राजीव गौबा की चेतावनी: खराब आहार से भारत में 56%25 बीमारियों का खतरा
सारांश
Key Takeaways
- खराब आहार से 56%25 बीमारियों का खतरा बढ़ता है।
- आंत माइक्रोबायोम का स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण योगदान है।
- अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
- स्वास्थ्य सेवाओं में समानता और गुणवत्ता की आवश्यकता है।
- प्रोबायोटिक्स का उपयोग दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ में सहायक हो सकता है।
नई दिल्ली, 28 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। गट माइक्रोबायोटा और प्रोबायोटिक विज्ञान फाउंडेशन ने 27-28 मार्च 2026 को नई दिल्ली में "गट माइक्रोबायोम और प्रोबायोटिक्स: जन्म से लेकर शतायुता तक प्रभाव" विषय पर 16वां भारतीय प्रोबायोटिक संगोष्ठी आयोजित किया। इस अवसर पर नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने प्रतिरक्षा, चयापचय और निवारक स्वास्थ्य देखभाल में आंत माइक्रोबायोम की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।
गौबा ने भारत में खानपान की आदतों में हो रहे नकारात्मक बदलावों पर चिंता व्यक्त की, यह बताते हुए कि शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और सोशल मीडिया के प्रभाव से अति-प्रसंस्कृत और परिष्कृत खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन लोगों को पारंपरिक पोषक तत्वों से भरपूर आहार से दूर कर रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि ये प्रवृत्तियाँ आंत स्वास्थ्य पर गंभीर दीर्घकालिक परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं। भारत में लगभग 56.4 फीसदी बीमारियों का कारण खराब या असंतुलित आहार है।
गौबा ने आगे कहा कि यदि इन मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया तो सूक्ष्मजीव व्यापक परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। उन्होंने आंत के स्वास्थ्य को व्यापक विकास संदर्भ में रखते हुए स्वास्थ्य सेवा को व्यक्तिगत कल्याण और आर्थिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश तभी साकार हो सकता है जब कार्यबल स्वस्थ हो।
राजीव गौबा ने स्वास्थ्य सेवाओं की समानता, वहनीयता, गुणवत्ता, रोगी सुरक्षा और कुशल स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी से संबंधित चुनौतियों को भी स्वीकार किया। उन्होंने कम कीमत वाली जेनेरिक दवाओं के अधिक उपयोग और डिजिटल स्वास्थ्य उपकरणों, टेलीमेडिसिन, डेटा एनालिटिक्स और एआई का अधिक उपयोग करने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि वंचित समुदायों तक विशेषज्ञ देखभाल का विस्तार हो सके।
प्रोबायोटिक्स के विकसित हो रहे क्षेत्र पर चर्चा करते हुए, गौबा ने कहा कि माइक्रोबायोम विज्ञान अब क्रियाविधि और व्यावहारिक अनुसंधान की ओर अग्रसर हो चुका है। उन्होंने अगली पीढ़ी के माइक्रोबायोम-आधारित उपचारों तथा सिंथेटिक बायोलॉजी और सीआरआईएसपीआर-सक्षम प्रोबायोटिक उपभेदों के निर्माण जैसे उभरते क्षेत्रों पर प्रकाश डाला।
हालांकि, उन्होंने प्रोबायोटिक्स और सप्लीमेंट्स के बाजार में गलत सूचनाओं और भ्रामक विज्ञापनों के प्रसार के प्रति आगाह किया। उन्होंने चिकित्सकों और शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे अपनी विश्वसनीयता का उपयोग करें, ताकि स्वस्थ आहार संबंधी आदतों को बढ़ावा दिया जा सके।
गौबा ने कहा कि देश क्लीनिकल रूप से प्रमाणित प्रोबायोटिक्स विकसित करने के लिए पारंपरिक ज्ञान को जीनोमिक और माइक्रोबायोम अनुसंधान के साथ जोड़कर वैश्विक प्रोबायोटिक आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए सक्षम है। उन्होंने प्रोबायोटिक्स के व्यापक जन स्वास्थ्य क्षमता का उल्लेख किया, जिसमें संक्रामक और दीर्घकालिक रोगों के बोझ को कम करने, पोषण में सुधार करने और जनसंख्या की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने की क्षमता शामिल है।
युवा शोधकर्ताओं और नवप्रवर्तकों की भागीदारी की सराहना करते हुए, गौबा ने उन्हें जटिल स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करने के लिए बहु-विषयक और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह संगोष्ठी नए सहयोगों को बढ़ावा देगी और माइक्रोबायोम और प्रोबायोटिक विज्ञान के क्षेत्र में भारत के नेतृत्व को मजबूत करेगी।