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क्या इन आदतों को नहीं छोड़ने पर बीमारी को आमंत्रित कर रहे हैं?

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क्या इन आदतों को नहीं छोड़ने पर बीमारी को आमंत्रित कर रहे हैं?

सारांश

क्या आप जानते हैं कि कुछ रोज़मर्रा की आदतें आपको बीमार कर सकती हैं? इस लेख में जानें कैसे इन आदतों को पहचानकर और छोड़कर अपने स्वास्थ्य को बनाए रख सकते हैं।

मुख्य बातें

प्रज्ञापराध से बचें, यह स्वास्थ्य को खतरे में डाल सकता है।
पाचन अग्नि का ध्यान रखें, यह शरीर की ऊर्जा का केंद्र है।
रोगों की जड़ को पहचानना आवश्यक है।
दोषों का संतुलन बनाए रखें।
स्वस्थ आदतें अपनाएँ और बीमारियों से बचें।

नई दिल्ली, 23 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। जब भी शरीर बीमार होता है, तो अक्सर हम बिना बीमारी के कारण को जाने दवा लेकर खुद को ठीक करने की कोशिश करते हैं। दवा थोड़े समय के लिए आराम देती है, लेकिन कुछ समय बाद बीमारी फिर से हमें घेर लेती है।

आयुर्वेद के अनुसार, केवल बीमारी का इलाज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बीमारी की जड़ को पहचानना और उसे समाप्त करना आवश्यक है। यदि हम बीमारी की जड़ को समझ लेते हैं, तो बीमारी अपने आप खत्म हो जाती है।

आयुर्वेद में यह माना जाता है कि भले ही शरीर बाहरी वातावरण से प्रभावित होता है, लेकिन असली समस्या हमारे अंदर ही छिपी होती है। यहाँ रोग की जड़ को पहचानने के लिए इसे तीन मुख्य भागों में विभाजित किया गया है, जिससे कुछ आदतों को सुधारकर हम रोगों से मुक्ति पा सकते हैं।

पहली जड़ है प्रज्ञापराध, यानी जानबूझकर ऐसी चीजें करना जिससे शरीर बीमार हो सकता है। इसमें जानकर भी गलत आहार लेना, भूख न लगने पर भी खाना, थकान होने पर आराम न करना, लगातार गुस्सा और चिंता करना, और नींद को नजरअंदाज करना शामिल है। ये सभी कारण एक स्वस्थ शरीर को बीमार करने के लिए काफी हैं और यही रोग की पहली जड़ भी है।

दूसरी जड़ है अग्नि का नाश। पाचन अग्नि केवल भोजन पचाने में सहायक नहीं है, बल्कि यह शरीर का ऊर्जा केंद्र भी है। प्रज्ञापराध के कारण पाचन अग्नि प्रभावित होती है, जिससे भोजन पचने के बजाय शरीर में सड़ने लगता है। इस स्थिति में, कितना भी प्रोटीन या विटामिन से भरपूर भोजन हो, वह शरीर को पूरा पोषण नहीं दे पाता, जिससे धीरे-धीरे आम जमा होने लगता है।

तीसरी जड़ है दोषों का विकार। हमारे शरीर को संतुलित रखने के लिए तीन दोष होते हैं - वात, कफ और पित्त। यदि ये तीनों दोष संतुलित हैं, तो शरीर रोगों से सुरक्षित रहता है। लेकिन जब अग्नि का नाश और आम का जमाव होता है, तो ये दोष असंतुलित हो जाते हैं, जिससे पेट, सांस, और हड्डियों से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं। हम इनसे निपटने के लिए दवा लेते हैं, लेकिन बीमारी की जड़ को पहचानना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि इसे जड़ से समाप्त किया जा सके।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह कहना आवश्यक है कि स्वास्थ्य का ध्यान रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। बीमारी की जड़ को पहचानना और सही कदम उठाना हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
RashtraPress
27 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या आयुर्वेद से रोगों का इलाज संभव है?
हाँ, आयुर्वेद में रोगों की जड़ को पहचानकर उनका उपचार करने की विधियाँ मौजूद हैं।
प्रज्ञापराध क्या है?
प्रज्ञापराध का अर्थ है जानबूझकर ऐसी गतिविधियाँ करना जो स्वास्थ्य को खतरे में डालती हैं।
अग्नि का नाश कैसे होता है?
गलत आहार और अस्वस्थ आदतें पाचन अग्नि को नष्ट कर सकती हैं।
दोषों का विकार क्या है?
शरीर के तीन दोष वात, कफ और पित्त संतुलित रहने पर ही स्वास्थ्य ठीक रहता है।
क्या दवा लेना सही है?
दवा लेना आवश्यक हो सकता है, लेकिन बीमारी की जड़ को समझना भी महत्वपूर्ण है।
राष्ट्र प्रेस
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