3 नवंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

जयकिशन जन्मदिन विशेष: गुजराती डायरेक्टर के दफ्तर के बाहर मिले शंकर, बनी 'एस-जे' की महान जोड़ी

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
जयकिशन जन्मदिन विशेष: गुजराती डायरेक्टर के दफ्तर के बाहर मिले शंकर, बनी 'एस-जे' की महान जोड़ी

सारांश

4 नवंबर को जन्मे जयकिशन की कहानी गुजरात के एक छोटे कस्बे से शुरू होकर हिंदी सिनेमा के स्वर्णयुग तक पहुँचती है। एक डायरेक्टर के दफ्तर के बाहर की मुलाकात ने 'एस-जे' की वह जोड़ी बनाई जिसने 'आवारा हूँ' से लेकर 'प्यार हुआ इकरार हुआ' तक अनगिनत कालजयी धुनें दीं।

मुख्य बातें

जयकिशन दयाभाई पांचाल का जन्म 4 नवंबर 1929 को गुजरात के बांसदा (वंसदा) में हुआ था।
शंकर और जयकिशन की मुलाकात गुजराती डायरेक्टर चंद्रवदन भट्ट के दफ्तर के बाहर हुई, जहाँ दोनों काम की तलाश में आते थे।
दोनों ने पृथ्वी थिएटर में काम किया और यहीं राज कपूर से मुलाकात हुई।
जोड़ी ने करियर की शुरुआत 1949 में राज कपूर की फिल्म 'बरसात' से की, जो बड़ी हिट रही।
12 सितंबर 1971 को जयकिशन के निधन के बाद शंकर ने अकेले 43 फिल्मों का संगीत दिया।

संगीतकार जयकिशन दयाभाई पांचाल का जन्म 4 नवंबर 1929 को गुजरात के कस्बे बांसदा (वंसदा) में हुआ था। हिंदी सिनेमा के इतिहास में शंकर-जयकिशन की जोड़ी को सर्वकालिक महान संगीतकारों में गिना जाता है — और यह जोड़ी जिस तरह बनी, वह कहानी भी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है।

बचपन और संगीत की नींव

जयकिशन के पिता दह्याभाई पांचाल धरमपुर के शासक के दरबारी संगीतकार थे, यानी संगीत उन्हें विरासत में मिला था। बचपन से ही हारमोनियम पर उनकी पकड़ असाधारण थी। शुरुआती तालीम संगीत विशारद वादीलालजी से ली, फिर प्रेमशंकर नायक से संगीत की बारीकियाँ सीखीं। मुंबई आने के बाद वे विनायक तांबे के शिष्य बन गए और अपनी कला को और निखारा।

वह मुलाकात जिसने इतिहास बदल दिया

उन दिनों शंकर सिंह राम सिंह रघुवंशी काम की तलाश में गुजराती डायरेक्टर चंद्रवदन भट्ट के दफ्तर के चक्कर काटते थे। भट्ट ने उनसे वादा किया था कि जब वे कोई फिल्म बनाएंगे तो शंकर को संगीतकार का मौका देंगे। उसी दफ्तर के बाहर शंकर ने एक युवक को बार-बार आते-जाते देखा — वह जयकिशन थे, जो हारमोनियम प्लेयर के रूप में काम ढूंढ रहे थे। एक दिन बातचीत हुई और शंकर ने जयकिशन को पृथ्वी थिएटर में हारमोनियम वादक की नौकरी दिलाने का भरोसा दिया।

जल्द ही दोनों की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि लोग उन्हें 'राम-लक्ष्मण' जैसे अनेक प्यार भरे नामों से पुकारने लगे। पृथ्वी थिएटर में संगीत देने के साथ-साथ दोनों मशहूर नाटक 'पठान' समेत कई नाटकों में अभिनय भी करते थे।

राज कपूर से मुलाकात और करियर की शुरुआत

पृथ्वी थिएटर में काम करते हुए शंकर और जयकिशन राज कपूर के संपर्क में आए, जो उन दिनों निर्देशक किदार शर्मा के सहायक थे और अपनी फिल्म बनाने का सपना देख रहे थे। इस प्रकार तीनों की मुलाकात पृथ्वी थिएटर की छत तले हुई, जिसने हिंदी सिनेमा की दिशा बदल दी।

1949 में राज कपूर की फिल्म 'बरसात' के साथ शंकर-जयकिशन ने अपने करियर की विधिवत शुरुआत की। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसके साउंडट्रैक ने भी धूम मचाई। इसके बाद 'आवारा', 'श्री 420' और 'जिस देश में गंगा बहती है' के संगीत ने उनकी ख्याति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

संगीत की विरासत और अमर गीत

शंकर-जयकिशन की धुनों में रोमांस, दर्द, मस्ती और भव्य ऑर्केस्ट्रेशन का अनूठा संगम था। 'आवारा हूँ', 'मेरा जूता है जापानी' और 'प्यार हुआ इकरार हुआ' जैसे गीत आज भी हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम अध्याय का हिस्सा हैं।

जोड़ी का अंत और शंकर की एकल यात्रा

12 सितंबर 1971 को जयकिशन का निधन हो गया। इसके बाद शंकर ने अकेले काम जारी रखा और 1987 में अपनी मृत्यु तक 43 और फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। इस एकल दौर में भी उन्हें 'शंकर-जयकिशन' के नाम से ही श्रेय मिलता रहा — एक ऐसी जोड़ी की यादगार जो सिर्फ नाम नहीं, एक पूरा युग थी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस दौर के संघर्ष और संयोग की है जब प्रतिभा को मंच पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे। आज जब हिंदी फिल्म संगीत का परिदृश्य रीमेक और रीमिक्स से भरा है, 'एस-जे' की वह विरासत याद दिलाती है कि मौलिकता और ऑर्केस्ट्रल समृद्धि ने ही हिंदी गीतों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। जयकिशन के निधन के बाद शंकर द्वारा उसी जोड़ी के नाम से काम जारी रखना यह भी बताता है कि वह महज एक व्यावसायिक ब्रांड नहीं, एक भावनात्मक प्रतिबद्धता थी।
RashtraPress
3 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जयकिशन दयाभाई पांचाल का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
जयकिशन दयाभाई पांचाल का जन्म 4 नवंबर 1929 को गुजरात के कस्बे बांसदा (वंसदा) में हुआ था। उनके पिता दह्याभाई पांचाल धरमपुर के शासक के दरबारी संगीतकार थे।
शंकर और जयकिशन की मुलाकात कैसे हुई?
दोनों की मुलाकात मुंबई में गुजराती डायरेक्टर चंद्रवदन भट्ट के दफ्तर के बाहर हुई, जहाँ शंकर काम के लिए चक्कर लगाते थे और जयकिशन भी हारमोनियम वादक के रूप में रोजगार की तलाश में आते थे। शंकर ने जयकिशन को पृथ्वी थिएटर में नौकरी दिलाई और दोनों गहरे दोस्त बन गए।
शंकर-जयकिशन ने अपनी पहली फिल्म कौन सी की?
शंकर-जयकिशन ने 1949 में राज कपूर की फिल्म 'बरसात' से अपने करियर की शुरुआत की। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सर्वकालिक ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसके साउंडट्रैक ने भी बड़ी सफलता अर्जित की।
जयकिशन के निधन के बाद शंकर ने क्या किया?
12 सितंबर 1971 को जयकिशन के निधन के बाद शंकर ने संगीत निर्देशक के रूप में एकल काम जारी रखा। 1987 में अपनी मृत्यु तक उन्होंने 43 और फिल्मों का संगीत तैयार किया और इस दौरान भी उन्हें 'शंकर-जयकिशन' के नाम से ही श्रेय मिलता रहा।
शंकर-जयकिशन के सबसे मशहूर गाने कौन से हैं?
'आवारा हूँ', 'मेरा जूता है जापानी' और 'प्यार हुआ इकरार हुआ' उनके सबसे यादगार गीतों में शुमार हैं। 'आवारा', 'श्री 420' और 'जिस देश में गंगा बहती है' जैसी फिल्मों के संगीत ने भी उन्हें हिंदी सिनेमा के स्वर्णयुग का अहम हिस्सा बनाया।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 2 महीने पहले
  3. 4 महीने पहले
  4. 6 महीने पहले
  5. 7 महीने पहले
  6. 7 महीने पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले