पाकिस्तान में खाद संकट: होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से डीएपी कीमतें 47%25 उछलीं, कृषि पर मंडराया खतरा

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पाकिस्तान में खाद संकट: होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से डीएपी कीमतें 47%25 उछलीं, कृषि पर मंडराया खतरा

सारांश

होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने ने पाकिस्तान की उर्वरक नीति की सबसे बड़ी खामी उजागर कर दी है — यूरिया में आत्मनिर्भरता का दावा करने वाला देश डीएपी के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर है। एक महीने में 47%25 मूल्यवृद्धि और रबी सीजन में 23%25 की बिक्री गिरावट यह बताती है कि यह संकट केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का भी नतीजा है।

Key Takeaways

  • होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से वैश्विक उर्वरक बाज़ार में बड़ा झटका; यूरिया की कीमतें एक महीने में लगभग 47%25 बढ़ीं।
  • पाकिस्तान डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) के लिए लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर; घरेलू उत्पादन केवल 8 लाख टन जबकि मांग 13-23 लाख टन
  • रबी सीजन में डीएपी की बिक्री 23 प्रतिशत गिरी; कीमत 14,000 रुपए प्रति 50 किलो बैग तक पहुँची।
  • पाकिस्तान सरकार हर साल उर्वरक कंपनियों को गैस सब्सिडी में 200 अरब रुपए से अधिक देती रही, फिर भी फॉस्फेट आपूर्ति सुरक्षित नहीं की गई।
  • विशेषज्ञों के अनुसार किसानों द्वारा डीएपी की जगह यूरिया का उपयोग गेहूं, चावल और कपास की फसलों को नुकसान पहुँचा सकता है।

मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच पाकिस्तान एक गंभीर खाद (उर्वरक) संकट की चपेट में आ गया है। 'डेली मिरर' की रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से वैश्विक उर्वरक बाजारों में बड़ा झटका लगा है और यूरिया की कीमतें एक महीने से भी कम समय में लगभग 47 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। इस संकट ने पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था की उन गहरी कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है, जो वर्षों की नीतिगत चूकों का नतीजा हैं।

यूरिया में आत्मनिर्भरता का दावा, डीएपी में पूरी निर्भरता आयात पर

पाकिस्तान लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि वह यूरिया उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भर है। लेकिन इस भू-राजनीतिक संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह फॉस्फेट आधारित उर्वरकों, खासकर डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की उर्वरक नीति घरेलू यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस सब्सिडी पर केंद्रित रही, जिससे नाइट्रोजन आधारित उर्वरक की ज़रूरत देश में ही पूरी होती रही। फॉस्फेट उर्वरकों के लिए ऐसी कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई, जिसके कारण डीएपी पूरी तरह आयात पर निर्भर हो गया।

आपूर्ति की संरचनात्मक कमज़ोरी

डीएपी पाकिस्तान की कुल उर्वरक खपत का लगभग 15 से 18 प्रतिशत हिस्सा है और यह गेहूं, चावल और कपास जैसी प्रमुख फसलों के लिए अनिवार्य है। डीएपी बनाने के लिए रॉक फॉस्फेट की ज़रूरत होती है, जो पाकिस्तान में उपलब्ध नहीं है। देश में इसका उत्पादन मुख्य रूप से फौजी फर्टिलाइजर कंपनी के पोर्ट कासिम स्थित एकमात्र प्लांट में होता है, जो सालाना करीब 8 लाख टन उत्पादन करता है। जबकि देश की कुल मांग 13 लाख से 23 लाख टन के बीच रहती है — यह अंतर ही संकट की जड़ है।

होर्मुज बंद होने का सीधा असर

दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत फॉस्फेट व्यापार होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुज़रता है। इसके बंद होने से आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई और डीएपी की कीमतें तेज़ी से बढ़ गईं। पाकिस्तान अपनी लगभग आधी ज़रूरत मध्य पूर्व से आयात करता है, इसलिए इस रुकावट का सीधा और तत्काल असर देश पर पड़ा है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक दबाव में है।

खेतों तक पहुँचा संकट

इस संकट का असर अब ज़मीन पर दिखने लगा है। रबी सीजन (अक्टूबर से जनवरी) में डीएपी की बिक्री 23 प्रतिशत गिर गई, क्योंकि इसकी कीमत बढ़कर लगभग ₹14,000 प्रति 50 किलो बैग (पाकिस्तानी रुपये में) तक पहुँच गई। महंगे दामों के कारण कई किसान डीएपी का इस्तेमाल कम कर रहे हैं या उसकी जगह यूरिया का उपयोग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विकल्प कृषि की दृष्टि से उचित नहीं है और इससे फसल उत्पादन को नुकसान हो सकता है।

नीतिगत विफलता और आलोचकों की राय

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल बाहरी परिस्थितियों की देन नहीं है, बल्कि यह वर्षों की नीतिगत गलतियों का भी परिणाम है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान सरकार हर साल उर्वरक कंपनियों को गैस सब्सिडी के रूप में 200 अरब रुपए से अधिक देती रही, लेकिन फॉस्फेट उत्पादन बढ़ाने या वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था विकसित करने पर ध्यान नहीं दिया गया। आलोचकों का कहना है कि इस सब्सिडी से उद्योग को लाभ तो हुआ, परंतु उर्वरक आपूर्ति की मूल संरचनात्मक कमज़ोरी को दूर नहीं किया गया। आने वाले खरीफ सीजन से पहले यदि आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो पाकिस्तान की खाद्य सुरक्षा पर और गहरा संकट मंडरा सकता है।

Point of View

हर भू-राजनीतिक उथलपुथल उसकी खाद्य सुरक्षा को सीधे चुनौती देती रहेगी।
NationPress
28/04/2026

Frequently Asked Questions

पाकिस्तान में खाद संकट क्यों आया है?
'डेली मिरर' की रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से वैश्विक फॉस्फेट व्यापार बाधित हुआ है, जिससे डीएपी की आपूर्ति रुकी और कीमतें तेज़ी से बढ़ीं। पाकिस्तान अपनी डीएपी ज़रूरत का लगभग आधा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है, इसलिए यह रुकावट सीधे देश पर असर डाल रही है।
डीएपी उर्वरक की कीमत पाकिस्तान में कितनी बढ़ी है?
रिपोर्ट के अनुसार, यूरिया की कीमतें एक महीने से भी कम समय में लगभग 47 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं और डीएपी की कीमत लगभग 14,000 रुपए प्रति 50 किलो बैग तक पहुँच गई है। इस मूल्यवृद्धि के कारण रबी सीजन में डीएपी की बिक्री 23 प्रतिशत गिर गई है।
पाकिस्तान डीएपी उत्पादन में आत्मनिर्भर क्यों नहीं है?
डीएपी बनाने के लिए रॉक फॉस्फेट की ज़रूरत होती है, जो पाकिस्तान में उपलब्ध नहीं है। देश में केवल फौजी फर्टिलाइजर कंपनी का पोर्ट कासिम प्लांट डीएपी बनाता है, जो सालाना करीब 8 लाख टन उत्पादन करता है, जबकि देश की माँग 13 से 23 लाख टन के बीच है।
इस संकट का पाकिस्तानी किसानों पर क्या असर पड़ रहा है?
महंगे दामों के कारण किसान डीएपी का उपयोग कम कर रहे हैं या उसकी जगह यूरिया इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विकल्प गेहूं, चावल और कपास जैसी प्रमुख फसलों के लिए उचित नहीं है और इससे उत्पादन को नुकसान हो सकता है।
पाकिस्तान सरकार उर्वरक क्षेत्र पर कितनी सब्सिडी देती है?
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान सरकार हर साल उर्वरक कंपनियों को गैस सब्सिडी के रूप में 200 अरब रुपए से अधिक देती रही है। आलोचकों का कहना है कि इस भारी सब्सिडी के बावजूद फॉस्फेट उत्पादन बढ़ाने या वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया।
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