भोजपुरी सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए निरहुआ ने उठाई मांग — मंझे निर्देशकों को वापस लाना जरूरी
सारांश
Key Takeaways
- अभिनेता दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' ने 23 अप्रैल को इंस्टाग्राम पर पॉडकास्ट वीडियो के जरिए भोजपुरी सिनेमा के विकास पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
- निरहुआ ने कहा कि केवल सरकारी सब्सिडी से भोजपुरी इंडस्ट्री का संपूर्ण विकास संभव नहीं है।
- उन्होंने सरकार से एक पेशेवर फिल्म प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने की मांग की ताकि युवाओं को फिल्म निर्माण की बारीकियां सिखाई जा सकें।
- निरहुआ ने सुझाया कि भोजपुरी भाषी अनुभवी निर्देशकों और तकनीशियनों को वापस लाने के लिए सरकार को विशेष बजट निर्धारित करना चाहिए।
- भोजपुरी बोलने वाले मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी सहित कई देशों में करोड़ों की संख्या में हैं, जो इंडस्ट्री की वैश्विक संभावनाओं को दर्शाता है।
- निरहुआ का मानना है कि सही संसाधन और प्राथमिकता मिलने पर भोजपुरी में विश्व स्तरीय कंटेंट बनाया जा सकता है।
मुंबई, 23 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में अभिनेता दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' ने एक महत्वपूर्ण आवाज उठाई है। गुरुवार, 23 अप्रैल को उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक पॉडकास्ट वीडियो साझा करते हुए कहा कि भोजपुरी सिनेमा को सही दिशा देने के लिए केवल सरकारी सब्सिडी पर्याप्त नहीं है, बल्कि पेशेवर फिल्म प्रशिक्षण संस्थान और अनुभवी निर्देशकों की वापसी अनिवार्य है।
भोजपुरी इंडस्ट्री की मौजूदा स्थिति
एक समय जो भोजपुरी सिनेमा केवल क्षेत्रीय मनोरंजन का माध्यम माना जाता था, वह आज करोड़ों रुपये के व्यवसाय में तब्दील हो चुका है। मनोज तिवारी और रवि किशन जैसे कलाकारों ने इसी इंडस्ट्री से अपनी पहचान बनाई और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। आज खेसारी लाल यादव और दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' जैसे सुपरस्टार इस उद्योग की अगुवाई कर रहे हैं।
इंडस्ट्री की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद तकनीकी दक्षता और पेशेवर निर्देशन की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यही वजह है कि निरहुआ जैसे वरिष्ठ कलाकार अब इंडस्ट्री के भीतर से ही सुधार की मांग उठा रहे हैं।
निरहुआ की मुख्य मांगें और सुझाव
निरहुआ ने अपने पॉडकास्ट में स्पष्ट कहा, "सिर्फ सब्सिडी दे देने से काम नहीं चलेगा।" उन्होंने सरकार से मांग की कि एक ऐसा फिल्म प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किया जाए, जहां युवाओं को फिल्म निर्माण की बारीकियां सिखाई जाएं। उनका मानना है कि जब विधिवत प्रशिक्षित लोग इंडस्ट्री में आएंगे, तो कंटेंट की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि "बहुत सी बड़ी इंडस्ट्रीज में ऐसे निर्देशक और तकनीशियन काम कर रहे हैं, जो मूलतः भोजपुरी भाषी क्षेत्रों से आते हैं।" सरकार को एक विशेष बजट निर्धारित कर इन प्रतिभाशाली और अनुभवी निर्देशकों को भोजपुरी सिनेमा की ओर आकर्षित करना चाहिए।
वैश्विक कंटेंट और भोजपुरी संस्कृति का सही चित्रण
निरहुआ ने विश्वास जताया कि यदि मंझे हुए कलाकारों और निर्देशकों को उचित संसाधन और प्राथमिकता दी जाए, तो वे अपनी मातृभाषा भोजपुरी में विश्व स्तरीय कंटेंट तैयार कर सकते हैं। इससे न केवल रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे, बल्कि भोजपुरी संस्कृति का सकारात्मक और प्रामाणिक चित्रण भी वैश्विक दर्शकों तक पहुंचेगा।
उन्होंने यह भी बताया कि वे और उनकी टीम इस दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं ताकि भोजपुरी सिनेमा को एक नई गरिमा और वैश्विक पहचान मिल सके।
गहरा संदर्भ — क्यों महत्वपूर्ण है यह मांग?
गौरतलब है कि भोजपुरी भाषा बोलने वालों की संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के अलावा मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी और त्रिनिदाद जैसे देशों में भी करोड़ों में है। इतने विशाल दर्शक वर्ग के बावजूद भोजपुरी सिनेमा अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में अभी तक सीमित रहा है।
तमिल और तेलुगु सिनेमा ने जिस तरह ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और अंतरराष्ट्रीय वितरण के जरिए वैश्विक पहचान हासिल की है, वह भोजपुरी इंडस्ट्री के लिए एक सबक है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्किल डेवलपमेंट और पेशेवर निर्देशन के बिना यह अंतर पाटना कठिन होगा।
निरहुआ की यह मांग ऐसे समय में आई है जब केंद्र सरकार क्षेत्रीय भाषाओं के प्रोत्साहन के लिए कई योजनाएं चला रही है। यदि सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाती है, तो यह भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।
आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार निरहुआ जैसे कलाकारों की इस मांग पर कोई नीतिगत कदम उठाती है और क्या भोजपुरी सिनेमा सच में वैश्विक मंच पर अपनी जगह बना पाता है।