नक्सलवाद से मुक्ति: 31 मार्च 2026 को इतिहास बना, 3,600 जवानों के बलिदान को अमित शाह का नमन
सारांश
मुख्य बातें
गृह मंत्री अमित शाह ने 21 अक्टूबर 2026 को पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित राष्ट्रीय पुलिस स्मारक पर शहीद पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए घोषणा की कि 31 मार्च 2026 को भारत ने दशकों पुरानी नक्सलवाद की समस्या से पूर्ण मुक्ति प्राप्त कर ली। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक उपलब्धि 3,600 से अधिक शहीद जवानों के सर्वोच्च बलिदान की नींव पर खड़ी है।
नक्सलवाद से मुक्ति का ऐतिहासिक सफर
शाह ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1981 से लेकर मार्च 2026 तक भारत ने नक्सली चुनौती का सामना किया — यानी लगभग पाँच दशक लंबा संघर्ष। इस अवधि में 3,600 से अधिक जवान शहीद हुए और देश के करीब 13,700 निर्दोष नागरिक भी मारे गए। उन्होंने कहा, 'पाँच दशक पुरानी इस समस्या से मुक्ति पाकर यदि आज देश विकास के रास्ते पर आगे बढ़ा है, तो इसकी नींव में 3,600 जवानों का बलिदान है।' गृह मंत्री ने शहीदों के परिजनों को आश्वस्त किया कि पूरा देश उनके त्याग के प्रति कृतज्ञ है।
पुलिस स्मृति दिवस का इतिहास और महत्व
शाह ने उपस्थित लोगों को 21 अक्टूबर 1965 की उस घटना की याद दिलाई जब लद्दाख के दुर्गम हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के दस जवानों ने चीनी सेना के हमले का डटकर सामना करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। उन्होंने कहा कि उन अमर सपूतों ने दुर्गम पहाड़ियों पर संघर्ष की विकट परिस्थितियों में भी देश की एक इंच भूमि भी दुश्मन के हाथों में न जाने देने का संकल्प निभाया। तभी से 21 अक्टूबर को प्रतिवर्ष पुलिस स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।
राष्ट्रीय पुलिस स्मारक और नए शहीदों का सम्मान
गृह मंत्री ने बताया कि वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी स्थान पर देशभर के शहीद पुलिसकर्मियों को समर्पित राष्ट्रीय पुलिस स्मारक का उद्घाटन किया था। इस स्मारक पर अब तक 36,852 पुलिसकर्मियों के नाम अंकित हैं। इस वर्ष 154 और वीर पुलिसकर्मियों के नाम इस सूची में जोड़े गए हैं। आईबी प्रमुख महेश ने इन शहीदों के नाम पढ़कर उन्हें औपचारिक श्रद्धांजलि दी।
राष्ट्र की नींव में जवानों का बलिदान
शाह ने अपने संबोधन में कहा कि आज़ादी के लगभग आठ दशकों में भारत विश्व में एक सम्मानजनक स्थान पर खड़ा है और इसकी नींव में वीर जवानों का बलिदान है। उन्होंने कहा, 'कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि आंतरिक सुरक्षा और देश की सीमाओं की रक्षा के लिए यदि इन जवानों ने अपना सर्वोच्च बलिदान नहीं दिया होता, तो आज हम कहाँ खड़े होते।' यह आयोजन ऐसे समय में आया है जब नक्सलवाद के खात्मे के बाद सुरक्षा बलों की भूमिका और उनके योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर नए सिरे से सराहना हो रही है।