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'फुल्लू' के 9 साल: शारिब हाशमी ने कहा — पीरियड्स पर झिझक तोड़ने वाली पहली हिंदी फिल्म

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'फुल्लू' के 9 साल: शारिब हाशमी ने कहा — पीरियड्स पर झिझक तोड़ने वाली पहली हिंदी फिल्म

सारांश

'फुल्लू' को 9 साल हो गए — और शारिब हाशमी की इंस्टाग्राम पोस्ट याद दिलाती है कि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक सामाजिक पहल थी। पीरियड्स जैसे वर्जित विषय को ग्रामीण पर्दे पर लाने का साहस हिंदी सिनेमा में उस दौर में दुर्लभ था।

मुख्य बातें

शारिब हाशमी ने 16 जून 2025 को फिल्म 'फुल्लू' के 9 साल पूरे होने पर इंस्टाग्राम पर अनदेखी तस्वीरें साझा कीं।
हाशमी ने 'फुल्लू' को पीरियड्स और उससे जुड़ी सामाजिक झिझक को तोड़ने वाली पहली हिंदी फिल्म बताया।
फिल्म का निर्देशन अभिषेक सक्सेना ने किया था; मुख्य भूमिकाओं में शारिब हाशमी और ज्योति सेठी थे।
फिल्म की कहानी एक ग्रामीण युवक के इर्द-गिर्द है जो गाँव की महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड बनाना सीखता है और सामाजिक वर्जनाओं से लड़ता है।
हाशमी ने इस फिल्म को अपने करियर का हमेशा खास अनुभव बताया।

अभिनेता शारिब हाशमी ने 16 जून 2025 को अपनी चर्चित फिल्म 'फुल्लू' के 9 साल पूरे होने पर इंस्टाग्राम पर एक भावुक पोस्ट साझा की, जिसमें उन्होंने फिल्म को पीरियड्स से जुड़ी सामाजिक झिझक को तोड़ने वाली पहली हिंदी फिल्म करार दिया। इस पोस्ट के साथ उन्होंने शूटिंग के दौरान के अनदेखे पल और गाँव की पृष्ठभूमि में खींची गई तस्वीरें भी साझा कीं।

शारिब हाशमी का भावुक संदेश

अपनी इंस्टाग्राम पोस्ट के कैप्शन में शारिब हाशमी ने लिखा, 'फुल्लू' को 9 साल पूरे हो गए हैं। यह पहली हिंदी फिल्म थी, जिसने पीरियड्स और उससे जुड़ी सामाजिक झिझक को तोड़ने की कोशिश की थी। ऐसी पहली पहल का हिस्सा बनना मेरे लिए गर्व की बात है और यह अनुभव करियर में हमेशा खास रहेगा।' साझा की गई तस्वीरों में सेट पर कलाकारों के साथ बिताए खास पल और गाँव के दृश्य नज़र आ रहे हैं।

फिल्म का सामाजिक संदेश

निर्देशक अभिषेक सक्सेना द्वारा बनाई गई 'फुल्लू' ग्रामीण भारत की पृष्ठभूमि पर आधारित एक संवेदनशील सामाजिक कहानी है। फिल्म में शारिब हाशमी के साथ अभिनेत्री ज्योति सेठी मुख्य भूमिका में नज़र आईं। यह फिल्म माहवारी स्वच्छता जैसे उस विषय को केंद्र में लाई, जिस पर हिंदी सिनेमा ने अब तक चुप्पी साधे रखी थी।

कहानी का सार

फिल्म की कहानी एक सरल और मासूम ग्रामीण युवक फुल्लू के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो गाँव की महिलाओं के लिए शहर से ज़रूरी सामान लाता है। गाँव के लोग उसकी इस आदत का मज़ाक उड़ाते हैं, लेकिन वह अपने स्वभाव से पीछे नहीं हटता। कहानी में निर्णायक मोड़ तब आता है जब उसे माहवारी स्वच्छता के बारे में जानकारी मिलती है — वह जानता है कि गाँव की महिलाएं पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

फुल्लू का संघर्ष और जागरूकता अभियान

इस जानकारी के बाद फुल्लू शहर की एक फैक्ट्री में काम करके सैनिटरी पैड बनाने की प्रक्रिया सीखता है और गाँव लौटकर महिलाओं को जागरूक करने की ठानता है। गाँव में उसे अविश्वास और उपहास का सामना करना पड़ता है, फिर भी वह अपने मिशन से नहीं डिगता। यह कहानी वास्तविक जीवन के उन अनगिनत लोगों को श्रद्धांजलि है जो सामाजिक वर्जनाओं के विरुद्ध खड़े होते हैं।

हिंदी सिनेमा में एक अलग पहल

गौरतलब है कि जिस दौर में 'फुल्लू' आई, उस समय माहवारी जैसे विषयों पर मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा प्रायः मौन रहता था। यह फिल्म इस मायने में एक साहसिक प्रयोग थी। आज, 9 साल बाद भी, शारिब हाशमी इस फिल्म को अपने करियर की एक विशेष उपलब्धि मानते हैं — और उनकी यह भावना इस विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह खुद एक बड़ी सामाजिक टिप्पणी है। शारिब हाशमी की यह पोस्ट सिर्फ एक सालगिरह नहीं, बल्कि उस रिक्तता की याद दिलाती है जिसे भरने की ज़िम्मेदारी फिल्म उद्योग की है।
RashtraPress
1 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फिल्म 'फुल्लू' किस विषय पर आधारित है?
'फुल्लू' माहवारी स्वच्छता और उससे जुड़ी सामाजिक वर्जनाओं पर आधारित हिंदी फिल्म है। इसमें एक ग्रामीण युवक की कहानी है जो गाँव की महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने का संकल्प लेता है।
शारिब हाशमी ने 'फुल्लू' की 9वीं वर्षगांठ पर क्या कहा?
शारिब हाशमी ने इंस्टाग्राम पर लिखा कि 'फुल्लू' पहली हिंदी फिल्म थी जिसने पीरियड्स और उससे जुड़ी सामाजिक झिझक को तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने इसे अपने करियर का हमेशा खास अनुभव बताया।
'फुल्लू' फिल्म का निर्देशन किसने किया और इसमें कौन-कौन से कलाकार थे?
फिल्म का निर्देशन अभिषेक सक्सेना ने किया था। मुख्य भूमिकाओं में शारिब हाशमी और ज्योति सेठी नज़र आए।
फिल्म 'फुल्लू' में फुल्लू का किरदार कैसा है?
फुल्लू एक सरल और मासूम ग्रामीण युवक है जो शहर से महिलाओं के लिए ज़रूरी सामान लाता है। जब उसे माहवारी स्वच्छता की जानकारी मिलती है, तो वह सैनिटरी पैड बनाना सीखकर गाँव की महिलाओं की मदद करने की ठानता है।
क्या 'फुल्लू' हिंदी सिनेमा में पीरियड्स पर बनी पहली फिल्म थी?
शारिब हाशमी के अनुसार, 'फुल्लू' पहली हिंदी फिल्म थी जिसने पीरियड्स से जुड़ी सामाजिक झिझक को सीधे संबोधित किया। यह दावा उनकी इंस्टाग्राम पोस्ट में किया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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