बिना माता-पिता को बताए पुणे पहुंचे 'मझले सरकार', सिनेमा में अद्वितीय पहचान

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बिना माता-पिता को बताए पुणे पहुंचे 'मझले सरकार', सिनेमा में अद्वितीय पहचान

सारांश

दया किशन सप्रू, भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता, जिनकी फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' में मझले सरकार की भूमिका ने उन्हें अमर बना दिया। जानिए उनकी प्रेरणादायक यात्रा और अद्वितीय योगदान के बारे में।

Key Takeaways

  • दया किशन सप्रू का जन्म 16 मार्च 1916 को हुआ था।
  • उन्होंने 'साहिब बीबी और गुलाम' में मझले सरकार की भूमिका निभाई।
  • सप्रू ने बिना माता-पिता को बताए पुणे जाकर फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा।
  • उनकी दोस्ती देव आनंद और गुरुदत्त जैसे दिग्गजों से थी।
  • 20 अक्टूबर 1979 को उनका निधन हुआ।

नई दिल्ली, 15 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। समय का पहिया चलता रहेगा, लेकिन सिनेमा की दुनिया में कुछ सितारे ऐसे हैं, जिनकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी। ऐसे ही एक सितारे हैं 'साहिब बीबी और गुलाम' के मझले सरकार... जी हां! भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता दया किशन सप्रू, जिन्हें उनके प्रशंसक 'सप्रू' के नाम से जानते हैं। अपनी दृढ़ उपस्थिति और अभिनय कौशल से उन्होंने अनेक पीढ़ियों के दिलों में खास जगह बनाई।

उनकी सबसे यादगार भूमिका 1962 में आई क्लासिक फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' में मझले सरकार (चौधरी) का था, जहाँ उनके कम संवादों के बावजूद उनकी भयानक और प्रभावशाली मौजूदगी ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी।

सप्रू का जन्म 16 मार्च 1916 को जम्मू-कश्मीर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम दया किशन सप्रू था। उनके परिवार में चार भाई और दो बहनें थीं। उनके पिता डोगरा राज्य के खजांची थे और महाराजा हरि सिंह के दरबार में कार्यरत थे। उनके परिवार के पास जम्मू और लाहौर दोनों जगह घर थे। वे उर्दू और हिंदी में पढ़ाई की, लेकिन अंग्रेजी में रुचि के कारण उन्होंने स्वयं अंग्रेजी सीखी। बचपन से ही उन्हें संगीत का शौक था। लाहौर में बड़े होकर उन्होंने ठेकेदार की नौकरी भी की और जालंधर कैंट में 2-3 साल बिताए।

अभिनय की दुनिया में उनकी एंट्री की कहानी भी दिलचस्प है। सप्रू न केवल सुंदरता के लिए जाने जाते थे, बल्कि उनकी गहरी आवाज भी उन्हें विशेष बनाती थी। एक दिन कॉलेज के दोस्तों ने उनकी खूबसूरती और आवाज देखकर उन्हें फिल्मों में जाने की सलाह दी। दोस्तों की सलाह पर, उन्होंने बिना माता-पिता को बताए पुणे जाने का निर्णय लिया। वहां, प्रभात स्टूडियो के मालिक वी. शांताराम, शेख फतेहलाल और बाबूराव से उनकी मुलाकात हुई। इसके बाद, उन्हें 1944 में आई मराठी फिल्म 'रामशास्त्री' में एक छोटा सा रोल मिला। हिंदी में उनका डेब्यू 'चंद' से हुआ। शुरुआत में उन्होंने हीरो के रूप में 'लखा रानी' में मोनिका देसाई के साथ काम किया। उस समय उनकी सैलरी ढाई से तीन हजार रुपए महीना थी।

धीरे-धीरे, सप्रू की अभिनय कला, खूबसूरती और दमदार आवाज ने उन्हें सिनेमा जगत में एक स्थायी स्थान दिला दिया। वे अक्सर सख्त जज, पुलिस कमिश्नर, जमींदार या खलनायक के किरदार निभाते थे। 'साहिब बीबी और गुलाम' में मझले सरकार की भूमिका उनके करियर की सबसे चर्चित रही। गुरुदत्त की इस फिल्म में उनकी डायलॉग डिलीवरी और मौजूदगी आज भी याद की जाती है।

कम ही लोग जानते हैं कि 'पाकीजा' में मूल रूप से अशोक कुमार का किरदार पहले उन्हें दिया जाना था, लेकिन बाद में वे विलेन के किरदार के लिए चुने गए। अन्य प्रमुख फिल्मों में 'ज्वेल थीफ', 'देवार', 'हीर रांझा', 'मुझे जीने दो' आदि शामिल हैं।

सप्रू की दोस्ती देव आनंद, गुरुदत्त और रहमान से थी। वे सुबह 5 बजे1948 में उन्होंने अभिनेत्री हेमवती से शादी की। उनके तीन बच्चे हैं, बेटी प्रीति सप्रू (पंजाबी-हिंदी अभिनेत्री), बेटा तेज सप्रू (अभिनेता) और बेटी रीमा राकेश नाथ (स्क्रिप्ट राइटर)।

20 अक्टूबर 1979 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। इससे पहले उन्हें कैंसर हुआ था, जो ठीक हो गया था, लेकिन तनाव ने उनकी जान ले ली। उनकी स्मृति में, साल 2024 में अंधेरी (मुंबई) में फन रिपब्लिक रोड को 'श्री दया किशन सप्रू मार्ग' नाम दिया गया।

Point of View

जो हमेशा याद किए जाएंगे। उनका अभिनय, उनकी आवाज और उनकी व्यक्तिगत यात्रा सिनेमा के इतिहास में एक खास स्थान रखती है। उनकी कहानी प्रेरणा देती है कि कैसे सपनों को पूरा करने के लिए साहस और मेहनत की जरूरत है।
NationPress
16/03/2026

Frequently Asked Questions

दया किशन सप्रू का जन्म कब हुआ था?
दया किशन सप्रू का जन्म 16 मार्च 1916 को जम्मू-कश्मीर में हुआ था।
उनकी सबसे प्रसिद्ध फिल्म कौन सी है?
'साहिब बीबी और गुलाम' में मझले सरकार की भूमिका उनकी सबसे प्रसिद्ध फिल्म है।
सप्रू की शिक्षा के बारे में बताएं?
उन्होंने उर्दू और हिंदी माध्यम से पढ़ाई की, लेकिन अंग्रेजी में भी रुचि थी।
उनका निधन कब हुआ?
20 अक्टूबर 1979 को उनका निधन हुआ।
उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या थी?
वे एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे थे, जिसमें उनके चार भाई और दो बहनें थीं।
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