मध्य-पूर्व का संघर्ष: वैश्विक विकास में बाधा और बढ़ती मुद्रास्फीति
सारांश
Key Takeaways
- मध्य-पूर्व का संघर्ष वैश्विक आर्थिक विकास पर गहरा असर डाल रहा है।
- महंगाई बढ़ने के संकेत स्पष्ट हैं।
- तेल और गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है।
- गरीब देशों को विशेष रूप से अधिक प्रभावित होने का खतरा है।
- आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि भू-राजनीतिक संकट भविष्य के लिए खतरा है।
वाशिंगटन, 15 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध का प्रभाव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने चेताया है कि यह संघर्ष वैश्विक आर्थिक विकास को बाधित कर सकता है और महंगाई को बढ़ा सकता है। ऊर्जा बाजार और व्यापार आपूर्ति में आ रही बाधाओं ने स्थिति को और भी जटिल बना दिया है।
आईएमएफ के उप प्रबंध निदेशक बो ली ने कहा कि वर्तमान स्थिति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को 'असाधारण अनिश्चितता' में डाल दिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अब लगभग सभी संकेत 'उच्च कीमतें और धीमी विकास दर' की ओर इशारा कर रहे हैं।
इस युद्ध का सबसे अधिक प्रभाव मध्य पूर्व और उसके आस-पास के देशों पर पड़ रहा है। बो ली के अनुसार, जो देश सीधे इस संघर्ष से प्रभावित हो रहे हैं, उनकी अर्थव्यवस्था निकट और मध्य अवधि में युद्ध से पहले के स्तर से नीचे ही रहने की संभावना है। उन्होंने बताया कि इसका प्रभाव हर देश पर समान नहीं है बल्कि यह बहुत असमान और विभिन्न तरीकों से प्रकट हो रहा है।
तेल निर्यात करने वाले देशों को उत्पादन और आपूर्ति में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, जबकि आयात पर निर्भर देशों में ऊर्जा और खाद्य कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। इससे आम लोगों की खरीद शक्ति में कमी आ रही है और सरकारों के बजट पर दबाव बढ़ रहा है। विशेषकर गरीब और कमजोर देश अधिक प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि वे ईंधन और उर्वरकों के आयात पर निर्भर हैं।
मोहम्मद औरंगजेब ने कहा कि वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करना है। शिपिंग में देरी बढ़ने से लागत भी काफी बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि यदि ईंधन उपलब्ध भी है, तो उसे पहुंचाने की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शुरुआत में सरकार ने लोगों को कीमतों से बचाने की कोशिश की, लेकिन अब वित्तीय दबाव के कारण 'लक्षित सब्सिडी' के साथ पूर्ण कीमत लागू की जा रही है। यह सहायता अब परिवहन, छोटे किसानों और कमजोर वर्गों पर केंद्रित है।
बाजार भी इस संकट का असर दिखा रहे हैं। ब्लैकरॉक के माइक पाइल के अनुसार, शेयर और बॉंड दोनों एक साथ कमजोर हुए हैं। ब्लैकरॉक का अनुमान है कि यह संघर्ष वैश्विक विकास दर को 0.2 प्रतिशत से 0.3 प्रतिशत तक कम कर सकता है। यूरोप पर इसका प्रभाव अधिक होगा, जबकि एशिया में प्रभाव असमान रहेगा। अमेरिका पर इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहने की संभावना है।
ऊर्जा बाजार में भी भारी दबाव है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के टिम गोल्ड के अनुसार, तेल आपूर्ति में प्रतिदिन लगभग 1.3 करोड़ बैरल की कमी आई है, जो 1970 के दशक के तेल संकट से भी दोगुनी है। गैस आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है और आने वाले हफ्तों में स्थिति और बिगड़ सकती है।
आईएमएफ का मानना है कि यह संकट देशों को ऊर्जा के नए स्रोत खोजने और भंडार बढ़ाने के लिए मजबूर करेगा। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा में निवेश भी बढ़ सकता है। हालांकि पिछले वर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई थी, लेकिन आईएमएफ ने चेताया है कि ऐसे भू-राजनीतिक संकट भविष्य के लिए बड़े खतरे बने हुए हैं।