शंकर-जयकिशन: राज कपूर के सामने रखी थी यह बड़ी शर्त, 22 साल के रिश्ते में कैसे आई दरार?
सारांश
Key Takeaways
- शंकर सिंह रघुवंशी की पुण्यतिथि 26 अप्रैल को मनाई जाती है — उनका निधन 1987 में हृदयाघात से हुआ था।
- 1949 में 'बरसात' फिल्म के लिए शंकर ने राज कपूर के सामने जयकिशन को बराबर का पार्टनर बनाने की शर्त रखी थी।
- शंकर-जयकिशन ने 22 वर्षों तक बॉलीवुड में एकछत्र राज किया और एक फिल्म के लिए 5 लाख रुपए फीस लेते थे।
- जयकिशन का निधन 12 सितंबर, 1971 को हुआ, जिसके बाद राज कपूर ने 'बॉबी' के लिए शंकर की जगह लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को चुना।
- शंकर ने पुराने साथी सुधाकर शर्मा की फिल्म 'गोरी' के लिए 21,000 रुपए लौटाकर महज 1 रुपए के शगुन पर धुन बनाई।
- शंकर का जन्म हैदराबाद में 15 अक्टूबर, 1922 को हुआ था और वे जीवनभर शराब से दूर रहे।
मुंबई, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। बॉलीवुड के सुनहरे दौर के महान संगीतकार शंकर सिंह रघुवंशी की आज पुण्यतिथि है। 26 अप्रैल, 1987 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ था। उनकी जोड़ी शंकर-जयकिशन ने हिंदी फिल्म संगीत को एक नई भाषा दी — लेकिन इस जोड़ी की शुरुआत एक ऐसी शर्त से हुई थी जो दोस्ती की मिसाल बन गई, और अंत हुआ एक ऐसे धोखे से जिसने शंकर का दिल तोड़ दिया।
पृथ्वी थियेटर से शुरू हुई एक ऐतिहासिक दोस्ती
पहलवानी के शौकीन और अनुशासन को जीवन का मूलमंत्र मानने वाले शंकर सिंह रघुवंशी जब मुंबई के प्रसिद्ध पृथ्वी थियेटर पहुंचे, तो वहां उनकी मुलाकात गुजरात के एक युवा हारमोनियम वादक जयकिशन से हुई। शंकर ने उस युवक की असाधारण प्रतिभा को तुरंत पहचाना और उसे भी थियेटर में काम दिलवाया। यह मुलाकात महज एक संयोग नहीं थी — यह हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार संगीत की नींव थी।
राज कपूर के सामने रखी ऐतिहासिक शर्त
किस्मत का असली पहिया तब घूमा जब राज कपूर अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म 'बरसात' (1949) के लिए एक काबिल संगीतकार की तलाश में थे। शंकर ने एक ऐसी धुन सुनाई जिसने राज कपूर को मंत्रमुग्ध कर दिया। राज कपूर ने तुरंत शंकर को फिल्म का संगीत सौंपना चाहा, लेकिन शंकर ने एक अटल शर्त रखी — मेरे युवा दोस्त जयकिशन को भी मेरे बराबर का संगीतकार और पार्टनर बनाना होगा। राज कपूर ने यह शर्त मान ली और इसी क्षण जन्म हुआ उस अमर जोड़ी का जिसे दुनिया शंकर-जयकिशन के नाम से जानती है।
यह शर्त केवल व्यावसायिक नहीं थी — यह एक दोस्त का अपने साथी के प्रति सबसे बड़ा उपहार था। शंकर चाहते तो अकेले यह मौका ले सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी सफलता को जयकिशन के साथ बांटना चुना।
बॉलीवुड पर 22 साल का एकछत्र राज
'बरसात' की सफलता के बाद शंकर-जयकिशन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 'आवारा', 'श्री 420', 'चोरी-चोरी' और 'संगम' जैसी फिल्मों ने सफलता के ऐसे नए मानदंड स्थापित किए कि इस जोड़ी की फीस एक फिल्म के लिए 5 लाख रुपए तक पहुंच गई — जो अक्सर उस दौर के बड़े अभिनेताओं की फीस से भी अधिक होती थी। उन्होंने हिंदी फिल्म संगीत का व्याकरण ही बदल दिया — पश्चिमी वाद्ययंत्रों को भारतीय धुनों के साथ मिलाकर एक ऐसी शैली बनाई जो आज भी अद्वितीय है।
एक बयान ने तोड़ा 22 साल का विश्वास
1960 के दशक के मध्य में एक ऐसी घटना हुई जिसने इस जोड़ी के भीतर दरार डाल दी। जयकिशन ने एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में दावा किया कि 'संगम' का कालजयी गीत 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर' केवल उनकी अकेली रचना है। जबकि दोनों ने यह कसम खाई थी कि वे कभी किसी को नहीं बताएंगे कि कौन सी धुन किसने बनाई — क्योंकि वे एक इकाई थे, दो अलग व्यक्ति नहीं। इस खुलासे ने शंकर का दिल तोड़ दिया।
जयकिशन के जाने के बाद मिला सबसे बड़ा धोखा
12 सितंबर, 1971 को जयकिशन का असमय निधन हो गया। इससे पहले शंकर अपने परम मित्र और गीतकार शैलेन्द्र को भी खो चुके थे। जयकिशन के जाते ही वे लोग जो कल तक शंकर-जयकिशन के नाम पर फिल्में खरीदते थे, कहने लगे कि असली प्रतिभा तो केवल जयकिशन की थी।
सबसे गहरा आघात मिला 22 साल के साथी राज कपूर से। जिन राज कपूर के लिए शंकर ने 1949 में जयकिशन को पार्टनर बनाने की शर्त रखी थी, उन्हीं राज कपूर ने अपनी अगली फिल्म 'बॉबी' के लिए शंकर को दरकिनार कर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को साइन कर लिया। लेकिन 1975 में मनोज कुमार की फिल्म 'संन्यासी' में उन्होंने अकेले ऐसा संगीत दिया कि 'चल संन्यासी मंदिर में' गीत पूरे देश की जुबान पर चढ़ गया।
एक रुपए के शगुन पर बनाई धुन
1980 के दशक में सिंथेसाइजर और डिस्को संगीत का दौर आया और बड़े निर्माताओं ने शंकर से मुंह मोड़ लिया। इसी दौरान उनके पुराने संघर्ष के साथी सुधाकर शर्मा अपनी फिल्म 'गोरी' के लिए 21,000 रुपए लेकर उनके पास आए। शंकर ने मुस्कुराते हुए कहा — जो लड़का कभी मुझे स्टूडियो में कॉफी पिलाता था, आज मुझे काम दे रहा है। उन्होंने वे पैसे लौटा दिए और महज 1 रुपए के शगुन पर धुन बनाई।
हैदराबाद में 15 अक्टूबर, 1922 को जन्मे शंकर सिंह रघुवंशी ने जीवनभर शराब को हाथ नहीं लगाया। रोज व्यायाम करने वाले इस अनुशासित संगीतकार को 26 अप्रैल, 1987 को अचानक हृदयाघात हुआ और वे इस दुनिया से विदा हो गए। उनकी विरासत आज भी हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम अध्याय में जीवित है और आने वाली पीढ़ियां जब भी 'आवारा हूं' की धुन सुनेंगी, शंकर सिंह रघुवंशी का नाम अमर रहेगा।