सीईसी हटाने की मांग पर एनडीए का पलटवार: चुनावी हार की हताशा निकाल रहा विपक्ष
सारांश
Key Takeaways
- राज्यसभा के 73 विपक्षी सांसदों ने सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए राष्ट्रपति को संबोधित प्रस्ताव नोटिस दिया।
- प्रस्ताव में 15 मार्च 2026 के बाद के कार्यों पर 'सिद्ध दुर्व्यवहार' का आरोप लगाया गया है।
- भाजपा प्रवक्ता आर.पी. सिंह ने कहा — विपक्ष चुनावी हार की हताशा चुनाव आयोग पर निकाल रहा है।
- एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने याद दिलाया कि दिल्ली, पंजाब, बंगाल, कर्नाटक और केरल में जीत के समय विपक्ष को चुनाव आयोग से कोई शिकायत नहीं थी।
- भाजपा नेता रोहन गुप्ता ने दावा किया कि आजादी के बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में मतदान हुआ और बंगाल में चुनाव पूर्व हिंसा नहीं हुई।
- विपक्ष के पास सीईसी को हटाने के लिए आवश्यक संसदीय बहुमत नहीं है, इसलिए यह कदम राजनीतिक दबाव की रणनीति अधिक माना जा रहा है।
नई दिल्ली, 25 अप्रैल 2026 — राज्यसभा के 73 विपक्षी सदस्यों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव नोटिस सौंपे जाने के बाद नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के नेताओं ने शनिवार को विपक्ष पर जोरदार पलटवार किया। एनडीए नेताओं ने इस कदम को चुनावी मैदान में बार-बार मिली हार से उपजी हताशा करार दिया और कहा कि विपक्ष अपना गुस्सा चुनाव आयोग पर निकाल रहा है।
विपक्ष का प्रस्ताव नोटिस और उसकी पृष्ठभूमि
राज्यसभा के 73 विपक्षी सांसदों ने महासचिव को एक प्रस्ताव नोटिस सौंपा, जिसमें भारत के राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की गई। इस प्रस्ताव में 15 मार्च 2026 के बाद से किए गए कार्यों और कथित चूकों के आधार पर 'सिद्ध दुर्व्यवहार' का आरोप लगाया गया है।
यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की प्रक्रिया चल रही है और चुनाव आयोग की भूमिका राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनी हुई है। गौरतलब है कि इससे पहले भी विपक्षी दल चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन किसी सीईसी को हटाने के लिए इतनी बड़ी संख्या में नोटिस देना असाधारण कदम माना जा रहा है।
भाजपा और एनडीए नेताओं का पलटवार
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता आर.पी. सिंह ने कहा, "चूंकि जनता चुनावों में विपक्षी पार्टियों को वोट नहीं देती, इसलिए वे अपना गुस्सा चुनाव आयोग पर निकाल रहे हैं। वे अपने ही कार्यों और जनता से कटाव के कारण चुनाव हारते हैं।"
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं पर इस तरह की 'कीचड़ उछालने' वाली हरकतें लोकतंत्र को कमजोर करती हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जब 'आप' ने दिल्ली और पंजाब में, तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में, कांग्रेस ने कर्नाटक में और वाम गठबंधन ने केरल में जीत हासिल की थी, तब विपक्ष को चुनाव आयोग से कोई शिकायत नहीं थी।
पटेल ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, "जब तक विपक्ष जीतता है, तब तक चुनाव आयोग उन्हें स्वीकार्य है। जब हार मिलती है तो 'अंगूर खट्टे हैं' वाली कहावत चरितार्थ होती है।"
पूर्व केंद्रीय मंत्री और अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया
पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता अश्विनी कुमार चौबे ने कहा, "जब भी विपक्ष चुनाव हारता है, वे चुनाव आयोग पर पक्षपात और अनुचित आचरण का आरोप लगाने लगते हैं। संस्था के खिलाफ ऐसे आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं।"
भाजपा नेता रोहन गुप्ता ने कहा, "यह विपक्ष का असली चेहरा है। क्या वे चाहते हैं कि चुनावों के दौरान हिंसा हो? यह पहली बार है जब पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले हिंसा नहीं हुई। आजादी के बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में मतदान हुआ है।" उन्होंने कहा कि अगर विपक्ष इन उपलब्धियों को नकारता है तो जनता उन्हें माफ नहीं करेगी।
जदयू नेता साकेत सिंह ने कहा कि विपक्ष के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, इसीलिए वे मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
गहरा राजनीतिक संदर्भ और विश्लेषण
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया अत्यंत कठिन और दुर्लभ है। संविधान के अनुसार सीईसी को केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह ही हटाया जा सकता है — यानी संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी है। विपक्ष के पास फिलहाल इतना बहुमत नहीं है, इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम प्रतीकात्मक दबाव की रणनीति अधिक है।
यह भी उल्लेखनीय है कि 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव का निर्देश दिया था, जिसके बाद सरकार ने नया कानून बनाया। विपक्ष उस कानून का विरोध पहले से करता आ रहा है। इस पृष्ठभूमि में यह प्रस्ताव नोटिस उस पुराने विवाद की नई कड़ी मानी जा रही है।
आगे क्या होगा
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, राज्यसभा में इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना नगण्य है क्योंकि एनडीए के पास पर्याप्त संख्याबल है। हालांकि यह मामला पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों तक राजनीतिक बहस का केंद्र बना रहेगा। आने वाले दिनों में विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों की ओर से चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर और तीखी बयानबाजी संभव है।