क्या नेशनल गर्ल चाइल्ड डे पर बॉलीवुड की फिल्मों ने 'बेटियों' की असली परिभाषा बताई?
सारांश
Key Takeaways
- बेटियों की शक्ति और प्रतिभा को पहचानें।
- समाज में लैंगिक भेदभाव को खत्म करने की आवश्यकता है।
- बॉलीवुड फिल्मों ने बेटियों के अधिकार को बढ़ावा दिया है।
- महिलाओं की कहानियों को सुनना और समझना महत्वपूर्ण है।
- बेटियों को सशक्त बनाना हमारी जिम्मेदारी है।
मुंबई, 23 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। हर साल 24 जनवरी को भारत में नेशनल गर्ल चाइल्ड डे मनाया जाता है। यह दिन बेटियों की महत्वपूर्णता, उनके अधिकारों और आत्मविश्वास को सम्मान देने का प्रतीक है। यह पूरे समाज को याद दिलाने का एक साधन है कि बेटियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। वे अपनी मेहनत, साहस और प्रतिभा से दुनिया को बदलने की क्षमता रखती हैं। इसी सोच को बॉलीवुड ने अपनी फिल्मों के माध्यम से भी आगे बढ़ाया है।
मनोरंजन के साथ-साथ ये फिल्में समाज में व्याप्त रूढ़ियों को चुनौती देती हैं। इस विशेष दिन के अवसर पर हम उन फिल्मों पर चर्चा करेंगे जिन्होंने बेटी की परिभाषा में महत्वपूर्ण बदलाव लाया है।
'दंगल' - फिल्म 'दंगल' ने दर्शकों को यह दिखाया कि बेटियां सिर्फ घर की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने वाली चैंपियन भी बन सकती हैं। हरियाणा के एक छोटे से गांव की कहानी बताती है कि कैसे महावीर सिंह फोगाट ने अपनी बेटियों गीता और बबीता को पहलवानी में प्रशिक्षित किया। आमिर खान ने महावीर का किरदार निभाया है, जबकि फातिमा सना शेख और सान्या मल्होत्रा ने बेटियों का रोल निभाया है। फिल्म में संघर्ष, मेहनत और जीत का अद्भुत मिश्रण है। नितेश तिवारी के निर्देशन में बनी यह फिल्म रोचक और भावनात्मक है। इसने यह संदेश दिया कि अगर बराबर के मौके और समर्थन मिले, तो बेटियां किसी से कम नहीं हैं।
'मर्दानी' - 'मर्दानी' की कहानी भी महिलाओं की शक्ति और साहस का प्रतीक है। रानी मुखर्जी ने इस फिल्म में आईपीएस अफसर शिवानी शिवाजी रॉय का किरदार निभाया है, जो एक साइको किलर और अपराध के खिलाफ अकेले खड़ी होती हैं। 'मर्दानी 2' में कहानी और भी रोमांचक है, जहां रानी ने किलर का पर्दाफाश किया। अब तीसरे पार्ट के आने से पहले पहले दो पार्ट्स ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड कर रहे हैं। निर्देशक रवींद्र मथुर ने फिल्म में अपराध और साहस का संतुलन बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया है। इस फिल्म ने साबित किया कि बेटियां सिर्फ सहनशील या संवेदनशील नहीं हैं, बल्कि नैतिक साहस और नेतृत्व की मिसाल भी बन सकती हैं।
'गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल' - ये वास्तविक जीवन की कहानी पर आधारित है। जान्हवी कपूर ने इस फिल्म में लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना का रोल निभाया है, जिन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान हेलीकॉप्टर से मिशन पूरा किया। पंकज त्रिपाठी ने गुंजन के पिता का किरदार निभाया, जो बेटी के सपनों में उसके सबसे बड़े साथी हैं। निर्देशक शरण शर्मा ने महिलाओं के खिलाफ सामाजिक पूर्वाग्रह और लैंगिक भेदभाव को खूबसूरती के साथ पर्दे पर उतारा। फिल्म दिखाती है कि बेटियां अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से किसी भी कठिन क्षेत्र में कदम रख सकती हैं और सफलता हासिल कर सकती हैं।
'नीरजा' - 'नीरजा' फिल्म ने न केवल बहादुरी को, बल्कि इंसानियत और निस्वार्थ बलिदान को भी पर्दे पर उतारा। सोनम कपूर ने फ्लाइट अटेंडेंट नीरजा भनोट का किरदार निभाया, जिन्होंने 1986 में हाइजैक हुई पैन एम फ्लाइट 73 में यात्रियों की जान बचाई और खुद शहीद हो गईं। शबाना आजमी ने नीरजा की मां का रोल निभाते हुए हर सीन को भावनाओं से भर दिया। निर्देशक राम माधवानी ने कहानी को रोचक बनाने के लिए फ्लैशबैक का बेहतरीन इस्तेमाल किया। यह फिल्म यह संदेश देती है कि बेटियां न केवल साहसी होती हैं, बल्कि दूसरों की भलाई के लिए अपनी जान तक देने का हौसला रखती हैं।
'मिमी' - सरोगेसी पर आधारित फिल्म 'मिमी' समाज में मातृत्व को समझने का एक नया दृष्टिकोण देती है। कृति सेनन ने मिमी का किरदार निभाया, जो अमेरिका के एक कपल के लिए सरोगेट मदर बनती हैं। पंकज त्रिपाठी ने उनके ड्राइवर भानु का रोल निभाया है। फिल्म यह दिखाती है कि बेटियां अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेने और समाज की राय से ऊपर उठकर अपने आत्मसम्मान को चुन सकती हैं। मेकर्स ने कहानी को सरल, भावनात्मक और सामाजिक दृष्टिकोण से प्रभावशाली बनाया है।