दल-बदल पर 'आप' का बड़ा कदम: सात राज्यसभा सांसदों की सदस्यता रद्द कराने के लिए सभापति को पत्र

Click to start listening
दल-बदल पर 'आप' का बड़ा कदम: सात राज्यसभा सांसदों की सदस्यता रद्द कराने के लिए सभापति को पत्र

सारांश

आम आदमी पार्टी ने भाजपा में शामिल हुए सात राज्यसभा सांसदों की सदस्यता रद्द कराने की मांग उठाई है। संजय सिंह सभापति को पत्र लिखेंगे और दसवीं अनुसूची का हवाला देंगे। सौरभ भारद्वाज ने एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया।

Key Takeaways

  • आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने राज्यसभा सभापति को पत्र लिखकर सात सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग का ऐलान किया।
  • इन सात सांसदों ने हाल ही में भाजपा में शामिल होने की घोषणा की, जिसे 'आप' ने असंवैधानिक बताया।
  • संविधान की दसवीं अनुसूची (एंटी डिफेक्शन लॉ) को आधार बनाकर सदस्यता रद्द की मांग की जाएगी।
  • 'आप' नेता सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों के जरिए विपक्ष को तोड़ रही है।
  • दल-बदल विरोधी कानून 1985 में राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में संविधान में जोड़ा गया था।
  • इस मामले पर राज्यसभा सभापति की प्रतिक्रिया और आगामी कार्रवाई भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण नजीर बन सकती है।

नई दिल्ली, 25 अप्रैल: आम आदमी पार्टी (आप) ने उन सात राज्यसभा सांसदों की सदस्यता समाप्त कराने की मांग उठाई है, जिन्होंने हाल ही में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने की घोषणा की है। 'आप' के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने ऐलान किया है कि वे राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर संविधान की दसवीं अनुसूची (एंटी डिफेक्शन लॉ) के तहत इन सांसदों की सदस्यता रद्द करने की विधिवत मांग करेंगे। यह मामला भारतीय राजनीति में दल-बदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।

संजय सिंह का आरोप — दल-बदल असंवैधानिक

संजय सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इन सांसदों का भाजपा में शामिल होना पूरी तरह असंवैधानिक, गैर-कानूनी और संसदीय मर्यादाओं के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत किसी भी रूप में दल-बदल को वैधता नहीं दी जा सकती — चाहे यह दो-तिहाई बहुमत के आधार पर ही क्यों न किया गया हो।

उन्होंने कहा कि वे अपने पत्र में सभी संबंधित नियमों और कानूनी प्रावधानों का विस्तृत उल्लेख करेंगे, ताकि सभापति इन सातों सांसदों की सदस्यता रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर सकें। उनके अनुसार यह कदम लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं पर सीधा प्रहार है।

सौरभ भारद्वाज का भाजपा पर तीखा हमला

'आप' नेता सौरभ भारद्वाज ने भी इस मुद्दे पर भाजपा को घेरा। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी का आधार आम कार्यकर्ता हैं और कुछ नेताओं के पार्टी छोड़ने से संगठन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

भारद्वाज ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार विभिन्न जांच एजेंसियों का इस्तेमाल कर विपक्षी दलों को कमजोर करने की सुनियोजित रणनीति पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि जिन नेताओं पर पहले एजेंसियों की कार्रवाई होती है, वही भाजपा में जाने के बाद 'स्वच्छ' करार दे दिए जाते हैं — यह विरोधाभास खुद ही सब कुछ बयान करता है।

कार्यकर्ताओं से अपील और पार्टी की स्थिति

सौरभ भारद्वाज ने माना कि मौजूदा दबाव भरे माहौल में कई नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, लेकिन जमीनी कार्यकर्ता अभी भी डटे हुए हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि वे अपना हौसला बनाए रखें और सरकार से सवाल पूछना जारी रखें।

उन्होंने कहा कि भाजपा आलोचना से बचने के लिए विपक्ष को तोड़ने की नीति अपना रही है, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

दसवीं अनुसूची और ऐतिहासिक संदर्भ

गौरतलब है कि दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) को 1985 में राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में संविधान में जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता और 'आया राम-गया राम' की संस्कृति पर अंकुश लगाना था। बाद में 2003 में इसमें संशोधन कर विलय की शर्तें और कड़ी की गईं।

विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यसभा में दल-बदल के मामले अपेक्षाकृत कम आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो संवैधानिक व्याख्या की जटिलता के कारण मामले लंबे खिंचते हैं। सभापति का निर्णय ही इस मामले में अंतिम होता है, जिसे बाद में न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि 'आप' स्वयं कई राज्यों में चुनावी चुनौतियों और आंतरिक उथल-पुथल से गुजर रही है। ऐसे में यह कदम पार्टी के लिए न केवल कानूनी लड़ाई है, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है कि वह अपने सांसदों के 'पलायन' को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी।

आने वाले दिनों में राज्यसभा सभापति की प्रतिक्रिया और इस याचिका पर होने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि दल-बदल विरोधी कानून की व्याख्या किस दिशा में जाती है। यह मामला भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है।

Point of View

बल्कि एक राजनीतिक संदेश है — कि पार्टी अपने 'पलायन' को मूक स्वीकृति नहीं देगी। विडंबना यह है कि जिस दल-बदल विरोधी कानून का हवाला दिया जा रहा है, उसकी व्याख्या दशकों से विवादित रही है और सभापति का पद अक्सर सत्तारूढ़ दल के प्रभाव से मुक्त नहीं रहा। असली सवाल यह है कि क्या एंटी डिफेक्शन लॉ उस उद्देश्य की पूर्ति कर पा रहा है जिसके लिए 1985 में इसे बनाया गया था, या यह भी राजनीतिक हथियार बन चुका है? मुख्यधारा की कवरेज इस संरचनात्मक प्रश्न से बचती है।
NationPress
26/04/2026

Frequently Asked Questions

आम आदमी पार्टी सात राज्यसभा सांसदों की सदस्यता क्यों रद्द कराना चाहती है?
इन सात सांसदों ने 'आप' छोड़कर भाजपा में शामिल होने की घोषणा की है। 'आप' का कहना है कि यह दल-बदल संविधान की दसवीं अनुसूची का उल्लंघन है, इसलिए उनकी सदस्यता रद्द होनी चाहिए।
दसवीं अनुसूची या एंटी डिफेक्शन लॉ क्या है?
दसवीं अनुसूची 1985 में संविधान में जोड़ी गई थी, जो किसी सांसद या विधायक को अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होने पर उनकी सदस्यता रद्द करने का प्रावधान देती है। इसका उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता रोकना था।
संजय सिंह राज्यसभा सभापति को पत्र में क्या मांग करेंगे?
संजय सिंह सभापति को पत्र लिखकर दसवीं अनुसूची सहित सभी संबंधित कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए भाजपा में शामिल सातों सांसदों की राज्यसभा सदस्यता रद्द करने की मांग करेंगे।
सौरभ भारद्वाज ने भाजपा पर क्या आरोप लगाए?
सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर विपक्षी दलों को कमजोर कर रही है। उन्होंने कहा कि जिन नेताओं पर पहले कार्रवाई होती है, वे भाजपा में जाने के बाद 'स्वच्छ' हो जाते हैं।
क्या राज्यसभा सभापति दल-बदल पर सदस्यता रद्द कर सकते हैं?
हां, दसवीं अनुसूची के तहत राज्यसभा सभापति को दल-बदल के मामलों में सदस्यता रद्द करने का अधिकार है। उनके निर्णय को बाद में उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
Nation Press