अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस 1 मई: हेमार्केट से चेन्नई तक, श्रमिक अधिकारों की ऐतिहासिक लड़ाई की कहानी
सारांश
Key Takeaways
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस हर साल 1 मई को दुनिया भर के श्रमिकों के सामाजिक और आर्थिक योगदान को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। यह दिन केवल एक सार्वजनिक अवकाश नहीं, बल्कि उन लाखों मेहनतकश हाथों के संघर्ष, बलिदान और अधिकारों की याद दिलाने वाला ऐतिहासिक पड़ाव है, जिन्होंने आधुनिक श्रम कानूनों की नींव रखी।
19वीं शताब्दी का श्रमिक आंदोलन और इसकी पृष्ठभूमि
इस दिवस की जड़ें 19वीं शताब्दी के अंत में अमेरिका के औद्योगिक युग में हैं। उस दौर में कारखानों में मजदूरों से 12 से 16 घंटे तक काम लिया जाता था, जो शारीरिक और मानसिक रूप से अत्यंत कठिन था। इन परिस्थितियों से तंग आकर श्रमिकों ने आठ घंटे के कार्यदिवस की माँग को लेकर संगठित आंदोलन शुरू किए। यह माँग उस समय क्रांतिकारी मानी जाती थी।
हेमार्केट अफेयर: वह घटना जिसने दुनिया बदल दी
1 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो शहर में हजारों मजदूरों ने आठ घंटे काम की माँग को लेकर ऐतिहासिक हड़ताल की। इसके कुछ दिनों बाद 4 मई 1886 को हेमार्केट स्क्वायर में आयोजित एक सभा के दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी। एक बम विस्फोट हुआ और पुलिस की गोलीबारी में कई मजदूर तथा पुलिसकर्मी मारे गए।
इस घटना को हेमार्केट अफेयर के नाम से जाना जाता है। गौरतलब है कि इस कांड ने पूरी दुनिया में मजदूर अधिकारों की लड़ाई को एक नई दिशा और ऊर्जा दी। यह ऐसे समय में आया जब औद्योगिक क्रांति अपने चरम पर थी और श्रमिक शोषण एक सामान्य व्यवहार बन चुका था।
1 मई को अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करने का फैसला
1889 में पेरिस में हुई समाजवादी दलों की अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस — जिसे सेकेंड इंटरनेशनल भी कहा जाता है — ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव के तहत 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य आठ घंटे के कार्यदिवस का अधिकार सुनिश्चित करना था। 1890 से यह दिन दुनिया के अनेक देशों में धूमधाम से मनाया जाने लगा।
भारत में मजदूर दिवस का इतिहास
भारत में पहली बार मजदूर दिवस 1 मई 1923 को चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) में मनाया गया। कम्युनिस्ट नेता मलयापुरम सिंगारवेलु चेट्टियार ने हिंदुस्तान मजदूर किसान पार्टी की ओर से इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। इसी अवसर पर लाल झंडा पहली बार भारत में फहराया गया — जो श्रमिक एकजुटता का प्रतीक बना।
सिंगारवेलु चेट्टियार ने सरकार से इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की माँग भी की थी। भारत में यह दिन अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस, कामगार दिवस और मजदूर दिवस जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है।
आज के दौर में मजदूर दिवस की प्रासंगिकता
चीन, क्यूबा समेत दुनिया के अधिकांश देशों में 1 मई को मजदूरों के अधिकारों, एकजुटता और उनकी उपलब्धियों का जश्न मनाया जाता है। आज के दौर में भी यह दिन श्रमिकों की समस्याओं, शोषण के विरुद्ध संघर्ष और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की आवश्यकता की याद दिलाता है। गिग इकॉनमी, अनौपचारिक रोजगार और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की चुनौतियाँ इस दिवस को आज भी उतना ही प्रासंगिक बनाती हैं जितना यह 1886 में था।