18 अक्टूबर 2026
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रूसी तेल टैरिफ छूट पर ट्रंप के खिलाफ अमेरिकी कांग्रेस में विद्रोह, रिपब्लिकन सीनेटर भी बोले

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रूसी तेल टैरिफ छूट पर ट्रंप के खिलाफ अमेरिकी कांग्रेस में विद्रोह, रिपब्लिकन सीनेटर भी बोले

सारांश

ट्रंप ने रूसी तेल खरीदारों को टैरिफ से छूट दी — और अपनी ही पार्टी के सीनेटर को मजबूर कर दिया दिवंगत लिंडसे ग्राहम का नाम लेने पर। यह फैसला भारत को राहत देता है, लेकिन वाशिंगटन में रूस-नीति को लेकर दरारें और गहरी कर गया है।

मुख्य बातें

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 अक्टूबर 2026 को कार्यकारी आदेश के ज़रिए रूसी तेल खरीदारों पर 100% तक शुल्क लगाया, साथ ही उसे अस्थायी रूप से माफ भी कर दिया।
रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कॉर्निन ने कहा — 'लिंडसे यह देखकर हैरान और दुखी होते'; दिवंगत लिंडसे ग्राहम का जुलाई 2026 में निधन हुआ था।
भारतीय-अमेरिकी सांसद अमी बेरा और सुहास सुब्रमण्यम ट्रंप के फैसले के सबसे मुखर आलोचकों में रहे।
सीनेट डेमोक्रेटिक नेता डिक डर्बिन ने ट्रंप पर क्रेमलिन के सामने झुकने का आरोप लगाया।
संगठन FIIDS ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि बढ़ती ऊर्जा कीमतों के बीच यह छूट व्यावहारिक है।
भारत सहित रूसी कच्चे तेल के बड़े खरीदार देशों को इस आदेश से अस्थायी राहत मिली है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 16 अक्टूबर 2026 को हस्ताक्षरित एक कार्यकारी आदेश के ज़रिए रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर लगाए गए 100 प्रतिशत तक के शुल्क को अस्थायी रूप से माफ करने के फैसले के विरुद्ध अमेरिकी कांग्रेस में विरोध की लहर उठ खड़ी हुई है। डेमोक्रेट सांसदों के साथ-साथ एक वरिष्ठ रिपब्लिकन सीनेटर ने भी इस निर्णय की आलोचना करते हुए दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम का स्मरण किया। इस आदेश से भारत सहित उन देशों को राहत मिली है, जो रूसी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदार हैं।

कार्यकारी आदेश में क्या है

राष्ट्रपति ट्रंप ने 16 अक्टूबर को जो आदेश जारी किया, उसमें रूसी तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रावधान किया गया। हालाँकि, उसी आदेश में इन शुल्कों को अस्थायी रूप से माफ भी कर दिया गया। इससे भारत जैसे देशों को तात्कालिक राहत मिली, जो रूसी कच्चे तेल के बड़े आयातकों में शामिल हैं।

आलोचकों का कहना है कि यह आदेश एक ओर प्रतिबंध का आभास देता है और दूसरी ओर उसी से छूट देकर रूस की ऊर्जा कमाई पर कोई वास्तविक असर नहीं डालता।

भारतीय-अमेरिकी सांसदों की मुखर आलोचना

कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट सांसद अमी बेरा ने एक्स पर लिखा कि अगर कोई पूछ रहा है कि क्या ट्रंप प्रशासन यूक्रेन का साथ छोड़ रहा है, तो इस फैसले से उसका जवाब साफ मिल जाता है। उन्होंने यह भी कहा, 'मेरे रिपब्लिकन सहयोगियों ने सत्र समाप्त होने से पहले लिंडसे ग्राहम रूस प्रतिबंध विधेयक पास कराने के लिए काफी जोर लगाया था। अब उन्हें खुलकर कहना चाहिए कि अमेरिका रूस का पक्ष नहीं ले रहा।'

वर्जीनिया से डेमोक्रेट सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने कहा, 'ट्रंप वही कर रहे हैं जिसकी हमने चेतावनी दी थी। वह कांग्रेस के अधिकार को कमज़ोर कर रहे हैं, यूक्रेन का साथ छोड़ रहे हैं और पुतिन को जवाबदेही से बचने का मौका दे रहे हैं।'

रिपब्लिकन सीनेटर की चुभती टिप्पणी

टेक्सास से रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कॉर्निन, जो सीनेट इंडिया कॉकस के संस्थापकों में से एक हैं, ने ट्रंप के आदेश पर प्रकाशित एक रिपोर्ट साझा करते हुए सिर्फ एक पंक्ति लिखी — 'लिंडसे यह देखकर हैरान और दुखी होते।' यह संदर्भ उस कानून को लेकर था जिसका नाम दिवंगत रिपब्लिकन नेता लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया था। ग्राहम का जुलाई 2026 में निधन हो गया था।

गौरतलब है कि किसी रिपब्लिकन वरिष्ठ सीनेटर का इस तरह से अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के विदेश नीति फैसले पर सार्वजनिक रूप से असहमति जताना असाधारण माना जा रहा है।

विपक्षी नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया

सीनेट के डेमोक्रेटिक नेता डिक डर्बिन ने कहा, 'राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बार फिर क्रेमलिन के सामने झुकने का रास्ता चुना है। लिंडसे ग्राहम, जॉन मैक्केन और रोनाल्ड रीगन यह देखकर दुखी हो रहे होंगे।' हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के शीर्ष डेमोक्रेट सदस्य ग्रेगरी मीक्स ने तंज कसते हुए कहा कि पुतिन के प्रति लगातार नरम रवैये के कारण ट्रंप को 'नेविल चेम्बरलेन तुष्टिकरण पुरस्कार' मिलना चाहिए।

मैसाचुसेट्स से डेमोक्रेट सांसद जिम मैकगवर्न ने सवाल उठाया कि पुतिन ने ट्रंप से इसके बदले क्या वादा किया है और क्या वह अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश फिर करेंगे।

समर्थन में भी आईं आवाज़ें

सभी प्रतिक्रियाएँ आलोचनात्मक नहीं थीं। अमेरिका स्थित संगठन फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज (FIIDS) ने इस कदम का स्वागत किया। संगठन ने कहा कि यूक्रेन और ईरान से जुड़े संघर्षों के कारण डीजल और ऊर्जा की कीमतें बढ़ रही हैं, ऐसे में तेल आयात शुल्क पर अस्थायी राहत एक व्यावहारिक कदम है। संगठन ने कहा, 'सर्दियाँ नज़दीक हैं। ऐसे में सस्ती ऊर्जा और कूटनीतिक समाधान प्राथमिकता बने रहने चाहिए।'

यह ऐसे समय में आया है जब भारत समेत कई एशियाई देश रूसी तेल पर अपनी निर्भरता को लेकर अमेरिकी दबाव का सामना कर रहे हैं। आने वाले हफ्तों में इस आदेश की समीक्षा और संभावित विधायी कदमों पर सभी की नज़र रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो व्यावहारिक रूप से किसी को भी दंडित नहीं करता। असली अर्थ यह है कि रूस की ऊर्जा आय पर कोई ठोस प्रभाव डाले बिना, ट्रंप ने घरेलू राजनीति में 'कठोर रुख' का आभास तैयार किया है। जॉन कॉर्निन जैसे वरिष्ठ रिपब्लिकन का सार्वजनिक असंतोष इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर रूस-नीति पर गहरी दरार है जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है। भारत के लिए यह अल्पकालिक राहत है, लेकिन जब भी वाशिंगटन में यह नीति पलटे, नई दिल्ली को जवाब देने के लिए तैयार रहना होगा।
RashtraPress
18 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ट्रंप के रूसी तेल टैरिफ आदेश में क्या है?
राष्ट्रपति ट्रंप ने 16 अक्टूबर 2026 को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसमें रूसी तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रावधान है। हालाँकि, उसी आदेश में इन शुल्कों को अस्थायी रूप से माफ भी कर दिया गया, जिससे भारत जैसे देशों को फिलहाल राहत मिली है।
लिंडसे ग्राहम का इस विवाद से क्या संबंध है?
जिस प्रतिबंध विधेयक की चर्चा हो रही है, उसका नाम दिवंगत रिपब्लिकन नेता लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया था, जिनका जुलाई 2026 में निधन हो गया था। रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कॉर्निन ने ट्रंप के आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा कि 'लिंडसे यह देखकर हैरान और दुखी होते।'
इस फैसले पर भारतीय-अमेरिकी सांसदों ने क्या कहा?
कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट सांसद अमी बेरा और वर्जीनिया से सुहास सुब्रमण्यम इस फैसले के सबसे मुखर आलोचकों में रहे। बेरा ने एक्स पर लिखा कि इस फैसले से साफ हो जाता है कि ट्रंप प्रशासन यूक्रेन का साथ छोड़ रहा है, जबकि सुब्रमण्यम ने कहा कि ट्रंप कांग्रेस के अधिकार को कमज़ोर कर रहे हैं।
क्या इस आदेश का भारत पर कोई असर पड़ेगा?
फिलहाल भारत को राहत मिली है, क्योंकि शुल्क को अस्थायी रूप से माफ किया गया है। भारत रूसी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदारों में शामिल है, इसलिए यदि यह छूट हटाई गई तो भारत की ऊर्जा लागत पर सीधा असर पड़ सकता है।
क्या ट्रंप के इस फैसले का कोई समर्थन भी हुआ?
हाँ, अमेरिका स्थित संगठन फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज (FIIDS) ने इस कदम का स्वागत किया। संगठन ने तर्क दिया कि बढ़ती ऊर्जा कीमतों और सर्दियों की नज़दीकी को देखते हुए यह अस्थायी राहत एक व्यावहारिक कदम है।
राष्ट्र प्रेस
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