।
उन्होंने संगीत की मजबूत नींव तैयार की।
उनकी आवाज ने हाई पिच पर गाकर सभी को हैरान किया।
महेंद्र कपूर ने 'उपकार' के लिए गाया 'मेरे देश की धरती' गाना देशभक्ति का प्रतीक है।
वे बीआर चोपड़ा की 'महाभारत' में भी गाए।

मुंबई, 8 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। यह घटना 1957 की है, जब मुंबई का मेट्रो सिनेमा हॉल पूरी तरह से भरा हुआ था। मंच पर नौशाद अली, अनिल बिस्वास, सी रामचंद्र और मदान मोहन जैसे महान संगीतकार उपस्थित थे। इस अवसर पर 'मर्फी ऑल इंडिया गायन प्रतियोगिता' का आयोजन किया जा रहा था। उसी समय एक युवा मंच पर आया और जैसे ही उसने "इलाही कोई तमन्ना नहीं जमाने में, मेरी जवानी तो गुजरी शराबखाने में..." गाया, पूरा हॉल सन्न रह गया।

जजों की आंखों में चमक थी, लेकिन पर्दे के पीछे साजिशें भी कम नहीं थीं। एक प्रतिद्वंद्वी ने यह आरोप लगाया कि यह लड़का एक पेशेवर गायक है, जिसने एक फिल्म में गाया है। मामला इतना बढ़ गया कि युवा का करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता, अगर अनिल बिस्वास उसकी रक्षा में खड़े न होते। वह युवा न केवल विजेता बना, बल्कि भारतीय संगीत के आकाश पर 'महेंद्र कपूर' नाम का सूरज बनकर चमका।

9 जनवरी 1934 को अमृतसर में जन्मे महेंद्र कपूर का परिवार कपड़ों के व्यापार में था। लेकिन महेंद्र के कानों में संगीत की झंकार गूंजती थी। जब परिवार मुंबई आया, तो महेंद्र कपूर के लिए सपनों के द्वार खुल गए। वे मोहम्मद रफी को अपना 'गुरु' मानते थे।

महेंद्र कपूर ने शास्त्रीय संगीत की एक मजबूत नींव बनाई, जो आज के दौर के गायकों के लिए एक मिसाल है। पंडित हुस्नलाल, उस्ताद नियाज अहमद खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान जैसे महान कलाकारों से सीखने ने उनकी आवाज को वह 'मस्कुलरिटी' और 'रेजोनेंस' दिया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी।

वे जब उच्च स्वर में गाते थे, तो सुनने वाले हैरान रह जाते थे। फिल्म 'नवरंग' का 'आधा है चंद्रमा रात आधी' हो या 'गुमराह' का कालजयी गीत 'चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों', उनकी आवाज में विरह और मिलन के भाव एक साथ बहते थे।

1967 में आई फिल्म 'उपकार' के लिए जब उन्होंने 'मेरे देश की धरती' गाया, तो यह केवल एक गाना नहीं, बल्कि देशभक्ति का 'सिग्नेचर टोन' बन गया।

फिल्म जगत में महेंद्र कपूर का सबसे सफल जुड़ाव बीआर चोपड़ा और संगीतकार रवि के साथ रहा। जब रफी साहब और चोपड़ा साहब के बीच कुछ वैचारिक मतभेद हुए, तो महेंद्र कपूर को 'हमराज' और 'गुमराह' जैसी फिल्मों में अपनी संगीत कला दिखाने का मौका मिला। 'नीले गगन के तले' जैसे गीतों ने उन्हें फिल्मफेयर की ट्राफियां दिलाईं।

1980 के दशक के अंत में, जब पूरा भारत रविवार की सुबह सड़कों से गायब होकर टेलीविजन के सामने बैठ जाता था, तब जो पहली आवाज कानों में पड़ती थी, वह थी, "अथ श्री महाभारत कथा..."बीआर चोपड़ा की 'महाभारत' में महेंद्र कपूर के गाए दोहे और श्लोक आज भी लोगों के जेहन में रचे-बसे हैं। 'यदा यदा ही धर्मस्य' को उन्होंने जिस गंभीरता और भक्ति के साथ स्वर दिया, उसने उन्हें घर-घर में अमर कर दिया।

महेंद्र कपूर केवल हिंदी में सीमित नहीं रहे। उन्होंने मराठी सिनेमा में दादा कोंडके की आवाज बनकर धूम मचाई। इतना ही नहीं, वे पहले भारतीय पार्श्व गायक थे, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'बोनी एम' के साथ 'एम-3' एल्बम के लिए पॉप गीत रिकॉर्ड किए। वे गुजराती फिल्मों के लिए लगातार छह वर्षों तक राज्य पुरस्कार जीतते रहे।

उन्होंने हमेशा मोहम्मद रफी को अपना गुरु माना। 27 सितंबर 2008 को उनकी हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महेंद्र कपूर का जन्म कब हुआ?
महेंद्र कपूर का जन्म 9 जनवरी 1934 को अमृतसर में हुआ था।
महेंद्र कपूर ने किस प्रसिद्ध गायक को अपना गुरु माना?
महेंद्र कपूर ने मोहम्मद रफी को अपना गुरु माना।
महेंद्र कपूर ने किस फिल्म के लिए 'मेरे देश की धरती' गाया?
महेंद्र कपूर ने 1967 में आई फिल्म 'उपकार' के लिए 'मेरे देश की धरती' गाया।
महेंद्र कपूर की प्रसिद्धि का प्रमुख कारण क्या था?
महेंद्र कपूर की प्रसिद्धि का प्रमुख कारण उनकी अद्वितीय आवाज और देशभक्ति के गीत थे।
महेंद्र कपूर का निधन कब हुआ?
महेंद्र कपूर का निधन 27 सितंबर 2008 को हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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