क्या बिमल रॉय महिला-केंद्रित कहानियों के मास्टर थे, जिन्होंने स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखा?
सारांश
Key Takeaways
- बिमल रॉय ने महिलाओं की आवाज को सशक्त किया।
- उनकी फिल्में सामाजिक सच्चाइयों को दर्शाती हैं।
- महिला पात्रों का संघर्ष उनकी फिल्मों में महत्वपूर्ण है।
- उन्होंने समानांतर सिनेमा को नया दिशा दी।
- उनकी कृतियाँ आज भी प्रासंगिक हैं।
मुंबई, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय सिनेमा के क्षेत्र में बिमल रॉय एक ऐसे निर्देशक थे, जिनकी फिल्में न केवल मनोरंजन करती थीं, बल्कि समाज की सच्चाई, आम जनता की पीड़ा और महिलाओं की चुनौतियों को भी उजागर करती थीं। उनकी अधिकतर कृतियों में महिला पात्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उनके संघर्ष, साहस और संवेदनाएं फिल्म की गहराई को बढ़ाती थीं। यह सब पटकथा की क्षमता के साथ-साथ बिमल रॉय की गहरी दृष्टि का प्रमाण है।
बिमल रॉय का जन्म 12 जुलाई 1909 को एक जमींदार परिवार में हुआ। पिता की मृत्यु के बाद उन्हें पारिवारिक संकटों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जमींदारी से बेदखली के अनुभव ने उन्हें समाज के अन्याय और कमजोर वर्गों की पीड़ा को समझने की क्षमता दी।
उन्होंने कोलकाता जाकर न्यू थिएटर्स में कैमरा असिस्टेंट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। वहीं उन्होंने अपनी पहली महत्वपूर्ण फिल्म 'देवदास' (1935) में प्रचार फोटोग्राफर के रूप में काम किया।
1940 और 1950 के दशक में बिमल रॉय समानांतर सिनेमा के एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन गए। उनका करियर का नया अध्याय तब शुरू हुआ जब उन्होंने मुंबई में अपनी टीम के साथ काम करना शुरू किया। उनकी पहली महिला-केंद्रित फिल्में जैसे 'दो बीघा जमीन' (1953) और 'परिणीता' (1953) ने दर्शकों और आलोचकों का ध्यान आकर्षित किया। 'दो बीघा जमीन' में निरुपा रॉय का किरदार आम किसान की पीड़ा को प्रदर्शित करता है, जबकि 'परिणीता' में मीना कुमारी ने महिला संघर्ष और संवेदनाओं को खूबसूरती से प्रस्तुत किया।
बिमल रॉय की फिल्मों में महिलाओं को केवल सहायक पात्रों के रूप में नहीं दिखाया गया। 'बिराज बहू' (1954) में मुख्य पात्र बिराज (कामिनी कौशल) को अपने परिवार और समाज के दबावों के बीच संघर्ष करते हुए दिखाया गया। इसी प्रकार 'सुजाता' (1959) में सामाजिक भेदभाव और महिलाओं की स्वतंत्रता को मजबूती से उजागर किया गया। इन फिल्मों में महिला पात्रों की भावनाओं और उनके साहस को बड़े सम्मान के साथ दर्शाया गया।
उनकी सबसे प्रसिद्ध फिल्म 'मधुमती' (1958) भी एक महिला पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें वैजयन्ती माला ने मुख्य भूमिका निभाई। इस फिल्म में उनके किरदार की यादें, प्यार और संघर्ष को शानदार तरीके से प्रस्तुत किया गया। 'बंदिनी' (1963) में कैदी महिला पात्र की मानसिक और भावनात्मक यात्रा को दर्शकों तक पहुंचाया गया।
बिमल रॉय ने अपने करियर में 11 फिल्मफेयर पुरस्कार और कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। उनकी फिल्मों में संगीत, संवाद और अभिनय का तालमेल समाज और भावनाओं को मजबूती से प्रदर्शित करता था। 'परख', 'यहूदी', 'प्रेम पत्र', 'मां', 'अंजनगढ़', 'नौकरी', और अन्य कई फिल्में व्यावसायिक रूप से सफल रहीं और महिला-केंद्रित कहानी बनीं।
बिमल रॉय का निधन 7 जनवरी 1966 को हुआ, लेकिन उनके काम और फिल्में आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। यही कारण है कि उन्हें आज भी 'साइलेंट डायरेक्टर ऑफ इंडियन सिनेमा' कहा जाता है।