मिस्र के राष्ट्रपति सीसी का ऐलान: 2030 में कार्यकाल खत्म होते ही छोड़ूँगा पद, संविधान से कोई छेड़छाड़ नहीं
सारांश
मुख्य बातें
मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने 18 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि वह 2030 में अपना मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद पद पर बने रहने की कोशिश नहीं करेंगे। न्यू एडमिनिस्ट्रेटिव कैपिटल स्थित मिस्र की मिलिट्री एकेडमी के दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा, 'अगर मैं तब तक जीवित रहा, तो 2030 तक का समय राष्ट्रपति के रूप में मेरे कार्यकाल का अंत होगा। यह बात पूरी तरह से तय है और इस पर अब कोई चर्चा नहीं होगी।' यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब विपक्ष और आलोचकों को आशंका थी कि संविधान में फिर से संशोधन कर सीसी को सत्ता में बनाए रखने की कोशिश की जा सकती है।
क्या बोले सीसी और कहाँ
71 वर्षीय सीसी ने काहिरा के पूर्व में स्थित न्यू एडमिनिस्ट्रेटिव कैपिटल में ग्रेजुएट अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि मिस्र के संविधान के साथ 'कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।' उन्होंने शासन के लिए एक नई नेतृत्व पीढ़ी तैयार करने की भी बात कही। यह वही शहर है जो सीसी के प्रमुख मेगा-प्रोजेक्ट्स में से एक है।
गौरतलब है कि यह घोषणा मिस्र की राज्य समाचार एजेंसी एमईएनए के हवाले से व्यापक रूप से प्रसारित हुई। सीसी ने कहा कि शेष कार्यकाल का उपयोग मिलिट्री एकेडमी में सैकड़ों भावी अधिकारियों, मंत्रियों और राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवारों को शासन-संचालन और नेतृत्व का प्रशिक्षण देने के लिए किया जाएगा।
संवैधानिक पृष्ठभूमि
मिस्र के संविधान को मूल रूप से 2014 में तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी को सेना द्वारा सत्ता से हटाए जाने के बाद मंजूरी दी गई थी। इसमें शुरुआत में राष्ट्रपति के लिए चार-चार साल के दो कार्यकाल की सीमा तय थी। 2019 के जनमत संग्रह में स्वीकृत संवैधानिक संशोधनों के तहत कार्यकाल बढ़ाकर छह वर्ष किया गया और सीसी के लिए एक और कार्यकाल के रास्ते खोले गए। इन्हीं संशोधनों के आधार पर 2023 में सीसी को छह साल के कार्यकाल के लिए पुनः निर्वाचित किया गया, जो 2030 में समाप्त होगा।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब अरब दुनिया में कई नेताओं पर संविधान बदलकर सत्ता में बने रहने के आरोप लगते रहे हैं। सीसी का यह बयान उस बहस को सीधे संबोधित करता है।
आलोचकों और विपक्ष का नज़रिया
विपक्षी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने पहले आशंका जताई थी कि संविधान में और संशोधन कर सीसी को 2030 के बाद भी पद पर बनाए रखा जा सकता है। उनके शासन पर राजनीतिक विपक्ष, नागरिक समाज और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की लगातार आलोचना होती रही है। मिस्र सरकार इन आरोपों को खारिज करती आई है और कहती है कि स्थिरता एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए ये नीतियाँ ज़रूरी हैं।
आलोचकों का यह भी कहना है कि सीसी के 12 वर्षों के शासन में जो मेगा-प्रोजेक्ट्स शुरू किए गए, वे काफी हद तक कर्ज पर निर्भर रहे हैं, जिससे मिस्र पर वित्तीय बोझ बढ़ा है।
राजनीतिक करियर: एक नज़र
सीसी 2014 में रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रपति चुनाव में उतरे थे — यह तब था जब उन्होंने कहा था कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है। सेना के पूर्व जनरल के रूप में वे अपनी छवि को शासन की निरंतरता से जोड़ते रहे हैं। अब उनके इस ऐलान को उत्तराधिकार योजना की ओर पहला औपचारिक कदम माना जा रहा है।
आगे क्या होगा
सीसी के इस बयान के बाद मिस्र में राजनीतिक उत्तराधिकार की बहस तेज होने की संभावना है। उन्होंने स्वयं संकेत दिया कि मिलिट्री एकेडमी में प्रशिक्षण कार्यक्रम के ज़रिये भावी नेतृत्व तैयार किया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र अब इस पर रहेगी कि क्या मिस्र में वास्तव में एक पारदर्शी लोकतांत्रिक उत्तराधिकार प्रक्रिया शुरू होती है या यह बयान केवल घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव से उबरने की रणनीति है।