शंकर का जन्मदिन: बिना पूछे दिलाई जयकिशन को नौकरी, ऐसे जन्मी हिंदी सिनेमा की सबसे मशहूर संगीत जोड़ी
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित संगीत जोड़ियों में शुमार शंकर-जयकिशन की दोस्ती और साझेदारी की शुरुआत एक ऐसे किस्से से हुई, जो आज भी फिल्म संगीत के इतिहास में दिलचस्पी से सुनाया जाता है। 15 अक्टूबर 1922 को जन्मे शंकर सिंह रघुवंशी की जयंती के अवसर पर याद आता है वह पल, जब शंकर ने पृथ्वीराज कपूर से बिना पूछे ही जयकिशन पंचाल को पृथ्वी थिएटर में हारमोनियम बजाने की नौकरी दिलाने का वादा कर दिया था।
मुलाकात का किस्सा
मुंबई आने के बाद शंकर का जुड़ाव पृथ्वी थिएटर से हुआ, जिसकी स्थापना अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने की थी। शंकर प्रायः गुजराती फिल्ममेकर चंद्रवदन भट्ट के कार्यालय के चक्कर लगाते थे, इस उम्मीद में कि भट्ट उन्हें बतौर संगीतकार काम देंगे। इसी कार्यालय के आसपास उनकी नजर जयकिशन पंचाल पर पड़ी, जो वहाँ हारमोनियम बजाते हुए काम की तलाश में आते थे।
शुरुआत में दोनों एक-दूसरे को देखते थे, लेकिन बातचीत नहीं होती थी। एक दिन शंकर ने खुद पहल की। बातचीत में पता चला कि दोनों की संगीत के प्रति सोच और दिलचस्पी लगभग एक जैसी है। शंकर को जयकिशन की प्रतिभा पर भरोसा हो गया और उन्होंने तत्काल पृथ्वी थिएटर में हारमोनियम प्लेयर की नौकरी दिलाने का वचन दे दिया — बिना पृथ्वीराज कपूर से पहले पूछे।
पृथ्वीराज कपूर की सहमति और आगे की राह
दिलचस्प बात यह है कि बाद में पृथ्वीराज कपूर ने शंकर के इस एकतरफा फैसले को स्वीकार कर लिया और जयकिशन को थिएटर में काम मिल गया। पृथ्वी थिएटर में साथ काम करते हुए दोनों की मित्रता और गहरी होती चली गई। इसी दौरान उनकी मुलाकात राज कपूर से हुई, जो अपने पिता के थिएटर से जुड़े माहौल में काम कर रहे थे।
यह ऐसे समय में आया जब हिंदी सिनेमा के संगीत में बड़े ऑर्केस्ट्रा और पाश्चात्य धुनों का मेल भारतीय धुनों से करने की कोशिशें हो रही थीं। शंकर-जयकिशन ने इस परंपरा को एक नई ऊँचाई दी।
बरसात से शुरू हुआ स्वर्णिम सफर
राज कपूर की फिल्म 'बरसात' (1949) ने शंकर-जयकिशन को संगीतकार जोड़ी के रूप में बड़ी पहचान दिलाई। इसके बाद 'आवारा', 'श्री 420', 'जिस देश में गंगा बहती है', 'संगम' और 'मेरा नाम जोकर' जैसी फिल्मों के संगीत ने उनकी लोकप्रियता को अभूतपूर्व ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
'आवारा हूं', 'मेरा जूता है जापानी' और 'प्यार हुआ इकरार हुआ' जैसे गीत आज भी हिंदी फिल्म संगीत की अमर धरोहर माने जाते हैं। उनकी धुनों में रोमांस, दर्द, मस्ती और बड़े ऑर्केस्ट्रा का वह खास संगम था, जो उस दौर में बेमिसाल था।
सम्मान, विदाई और विरासत
शंकर-जयकिशन ने कई दशकों तक हिंदी फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया और फिल्मफेयर बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर अवॉर्ड सहित अनेक सम्मान हासिल किए। जयकिशन पंचाल का निधन 1971 में हो गया, लेकिन शंकर ने उसके बाद भी संगीत रचना जारी रखी। शंकर सिंह रघुवंशी का निधन 26 अप्रैल 1987 को हुआ।
गौरतलब है कि यह जोड़ी हिंदी सिनेमा के उस स्वर्णिम दौर की प्रतीक बन गई, जिसे आज भी 'सुनहरा युग' कहा जाता है। शंकर की जयंती पर उनकी यह विरासत हर संगीतप्रेमी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।