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क्या आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी और भगवान शिव का दिन खास है?

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क्या आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी और भगवान शिव का दिन खास है?

सारांश

आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी, जिसे प्रदोष कहा जाता है, इस बार विशेष है क्योंकि यह सोमवार को पड़ रहा है। जानें इस दिन के महत्व और पूजा विधि के बारे में।

मुख्य बातें

प्रदोष का दिन भगवान शिव की आराधना का विशेष अवसर है।
सोमवार और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग इस दिन को और भी खास बनाता है।
मानसिक और धन संबंधी समस्याओं का समाधान भगवान शिव की पूजा से हो सकता है।
सफेद वस्तुओं का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
गरीबों को दान करना व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

नई दिल्ली, 22 जून (राष्ट्र प्रेस)। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि, जिसे भोलेनाथ का प्रिय दिन प्रदोष कहा जाता है, इस बार विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह दिन सोमवार के साथ मेल खा रहा है। इस दिन आर्द्रा नक्षत्र के साथ धृति और शूल का निर्माण हो रहा है। चंद्रमा वृषभ राशि में और सूर्य मिथुन राशि में स्थित रहेंगे।

पंचांग के अनुसार, इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:55 से 12:51 तक रहेगा और राहुकाल सुबह 07:09 से 08:54 तक रहेगा। यह तिथि भगवान शिव को समर्पित है और इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है।

सर्वार्थ सिद्धि योग तब बनता है जब कोई विशेष नक्षत्र किसी विशेष दिन के साथ आता है। मान्यता है कि इस योग में किए गए कार्य सफल होते हैं। इसका मुहूर्त 23 जून की दोपहर 03:16 से 24 जून की सुबह 05:25 तक रहेगा।

शिव पुराण के अनुसार, सोमवार का दिन चंद्र देव (सोम) से भी संबंधित है, जिन्होंने भगवान शिव की आराधना से क्षय रोग से मुक्ति पाई। माता पार्वती ने भी भगवान शिव को पति मानने के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखा था। इस दिन पूजा करने से जीवन में सुख और शांति के साथ सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

शिव पुराण में बताया गया है कि धन और मानसिक समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए सोमवार को भगवान शिव को जल अर्पित करना चाहिए और अक्षत (चावल के साबूत दाने) चढ़ाना चाहिए। इसके साथ ही चावल, चीनी और दूध जैसी सफेद वस्तुओं का दान करना चाहिए।

शारीरिक कमजोरी को दूर करने के लिए भी कई धार्मिक उपाय बताए गए हैं। इसमें कहा गया है कि व्यक्ति को शिवलिंग पर जल और घी अर्पित करना चाहिए। आक का फूल, दूर्वा, और बिल्वपत्र अर्पित करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके मंदिर या पूजा स्थल को साफ करें और गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। एक चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाकर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें, गंगाजल से अभिषेक करें और बिल्वपत्र, चंदन, अक्षत, फल और फूल चढ़ाएं। ध्यान रखें कि एकादशी के दिन भगवान शिव को अक्षत नहीं चढ़ाना चाहिए।

भोलेनाथ की पूजा के साथ माता पार्वती की पूजा भी करनी चाहिए और उन्हें सोलह श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करनी चाहिए।

शिव पुराण में उल्लेखित है कि प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। व्रती को सूर्यास्त से पहले स्नान करके भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए।

इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करें, व्रत का संकल्प लें और सोमवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें। अंत में दीपक जलाकर भगवान शिव की आरती करें और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें। व्रत के बाद गरीबों और जरूरतमंदों को दान करना न भूलें।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो भक्तों के लिए भगवान शिव की आराधना का एक अद्वितीय मौका प्रदान करता है। इस दिन विशेष योग और तिथियों का संयोग भक्तों को जीवन में सुख और सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी कब है?
यह तिथि 22 जून को है।
इस दिन पूजा के लिए कौन सा मुहूर्त है?
अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:55 से 12:51 तक है।
इस दिन भगवान शिव की पूजा कैसे करनी चाहिए?
पूजा में जल, चंदन, बिल्वपत्र और फल चढ़ाना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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