क्या ईयू से मिली राहत और अमेरिका से तनाव नाइजीरिया के लिए फायदेमंद हैं?
सारांश
Key Takeaways
- ईयू ने नाइजीरिया को राहत दी है।
- अमेरिका के साथ तनाव बढ़ा है।
- नाइजीरिया की विदेश नीति में बदलाव हो रहा है।
- नाइजीरिया आर्थिक रिश्तों को मजबूत कर रहा है।
- सुरक्षा और राजनीतिक ढांचे में पुनर्विचार की आवश्यकता।
नई दिल्ली, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। नाइजीरिया को यूरोपीय संघ (ईयू) ने शुक्रवार को हाई-रिस्क-एएमएल (एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग) सूची से बाहर कर दिया। यह परिवर्तन इस अफ्रीकी राष्ट्र के लिए कूटनीतिक और आर्थिक राहत लेकर आया है, लेकिन इसी समय में अमेरिका के साथ उसके संबंधों में तनाव की चर्चा भी बढ़ी है। यह स्थिति नाइजीरिया की बदलती विदेश नीति और वैश्विक राजनीति में उसकी स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
हाल के वर्षों में अमेरिका और नाइजीरिया के रिश्ते पूरी तरह से टूटे नहीं हैं, लेकिन उनमें मतभेद उभरे हैं। 25 दिसंबर 2025 को नाइजीरिया के उन क्षेत्रों पर अमेरिकी विमानों ने बम गिराए थे जो कथित तौर पर आईएसआईएस के प्रभाव में थे और जहां आतंकवादी मौजूद थे। ट्रंप ने नाइजीरिया को बदनाम देश भी कहा था। हालाँकि, नाइजीरिया सरकार ने इन दावों को ‘हकीकत का घोर गलत चित्रण’ बताया। उसकी सुरक्षा एजेंसियां जिहादी और आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ लगातार अभियान चला रही हैं, हालाँकि चुनौतियाँ बेहद गंभीर हैं।
अमेरिका की ओर से नाइजीरिया में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, मानवाधिकारों, चुनावी पारदर्शिता और सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। विशेषकर आतंकवादी संगठन बोको हराम और अन्य सशस्त्र समूहों से निपटने के तरीकों पर वॉशिंगटन कई बार असंतोष जता चुका है। इससे सैन्य सहयोग और हथियार आपूर्ति जैसे मुद्दों पर भी तनाव महसूस हुआ है।
इसके विपरीत, ईयू ने नाइजीरिया के वित्तीय सुधारों और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ उठाए गए कदमों को प्राथमिकता देते हुए उसे हाई-रिस्क-एएमएल लिस्ट से बाहर किया। यह दिखाता है कि यूरोप फिलहाल नाइजीरिया को मुख्य रूप से एक आर्थिक और संस्थागत सुधार करने वाले साझेदार के रूप में देख रहा है, जबकि अमेरिका का ध्यान अधिक राजनीतिक मूल्यों और सुरक्षा नीतियों पर रहा है।
यह अंतर दोनों पश्चिमी शक्तियों की रणनीति को भी उजागर करता है। अमेरिका अक्सर लोकतंत्र और मानवाधिकारों को अपने रिश्तों का केंद्र बनाता है, वहीं ईयू अक्सर संस्थागत सुधार और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिक संकेतक मानता है। नाइजीरिया इस स्थिति में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है—एक तरफ अमेरिका के दबाव को संभालना और दूसरी तरफ यूरोप तथा अन्य साझेदारों के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत करना।
नाइजीरिया की घरेलू राजनीति में भी इसका असर दिखता है। ईयू से मिली मान्यता को सरकार अपनी वैश्विक साख की वापसी के रूप में पेश कर सकती है, वहीं अमेरिका से आलोचना को वह अक्सर आंतरिक मामलों में दखल के रूप में चित्रित करती है। इससे नाइजीरिया की विदेश नीति में रणनीतिक विविधता का रुझान मजबूत होता है, यानी किसी एक शक्ति पर निर्भर न रहने का।
कूटनीतिक रूप से यह स्थिति यह भी बताती है कि अफ्रीकी देश अब सिर्फ अमेरिका या यूरोप की लाइन पर चलने के बजाय अपने हितों के अनुसार अलग-अलग साझेदार चुन रहे हैं। नाइजीरिया के लिए ईयू के साथ बेहतर रिश्ते निवेश और व्यापार के नए रास्ते खोल सकते हैं, जबकि अमेरिका के साथ रिश्तों में आई खटास उसे अपने सुरक्षा और राजनीतिक ढांचे पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर सकती है।