क्या ग्रीनलैंड, जो बर्फ से ढका है और रहने के लिए कठिन है, फिर भी डोनाल्ड ट्रंप को आकर्षित करता है?
सारांश
Key Takeaways
- ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संपदाएँ अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड में रुचि वैश्विक शक्ति संतुलन पर प्रभाव डालेगी।
- ग्रीनलैंड का भविष्य आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण है।
- अमेरिका की ग्रीनलैंड में सैन्य उपस्थिति भी महत्वपूर्ण है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र में बदलाव आ रहे हैं।
नई दिल्ली, 8 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वेनेजुएला के बाद अब ग्रीनलैंड सुर्खियों में है। अमेरिका इस पर अधिकार स्थापित करने की योजना बना रहा है, वह भी ऐसे द्वीप पर जो हमेशा बर्फ से ढका रहता है और मई से जुलाई के अंत तक 24 घंटे रोशनी में रहता है। यहां जीवन कठिन है, फिर भी अमेरिका, विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप, इस पर रुचि दिखा रहे हैं। आखिर इसका कारण क्या है?
ट्रंप की ग्रीनलैंड में रुचि पर विश्व राजनीति में लंबे समय से बहस चल रही है। यह रुचि तब सामने आई जब ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान ग्रीनलैंड को खरीदने की बात की। उस समय कई लोगों ने इसे अजीब माना, लेकिन इसके पीछे ठोस भू-राजनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक कारण हैं, जिन्हें समझना महत्वपूर्ण है।
यह रुचि नई नहीं है। 2019 में, उन्होंने कहा था कि यह एक शानदार रियल एस्टेट सौदा होगा, हालांकि उन्होंने इसे प्राथमिकता नहीं माना। 2025 में दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद, ट्रंप ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह चाहते हैं कि यह विशाल बर्फीला क्षेत्र यूएस का हिस्सा बन जाए।
अब जरा इसके भौगोलिक पहलुओं पर गौर करें। मई से जुलाई के अंत तक, ग्रीनलैंड में 24 घंटे दिन की रोशनी होती है। इसका 80 प्रतिशत हिस्सा 1.6 मील गहरी बर्फ की परत के नीचे है। यहां की आबादी मात्र 60,000 है, जिसमें एक चौथाई लोग राजधानी नुउक में रहते हैं।
ग्रीनलैंड की प्राकृतिक संपदाओं में दुर्लभ खनिजों, तेल और गैस के विशाल भंडार की संभावना है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की 2023 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, यहां चार लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र जिसमें बर्फ नहीं है, 38 खनिजों के हल्के या भारी भंडारों से भरा है। ये सभी आवश्यक मैटेरियल की यूरोपीय लिस्ट में शामिल हैं। रेयर अर्थ मिनरल्स आधुनिक तकनीक और सैन्य उपकरणों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
यह आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, जो आने वाले दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन का नया केंद्र बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के चलते आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं। ऐसे में ग्रीनलैंड पर प्रभाव रखने वाला देश भविष्य के वैश्विक व्यापार और सैन्य गतिविधियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य उपस्थिति रखता है। वहां का पिटुफिक स्पेस बेस, जिसे पहले थुले एयरबेस के नाम से जाना जाता था, अमेरिकी मिसाइल चेतावनी प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ट्रंप प्रशासन मानता रहा है कि ग्रीनलैंड में मजबूत अमेरिकी पकड़ से रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर रखना आसान होगा।
व्हाइट हाउस के अनुसार, "यूएस मिलिट्री का इस्तेमाल इस पर कब्जे का एक विकल्प है।" ट्रंप ने एयर फोर्स वन में कहा था, “अभी, ग्रीनलैंड हर जगह रूसी और चीनी जहाजों से भरा हुआ है। हमें इसकी जरूरत है।”
हालांकि, ग्रीनलैंड की राजनीतिक स्थिति इस विचार को जटिल बनाती है। ग्रीनलैंड एक स्वशासी क्षेत्र है, लेकिन औपचारिक रूप से डेनमार्क के अधीन है। जब ट्रंप ने इसे खरीदने का विचार रखा, तो डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने स्पष्ट रूप से कहा कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। ग्रीनलैंड के लिए यह केवल भूमि नहीं, बल्कि उनकी पहचान और संस्कृति का प्रतीक है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका की ग्रीनलैंड में रुचि नई नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1946 में भी अमेरिका ने डेनमार्क को ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव दिया था, जिसे ठुकरा दिया गया था। यानि ट्रंप की सोच एक लंबे ऐतिहासिक सिलसिले की अगली कड़ी है।
कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड में डोनाल्ड ट्रंप की रुचि किसी सनक या मजाक का मामला नहीं है। इसके पीछे वैश्विक प्रतिस्पर्धा, रणनीतिक सैन्य जरूरतें और भविष्य के संसाधनों पर नियंत्रण की सोच है। भले ही ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार व्यवहार में संभव न हो, लेकिन यह बहस दर्शाती है कि आने वाले समय में ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं।