2047 तक भारत बनेगा विश्वगुरु: दत्तात्रेय होसबाले का ऐतिहासिक बयान — भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक नेतृत्व का संकल्प
सारांश
Key Takeaways
- आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने वॉशिंगटन में कहा कि 2047 तक भारत भौतिक रूप से समृद्ध और आध्यात्मिक रूप से विश्व का नेतृत्व करेगा।
- आरएसएस ने पिछले विजयदशमी पर अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए और देश के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
- होसबाले ने पंच परिवर्तन — सामाजिक समरसता, परिवार, पर्यावरण-अनुकूल जीवन, राष्ट्रीय स्वाभिमान और नागरिक कर्तव्य — को संगठन की वर्तमान प्राथमिकता बताया।
- उन्होंने आर्य आक्रमण सिद्धांत को खंडित नैरेटिव बताते हुए कहा कि भारत 1947 से हजारों वर्ष पहले से सांस्कृतिक रूप से एकजुट है।
- राजनीतिक नेतृत्व के लिए वन नेशन वन इलेक्शन, महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी और राष्ट्र पहले की भावना को अनिवार्य बताया।
- इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबी के कथन का हवाला देते हुए कहा कि मानवता को बचाना है तो भारतीय मार्ग अपनाना होगा।
वॉशिंगटन, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने एक विशेष साक्षात्कार में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 2047 तक भारत न केवल आर्थिक रूप से एक समृद्ध राष्ट्र बनेगा, बल्कि अपनी सभ्यतागत विरासत और आध्यात्मिक शक्ति के बल पर वह पूरे विश्व का मार्गदर्शन भी करेगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब आरएसएस ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए हैं और संगठन भारत के राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में स्थापित हो चुका है।
आरएसएस के 100 वर्ष: एक ऐतिहासिक यात्रा
दत्तात्रेय होसबाले ने बताया कि आरएसएस ने पिछले विजयदशमी पर अपनी शताब्दी पूर्ण की। इन सौ वर्षों में संगठन ने देश के कोने-कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और भारत के सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक परिदृश्य पर गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने स्वीकार किया कि यह यात्रा चुनौतियों से भरी रही, लेकिन स्वयंसेवकों की अदम्य मेहनत और समाज के व्यापक समर्थन ने संगठन को हर बाधा पार करने की शक्ति दी।
होसबाले के अनुसार, आरएसएस का मूल प्रभाव हिंदू राष्ट्रवाद यानी अपनी संस्कृति, राष्ट्र और सभ्यता के प्रति गर्व की भावना के रूप में परिलक्षित होता है। संगठन केवल राजनीति तक सीमित नहीं है — शिक्षा, उद्योग, ग्रामीण विकास, सेवा कार्य और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में भी इसकी सक्रिय भूमिका रही है।
राजनीतिक सशक्तीकरण और समाज का विश्वास
होसबाले ने कहा कि केंद्र में लगातार तीसरी बार स्वयंसेवक पृष्ठभूमि वाले नेतृत्व को अवसर मिलना इस बात का प्रमाण है कि जनता ने ईमानदारी, सांस्कृतिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी है। दशकों तक राजनीति को स्वार्थ, वोट बैंक और तुष्टिकरण का पर्याय मान लिया गया था, लेकिन जनता ने इसे अस्वीकार कर दिया।
आरएसएस पृष्ठभूमि से आए नेताओं ने सामाजिक एकता बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जबकि परंपरागत राजनीति ने समाज को जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटने का काम किया।
वैश्विक दृष्टिकोण और वसुधैव कुटुम्बकम
होसबाले ने कहा कि वसुधैव कुटुम्बकम का संदेश हर स्वयंसेवक के जीवन में गहराई से समाया हुआ है। जी-20 सम्मेलन में वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर का संदेश इसी भावना की वैश्विक अभिव्यक्ति था। उन्होंने दुनिया के सामने चार बड़ी चुनौतियाँ गिनाईं — वर्चस्ववाद, धर्म के नाम पर हिंसा, पर्यावरण संकट और परिवारों का टूटना।
इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबी के उस कथन का उन्होंने स्मरण कराया जिसमें कहा गया था कि मानवता को बचाना है तो उसे भारतीय मार्ग अपनाना होगा, क्योंकि भारत में नैतिकता और सभ्यतागत मूल्य आज भी जीवित हैं।
औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और भारत की सांस्कृतिक एकता
होसबाले ने स्वीकार किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता मिले 80 वर्ष बीत जाने के बाद भी कुछ क्षेत्रों में औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेष बाकी हैं। उन्होंने आर्य आक्रमण सिद्धांत जैसे खंडित नैरेटिव का उदाहरण दिया जो लंबे समय तक पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाया जाता रहा।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत 1947 से पहले भी सांस्कृतिक रूप से एकजुट था। आदि शंकराचार्य का केरल से देश के चारों कोनों तक का प्रवास और स्वामी विवेकानंद का कोलकाता से कन्याकुमारी तक का भ्रमण इसका प्रमाण है।
युवाओं और राजनीति के लिए संदेश
होसबाले ने भारतीय युवाओं से आग्रह किया कि वे पश्चिमीकरण को आधुनिकता न समझें। उन्होंने पंच परिवर्तन — सामाजिक समरसता, परिवार, पर्यावरण-अनुकूल जीवन, राष्ट्रीय स्वाभिमान और नागरिक कर्तव्य — को आरएसएस की वर्तमान प्राथमिकता बताया।
राजनीतिक नेतृत्व के लिए उन्होंने वन नेशन वन इलेक्शन, महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी और राष्ट्र पहले की भावना को अनिवार्य बताया। स्वामी विवेकानंद के शब्दों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि 2047 तक भारत भौतिक रूप से समृद्ध और आध्यात्मिक रूप से विश्व का मार्गदर्शक बनेगा। आने वाले वर्षों में आरएसएस की नई कार्यदिशा और 2047 के लक्ष्यों पर देश और दुनिया की नजर बनी रहेगी।