ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियों से अमेरिका में नवाचार को हो रहा है नुकसान: विवेक वाधवा
सारांश
Key Takeaways
- ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियां अमेरिका में नवाचार को प्रभावित कर रही हैं।
- भारत इस स्थिति का लाभ उठा रहा है।
- सिलिकॉन वैली में प्रतिभा की कमी हो रही है।
- एच-1बी वीजा प्रक्रिया में जटिलताएं हैं।
- नवाचार अब वैश्विक स्तर पर हो रहा है।
स्टैनफोर्ड, १८ अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी इमिग्रेशन नीतियों पर चर्चा एक बार फिर गर्म हो गई है। सिलिकॉन वैली के इमिग्रेशन विशेषज्ञ विवेक वाधवा का कहना है कि इन नीतियों के कारण अमेरिका अपनी प्रतिभा और नवाचार को खो रहा है, जबकि भारत इसका लाभ उठा रहा है।
सिलिकॉन वैली में लंबे समय से कार्यरत विवेक वाधवा ने राष्ट्र प्रेस को दिए गए इंटरव्यू में बताया कि अमेरिका अब सबसे प्रतिभाशाली लोगों को खुद ही दूर कर रहा है। ये पुरानी इमिग्रेशन नीतियां अमेरिका को गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं।
विवेक वाधवा ने कहा कि वह लंबे समय से अमेरिकी नवाचार में प्रवासियों की भूमिका का अध्ययन कर रहे हैं। पहले सिलिकॉन वैली में लगभग आधे स्टार्टअप्स प्रवासियों द्वारा स्थापित किए जाते थे, लेकिन पिछले एक दशक में यह आंकड़ा घटकर ४० से ४४ प्रतिशत के बीच आ गया है और अब यह संभवतः ३० प्रतिशत या उससे भी कम हो गया है।
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब उन्होंने सिलिकॉन वैली में एक मेडिकल डायग्नोस्टिक कंपनी की स्थापना करने का प्रयास किया, तो उन्हें न तो पर्याप्त प्रतिभा मिली और न ही निवेश।
विवेक वाधवा ने कहा, "यहां मुझे न तो टैलेंट मिला, न ही फंडिंग।" निवेशक ऐसे प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने से हिचकिचा रहे थे जिनका रिसर्च और डेवलपमेंट अमेरिका के बाहर हो रहा था।
इसके बाद, उन्होंने अपनी कंपनी का कार्य भारत में स्थानांतरित कर दिया, जहां उन्होंने आईआईटी मद्रास और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ मिलकर काम किया। उनका दावा है कि वहां एक साल के भीतर ऐसे ब्रेकथ्रू हुए जो अमेरिका में संभव नहीं लगते थे।
विवेक वाधवा ने कहा कि भारत में ऐसे विशेषज्ञों की संख्या अभी भी अच्छी है जो थर्मोडायनामिक्स, प्लाज्मा फिजिक्स, केमिस्ट्री और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग जैसे विषयों में गहरी समझ रखते हैं। इसके विपरीत, उन्होंने अमेरिकी स्टार्टअप इकोसिस्टम में इस तरह की प्रतिभा की कमी की बात कही।
उन्होंने एच-१बी वीजा प्रक्रिया को भी एक बड़ी समस्या बताया। विवेक वाधवा ने कहा कि इस बैकलॉग और जटिल प्रक्रिया के चलते मैं वह टैलेंट अमेरिका नहीं ला सका, जिसकी मुझे जरूरत थी। ग्रीन कार्ड मिलने में लंबा समय भी प्रवासियों के लिए एक बड़ी चिंता है। उन्होंने सवाल उठाया, "लोग हमेशा डर में रहते हैं कि उन्हें कभी भी बाहर किया जा सकता है, ऐसे में कौन यहां आना चाहेगा?"
विवेक वाधवा ने अपने १९८० के दशक के अनुभव की तुलना करते हुए कहा, "जब मैं अमेरिका आया था, तो मुझे १८ महीने में ग्रीन कार्ड मिल गया था। आज यही प्रक्रिया सालों खिंच सकती है।"
उन्होंने चेतावनी दी कि इसका असर केवल इमिग्रेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि नवाचार पर भी पड़ रहा है। नवाचार अब वैश्विक हो चुका है। अगर आप लोगों को रोकेंगे, तो नवाचार भी रुक जाएगा।
विवेक वाधवा की कंपनी अब अपनी तकनीक को पहले भारत में परीक्षण करेगी और उसके बाद ही अमेरिका में लाएगी। यह इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर नवाचार का केंद्र धीरे-धीरे बदल रहा है।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अमेरिका में इमिग्रेशन सुधार और तकनीकी नेतृत्व बनाए रखने में विदेशी प्रतिभाओं की भूमिका पर गहराई से चर्चा चल रही है।