क्या मोबाइल, पढ़ाई का दबाव और घर का माहौल बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं?
सारांश
Key Takeaways
- पढ़ाई का दबाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
- माता-पिता के व्यवहार का बच्चों की भावनाओं पर गहरा असर होता है।
- स्कूल का वातावरण बच्चों को सुरक्षित महसूस करने में मदद कर सकता है।
- सोशल मीडिया पर बच्चों को खुद से तुलना करने से रोकें।
- सकारात्मक माहौल बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाता है।
नई दिल्ली, 9 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आज के बच्चों की दुनिया में तेजी से बदलाव आ रहा है। पढ़ाई का दबाव, बदलती जीवनशैली, मोबाइल और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच, ये सभी फैक्टर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं। पहले बच्चे खुले मैदान में खेलना, दोस्तों से बातचीत करना और परिवार के साथ समय बिताना पसंद करते थे, लेकिन अब उनका अधिकांश समय स्क्रीन और प्रतिस्पर्धा में ही गुजर रहा है। बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य अब एक गंभीर विषय बन चुका है, जिस पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है।
मानसिक रूप से स्वस्थ बच्चा खुश रहता है, बेहतर सीख सकता है और अपने भविष्य को सही दिशा दे सकता है। इस संदर्भ में यह समझना महत्वपूर्ण है कि कौन-सी बातें बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं और कैसे ये धीरे-धीरे उनके मन और सोच पर असर डालती हैं।
माता-पिता का बर्ताव: बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की नींव माता-पिता के व्यवहार में होती है। बच्चा सबसे पहले अपने घर से ही दुनिया को समझना सीखता है। यदि घर का वातावरण तनावपूर्ण हो, माता-पिता अक्सर गुस्से में बातें करें या बच्चों को बिना सुने डांट दें, तो बच्चे के मन में डर पैदा हो जाता है।
मनोविज्ञान के अनुसार, ऐसे बच्चे अपनी भावनाओं को दबाने लगते हैं और खुद को अकेला महसूस करते हैं। समय के साथ यह डर चिंता और आत्मविश्वास की कमी में बदल सकता है। इसके विपरीत, जब माता-पिता प्यार से संवाद करते हैं, गलतियों पर समझाते हैं और बच्चों की बात ध्यान से सुनते हैं, तो बच्चे का मन सुरक्षित महसूस करता है। यह सुरक्षा की भावना उनके दिमाग को शांत रखती है और उन्हें खुलकर सोचने तथा सीखने में मदद करती है।
स्कूल का वातावरण: स्कूल का माहौल भी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है। स्कूल सिर्फ पढ़ाई का स्थान नहीं होता, बल्कि बच्चों की एक अलग दुनिया होती है। यदि स्कूल में प्रतिस्पर्धा की अधिकता हो, तुलना की जाए, या शिक्षक बहुत सख्त हों, तो बच्चे के मन में असफलता का डर बैठ जाता है। यह डर मानसिक तनाव पैदा करता है, जिससे बच्चा पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पाता।
मनोविज्ञान बताता है कि जब बच्चा ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है, तभी उसका दिमाग बेहतर तरीके से कार्य करता है। सहयोगी स्कूल का माहौल बच्चों को गलतियों से सीखने का अवसर देता है, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और मानसिक संतुलन बना रहता है।
स्क्रीन टाइम: आजकल सोशल मीडिया भी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाला एक बड़ा कारण बन गया है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली चमक-दमक बच्चों को खुद से तुलना करने पर मजबूर करती है। जब बच्चे दूसरों को अधिक सफल और खुश देखते हैं, तो उनमें हीन भावना पैदा हो सकती है।
नकारात्मक टिप्पणियाँ या गलत जानकारी उनके सोचने के तरीके को प्रभावित कर सकती हैं। मनोविज्ञान के अनुसार, बच्चों का मस्तिष्क पूरी तरह से विकसित नहीं होता, इसलिए वे ऑनलाइन सामग्री को सच मान लेते हैं। इससे भ्रम, डर और उदासी जैसी भावनाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।