अनुराग ठाकुर ने कांग्रेस के महिला विरोधी चेहरे को किया उजागर
सारांश
Key Takeaways
- महिला शक्ति वंदन अधिनियम का विरोध करना कांग्रेस की नीति को उजागर करता है।
- अनुराग ठाकुर ने महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन बताया।
- आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
- विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण के लिए चार बार मौका गंवाया।
- महिला आरक्षण के लिए परिसीमन और जनगणना आवश्यक है।
लखनऊ, 20 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में महिला शक्ति वंदन अधिनियम के गिरने पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि इस कदम से कांग्रेस ने देश की आधी आबादी के खिलाफ एक मोर्चा खोल दिया है। इसके साथ ही, कांग्रेस, डीएमके, सपा और टीएमसी का महिला विरोधी चेहरा भी उजागर हुआ है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं को आरक्षण देने का यह एक सोने का मौका था। इससे न केवल महिलाओं को आरक्षण मिलता, बल्कि लोकसभा में सीटों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती। इसके अतिरिक्त, सामान्य वर्ग की सीटों में भी इजाफा होता। 1971 की जनसंख्या के अनुसार, यह निर्धारित किया गया था कि लोकसभा में 550 सीटें हो सकती हैं। तब जनसंख्या 54 करोड़ थी और आज यह 140 करोड़ तक पहुँच गई है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या सीटों में वृद्धि होनी चाहिए या नहीं? क्या महिलाओं को उनका हक मिलना चाहिए या नहीं?
अनुराग ठाकुर ने आगे कहा कि ऐसा करके हम महिलाओं पर किसी प्रकार का एहसान नहीं कर रहे थे। कांग्रेस ने ऐसा करके शाहबानोमोदी सरकार ने ही प्रदान की। इसके बाद इन लोगों के मन में यह डर बैठ गया कि अगर मोदी सरकार महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दे देंगी तो पूरा श्रेय केंद्र सरकार को मिलेगा और विपक्षी दलों के हाथ कुछ नहीं रहेगा। हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी इस बात को स्पष्ट कर चुके थे कि सारा श्रेय आप ले लें, लेकिन मेरी माताओं-बहनों को 33 प्रतिशत आरक्षण दे दें।
अनुराग ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस के पास पहली बार इसका समर्थन करने का मौका था, लेकिन अफसोस कि इन्होंने इसके विरोध में मतदान किया। इससे पहले अटल जीदफनाने का काम किया। देवगौड़ा जी 1996 में यह बिल लेकर आए थे, तब इसे गीता मुखर्जी
उन्होंने कहा कि हमने यूपीएमहिला विरोधी चेहरा उजागर हो गया है। इन लोगों के पास महिला आरक्षण बिल पास करने का चार बार मौका था, लेकिन इन्होंने ऐसा नहीं किया।
भाजपा नेता ने कहा कि परिवारवादी पार्टियों को किसी प्रकार के आरक्षण की जरूरत नहीं है, चाहे वह समाजवादी पार्टी हो या कांग्रेस। इन सबके घरों की महिलाओं को चुनाव लड़ा दें, इन्हें तो सीट मिल ही जाएगी, लेकिन सामान्य महिलाओं के लिए आरक्षण की आवश्यकता थी, जो इन्होंने नहीं होने दी।
उन्होंने कहा कि 2010 में भी समाजवादी पार्टी और आरजेडी अड़े रहे, लेकिन कांग्रेस उस समय बिल लेकर नहीं आई। आज बड़ा सवाल यही है कि ये सभी दल महिला विरोधी क्यों बन गए? क्या महिला आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन जरूरी नहीं है? क्या इसके लिए जनगणना होना आवश्यक है? इन लोगों ने कहा कि जातिगत जनगणना कराना होगा, तो हमने जातिगत जनगणना करानी शुरू कर दी। हमने कहा कि 2029 में ही महिला आरक्षण दीजिए, इसलिए यह बिल लाया गया। हमने कहा कि सीटें 550 से बढ़ाकर 850 कर दी जाएं। पाक अधिकृत कश्मीर जब भारत का हिस्सा बनेगा, तो हमने कहा कि वहां की महिलाओं को भी आरक्षण मिलना चाहिए, इसलिए उसका प्रावधान भी इस बिल में किया गया, लेकिन इन सबके खिलाफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस रही।