गीतकार शैलेंद्र जयंती: आर्थिक संकट ने 'कवि' को बनाया 'फ़िल्मी गीतकार', ₹500 से शुरू हुआ सफ़र
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के अमर गीतकार शंकरदास केसरीलाल शैलेंद्र की जयंती 30 अगस्त को मनाई जाती है। उनका जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। जीवन की कठिन परिस्थितियों ने उन्हें एक कवि से हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय गीतकारों में से एक बना दिया — और यह यात्रा महज़ ₹500 के एक अनुबंध से शुरू हुई थी।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
शैलेंद्र का परिवार मूल रूप से बिहार के आरा का था। आर्थिक कठिनाइयों के चलते परिवार रावलपिंडी से मथुरा आ गया, जहाँ शैलेंद्र ने अपनी शिक्षा पूरी की। बचपन में ही उन्होंने अपनी बहन और माँ को खो दिया — दुखों के इस पहाड़ ने उनकी कविताओं में एक गहरी मानवीय संवेदना भर दी। बचपन से ही कविता-रचना उनका स्वाभाविक स्वर था; वे घंटों बैठकर कविताएँ लिखते और मुशायरों में सुनाते।
रेलवे की नौकरी से फ़िल्मी दुनिया तक
पढ़ाई पूरी करने के बाद शैलेंद्र 1947 में बंबई (अब मुंबई) आए और माटुंगा वर्कशॉप में भारतीय रेलवे में प्रशिक्षु के रूप में काम करने लगे। नौकरी के बावजूद उन्होंने कविता-लेखन नहीं छोड़ा। एक कार्यक्रम में वे अपनी कविता 'जलता है पंजाब' प्रस्तुत कर रहे थे, जिसे सुनकर अभिनेता-निर्माता राज कपूर बेहद प्रभावित हुए। राज कपूर ने यह कविता अपनी फ़िल्म 'आग' (1948) के लिए ख़रीदने का प्रस्ताव रखा, किंतु शैलेंद्र ने उस समय साफ़ मना कर दिया।
आर्थिक संकट ने बदली राह
पत्नी के गर्भवती होने के बाद शैलेंद्र के सामने आर्थिक संकट गहरा हो गया। विवशता में उन्होंने राज कपूर से दोबारा संपर्क किया। उस समय राज कपूर अपनी फ़िल्म 'बरसात' (1949) की शूटिंग कर रहे थे और दो गाने अभी लिखे नहीं गए थे। शैलेंद्र को वे दो गाने — 'पतली कमर है' और 'बरसात में' — ₹500 में लिखने का काम मिला। फ़िल्म का संगीत शंकर-जयकिशन ने तैयार किया था। यहीं से 'कवि शैलेंद्र' के 'गीतकार शैलेंद्र' बनने का ऐतिहासिक सफ़र शुरू हुआ।
हिंदी सिनेमा को दी अमर रचनाएँ
इसके बाद राज कपूर, शैलेंद्र और शंकर-जयकिशन की तिकड़ी ने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक कालजयी गीत दिए। 1951 की फ़िल्म 'आवारा' का गीत 'आवारा हूँ' देश की सीमाओं से बाहर भी अपार लोकप्रियता पाने वाला गीत बन गया। 1955 में रिलीज़ 'श्री 420' के सभी गाने आज भी उतने ही पसंद किए जाते हैं। शैलेंद्र ने राज कपूर की अधिकांश फ़िल्मों के बोल लिखे और अपने करियर में सैकड़ों फ़िल्मों के लिए अनगिनत अमर गीतों की रचना की।
फ़िल्म निर्माण और विरासत
गीत-लेखन के अलावा शैलेंद्र ने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी पर आधारित क्लासिक फ़िल्म 'तीसरी कसम' (1966) का निर्माण भी किया, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शैलेंद्र की पहचान एक ऐसे जनकवि के रूप में है जिन्होंने आम बोलचाल की सरल हिंदी-उर्दू में जीवन की घटनाओं और मानवीय संवेदनाओं को इस तरह पिरोया कि वे सदाबहार बन गईं। 14 दिसंबर 1966 को मात्र 43 वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया — लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी उन्हें जीवित रखती हैं।