इलाहाबाद हाईकोर्ट का संभल में सार्वजनिक जमीन पर नमाज की अनुमति से इनकार, याचिका खारिज

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का संभल में सार्वजनिक जमीन पर नमाज की अनुमति से इनकार, याचिका खारिज

सारांश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल की सार्वजनिक 'आबादी जमीन' पर नियमित नमाज की अनुमति देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दान-पत्र के आधार पर मालिकाना दावा सरकारी राजस्व रिकॉर्ड को नहीं बदल सकता और धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक संपत्ति पर अतिक्रमण का अधिकार नहीं देती।

Key Takeaways

इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिवीजन बेंच ने 2 मई 2026 को याचिका खारिज की। विवादित भूमि संभल के इिकोना गांव में 'आबादी जमीन' के रूप में राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। याचिकाकर्ता असीन ने 16 जून 2023 की रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के आधार पर मालिकाना हक का दावा किया था, जिसे कोर्ट ने अमान्य ठहराया। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सार्वजनिक भूमि पर कब्जे की अनुमति नहीं दी जा सकती। उत्तर प्रदेश सरकार ने तर्क दिया कि नियमित सामूहिक नमाज से सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 मई 2026 को उत्तर प्रदेश के संभल जिले में एक सार्वजनिक भूमि पर नियमित नमाज अदा करने की अनुमति देने से स्पष्ट इनकार कर दिया। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सार्वजनिक जमीन पर कब्जे की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मामले का पृष्ठभूमि और याचिका

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिवीजन बेंच ने असीन नामक याचिकाकर्ता की रिट याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया। असीन ने दावा किया था कि प्रशासनिक अधिकारी इिकोना गांव, संभल में एक भूखंड पर नमाज अदा करने से उन्हें और अन्य नमाजियों को रोक रहे हैं।

याचिकाकर्ता ने 16 जून 2023 की एक रजिस्टर्ड 'गिफ्ट डीड' (दान-पत्र) के आधार पर उस जमीन पर अपना मालिकाना हक जताया। उसने तर्क दिया कि यह रुकावट मनमानी है और कुछ सामाजिक तत्वों के साथ मिलीभगत का परिणाम है, जो संविधान के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष

उत्तर प्रदेश सरकार ने याचिका का कड़ा विरोध किया। सरकार ने न्यायालय को बताया कि विचाराधीन भूमि राजस्व अभिलेखों में 'आबादी जमीन' के रूप में दर्ज है, जो सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता किसी भी प्रकार से अपना मालिकाना हक सिद्ध करने में विफल रहा है।

सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि उस भूखंड पर परंपरागत रूप से केवल ईद जैसे विशेष अवसरों पर ही नमाज अदा की जाती रही है। याचिकाकर्ता अब बाहरी लोगों को शामिल करके नियमित सामूहिक नमाज आयोजित करने का प्रयास कर रहा है, जिससे गांव में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका है।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से उस जमीन को सार्वजनिक भूमि के रूप में दर्शाते हैं। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि दान-पत्र के आधार पर किया गया मालिकाना हक का दावा सरकारी अभिलेखों को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।

गौरतलब है कि यह फैसला ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक गतिविधियों को लेकर कई विवाद सामने आए हैं। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है और इसे सार्वजनिक संपत्ति पर अतिक्रमण के रूप में नहीं भुनाया जा सकता।

आगे क्या होगा

याचिका खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता के पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील का विकल्प खुला है। इस फैसले से संभल और आसपास के क्षेत्रों में सार्वजनिक भूमि के धार्मिक उपयोग से जुड़े अन्य विवादों पर भी असर पड़ सकता है।

Point of View

जिस पर उत्तर प्रदेश के न्यायालय बार-बार निर्णय देते रहे हैं। दान-पत्र के आधार पर आबादी जमीन पर दावा करना एक कानूनी रणनीति के रूप में उभर रहा है, जिसे इस फैसले ने स्पष्ट रूप से खारिज किया है। हालांकि, यह सवाल अनुत्तरित रहता है कि विशेष अवसरों पर नमाज की अनुमति और नियमित नमाज के बीच की सीमा-रेखा कानूनी रूप से कैसे परिभाषित की जाएगी। ऐसे मामलों में स्पष्ट नीतिगत ढाँचे की अनुपस्थिति में, न्यायालयों पर मामला-दर-मामला निर्णय का बोझ बढ़ता जा रहा है।
NationPress
02/05/2026

Frequently Asked Questions

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल में नमाज की याचिका क्यों खारिज की?
कोर्ट ने पाया कि विवादित जमीन राजस्व रिकॉर्ड में 'आबादी जमीन' यानी सार्वजनिक उपयोग की भूमि के रूप में दर्ज है। याचिकाकर्ता का गिफ्ट डीड आधारित मालिकाना दावा सरकारी अभिलेखों को नहीं बदल सकता, इसलिए याचिका खारिज कर दी गई।
'आबादी जमीन' क्या होती है और इसका क्या महत्व है?
'आबादी जमीन' राजस्व अभिलेखों में दर्ज वह सार्वजनिक भूमि होती है जो ग्रामीण बस्तियों के सामूहिक उपयोग के लिए आरक्षित होती है। इस पर कोई व्यक्ति या संस्था निजी मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकती, चाहे उसके पास दान-पत्र ही क्यों न हो।
याचिकाकर्ता असीन ने क्या दावा किया था?
असीन ने 16 जून 2023 की रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के आधार पर संभल के इिकोना गांव की एक जमीन पर मालिकाना हक का दावा किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारी उन्हें और अन्य नमाजियों को वहाँ नमाज अदा करने से गैर-कानूनी रूप से रोक रहे हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में क्या तर्क दिए?
सरकार ने कहा कि जमीन सार्वजनिक है और उस पर परंपरागत रूप से केवल ईद जैसे विशेष अवसरों पर नमाज होती रही है। सरकार ने यह भी चेताया कि बाहरी लोगों को शामिल कर नियमित सामूहिक नमाज शुरू करने से गांव का सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है।
इस फैसले के बाद याचिकाकर्ता के पास क्या विकल्प हैं?
याचिका खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर सकता है। हाईकोर्ट के इस फैसले का असर उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक भूमि के धार्मिक उपयोग से जुड़े अन्य मामलों पर भी पड़ सकता है।
Nation Press