फर्जी पीडब्ल्यूडी सर्टिफिकेट रैकेट का भंडाफोड़: दिल्ली पुलिस ने 9 गिरफ्तार किए, 27 नकली प्रमाण-पत्र बरामद
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली पुलिस के नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट स्पेशल स्टाफ ने 8 अक्टूबर 2026 को दिव्यांग व्यक्तियों (पीडब्ल्यूडी) के नाम पर फर्जी विकलांगता प्रमाण-पत्र बनाने और बेचने वाले एक बड़े अंतर-राज्यीय रैकेट का पर्दाफाश किया। इस कार्रवाई में 9 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और 27 नकली पीडब्ल्यूडी सर्टिफिकेट बरामद किए गए। आरोप है कि ये फर्जी प्रमाण-पत्र कॉलेजों और अंडरग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में पीडब्ल्यूडी कोटे के तहत दाखिला पाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे थे।
मामले का मुख्य घटनाक्रम
मामला 31 अगस्त को सामने आया जब उत्तरी जिले के स्पेशल स्टाफ के इंचार्ज इंस्पेक्टर रोहित सारस्वत को सूचना मिली कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ निवासी ललित कुमार पैसे लेकर नकली पीडब्ल्यूडी सर्टिफिकेट बनवाकर जेबीटी, बीटेक, दिल्ली यूनिवर्सिटी और अन्य कोर्सों में दाखिला दिलाने का काम कर रहा है। इसके बाद एसीबी/ऑपरेशन्स विशेष धत्तरवाल की देखरेख में गठित एक रेडिंग टीम ने हरियाणा के फरीदाबाद से 36 वर्षीय ललित कुमार उर्फ आदित्य को दबोचा।
ललित के पास से बदायूं, बरेली और सिद्धार्थ नगर के सरकारी अस्पतालों द्वारा जारी 16 पीडब्ल्यूडी प्रमाण-पत्र मिले, जो सुनने की अक्षमता, चलने-फिरने में अक्षमता और कम दृष्टि से संबंधित थे। साथ ही तीन मोबाइल फोन और एक लैपटॉप भी जब्त किया गया।
रैकेट कैसे काम करता था
पुलिस के अनुसार, इस नेटवर्क ने एआई-आधारित टूल का इस्तेमाल करके आधार कार्ड में दर्ज पते बदले — जिससे आरोपी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों जैसे सिद्धार्थ नगर, बदायूं, बरेली और गोरखपुर के निवासी दिखाए जा सकें। इसके बाद यूनिक डिसेबिलिटी आईडी (यूडीआईडी) पोर्टल के जरिए विकलांगता प्रमाण-पत्रों के लिए आवेदन किया जाता था। प्रत्येक सर्टिफिकेट के लिए ₹20,000 से ₹30,000 की राशि ली जाती थी।
नोएडा के सेक्टर 18 में 'रुद्र कंसल्टेंसी' चलाने वाले रोशन कुमार ने कथित तौर पर छात्रों के आधार विवरण, फोटो, हस्ताक्षर और ओटीपी इकट्ठा कर ललित कुमार को उपलब्ध कराए। पुलिस ने 1 सितंबर को उसे गिरफ्तार किया।
सरकारी कर्मचारियों की संलिप्तता
जांच में उत्तर प्रदेश के कई सरकारी कार्यालयों के कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई। 3 सितंबर को बरेली के सीएमओ ऑफिस में यूडीआईडी पोर्टल पर ठेके पर काम करने वाले 28 वर्षीय कुलदीप को गिरफ्तार किया गया। उसके मोबाइल फोन में फर्जी प्रमाण-पत्रों से जुड़ी चैट और दस्तावेज़ मिले। कुलदीप की निशानदेही पर शेर सिंह सोलंकी और बरेली विकलांगता बोर्ड के सदस्य डॉ. लक्ष्मीकांत सक्सेना को पकड़ा गया।
सिद्धार्थ नगर के सीएमओ ऑफिस में तैनात सीनियर मलेरिया इंस्पेक्टर जयप्रकाश शुक्ला को 10 सितंबर को बैंक ट्रांजैक्शन और तकनीकी जांच के आधार पर गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि उन्होंने पैसे लेकर अपने पद का दुरुपयोग करते हुए फर्जी प्रमाण-पत्रों को मंजूरी दिलाई। देवरिया के सीएमओ ऑफिस में जूनियर असिस्टेंट धीरेंद्र कुमार पांडे को 18 सितंबर को गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि वह हर प्रमाण-पत्र के लिए ₹5,000 नकद लेकर फर्जी सर्टिफिकेट तैयार करता था।
अन्य गिरफ्तारियाँ और बरामदगी
जिन लेन-देन के लिए बैंक खाता इस्तेमाल हुआ, उसके आधार पर सुरेंद्र रस्तोगी को 19 सितंबर को गिरफ्तार किया गया। 12 सितंबर को सीतापुर से आदेश सिंह को पकड़ा गया — लखनऊ स्थित उसके घर से 9 विकलांगता प्रमाण-पत्र बरामद हुए। गोरखपुर में तलाशी के दौरान संदिग्ध चंदन सिंह यादव फरार पाया गया, जिसकी तलाश जारी है।
कानूनी कार्रवाई और आगे की जांच
मॉरिस नगर पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस का कहना है कि आगे की जांच जारी है और रैकेट के अन्य सदस्यों की पहचान की कोशिश की जा रही है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब दिव्यांग कोटे के दुरुपयोग को लेकर देशभर में चिंताएँ बढ़ रही हैं।