यादों में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय: वो अधिकारी जिसने अंग्रेजों की सेवा में बगावत की रचना की
सारांश
Key Takeaways
- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 26 जून 1838 को हुआ था।
- उन्होंने 'वंदे मातरम' के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- उनका जीवन कला और साहित्य के माध्यम से बगावत का प्रतीक है।
- बंकिम ने अंग्रेजी से अपनी लेखनी की शुरुआत की थी।
- उनकी रचनाएँ बंगाली साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
नई दिल्ली, 7 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। साहित्य सम्राट बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत को 'वंदे मातरम' का ऐसा मंत्र दिया है जिसने स्वतंत्रता संग्राम की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। 26 जून 1838 को पश्चिम बंगाल के नैहाटी के निकट कांठलपाड़ा में जन्मे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की कहानी खुद में कई विरोधाभास समेटे हुए है। वर्ष 1857 में, जब पूरा उत्तर और मध्य भारत अंग्रेजों के खिलाफ 'सिपाही विद्रोह' की ज्वाला में जल रहा था, तब कलकत्ता में एक अद्भुत शांति का माहौल था। कलकत्ता विश्वविद्यालय अपनी पहली डिग्री परीक्षाएं आयोजित कर रहा था। बंदूकों की गूंज के बीच बंकिम अपने अध्ययन में व्यस्त थे और वे इतिहास के पहले दो स्नातकों में से एक बने।
उनकी प्रतिभा को देखते हुए अंग्रेजों ने उन्हें मात्र 20 वर्ष की आयु में डिप्टी मजिस्ट्रेट बना दिया। उन्होंने 32 वर्षों तक अंग्रेजों की सेवा की, और उन्हें 'राय बहादुर' का खिताब भी मिला।
यह ध्यान देने योग्य है कि 'राय बहादुर' एक मानद उपाधि थी, जो ब्रिटिश शासन के समय भारत में व्यक्तियों को उनकी उत्कृष्ट सेवा के लिए दी जाती थी।
बाहर से देखने पर वह ब्रिटिश शासन के एक महत्वपूर्ण हिस्से थे, लेकिन एक स्वाभिमानी भारतीय के रूप में उन्हें अंग्रेजों का अहंकार भीतर ही भीतर कचोटता था। उन्होंने बगावत के सीधे रास्ते को चुनने के बजाय 'कलम के रास्ते' को अपनाया।
दिलचस्प है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत अंग्रेजी में की। उनका पहला उपन्यास 'राजमोहन की पत्नी' अंग्रेजी में था। परंतु उन्हें जल्दी ही यह एहसास हुआ कि अगर उन्हें सोई हुई जनता को जगाना है, तो अपनी भाषा में संवाद करना होगा।
1865 में उन्होंने 'दुर्गेशनंदिनी' लिखा, जिसने बंगाली साहित्य में जैसे एक भूचाल ला दिया। इसके बाद 'कपालकुंडला', 'विषबृक्ष' और 1872 में शुरू की गई उनकी पत्रिका 'बंगदर्शन' ने बंगाल के बौद्धिक समाज को झकझोर दिया।
उनके जीवन का सबसे बड़ा प्रयास 1882 में आया, जब उन्होंने 'आनंदमठ' का प्रकाशन किया। चूंकि वह एक सरकारी अधिकारी थे, उन्होंने सीधे तौर पर अंग्रेजों को खलनायक नहीं बना सकते थे। उन्होंने कुशलता से 18वीं सदी के 'संन्यासी विद्रोह' को अपनी कहानी का आधार बनाया और उन संन्यासियों को 'संतान' नामक अनुशासित और देशभक्त योद्धाओं में परिवर्तित किया, जो भारत माता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार थे।
इसी उपन्यास में 'वंदे मातरम' का गीत छिपा हुआ था जिसने भारत के भविष्य को बदल दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह गीत उपन्यास के लिखे जाने से पहले, 1870 के दशक में हुगली नदी के किनारे एक शांत शाम को लिखा गया था। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत की मिट्टी को केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि देवी 'भारत माता' के रूप में प्रस्तुत किया।
1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार कांग्रेस के मंच से इस गीत को गाया, लेकिन इसका असली प्रभाव 1905 के 'बंगाल विभाजन' के दौरान देखने को मिला। अंग्रेजों ने इस गीत पर प्रतिबंध लगा दिया और इसे गाने वालों को जेल में डाल दिया। लेकिन इन पाबंदियों ने इस आग को और भड़काया। कलकत्ता की सड़कों से लेकर लंदन के 'इंडिया हाउस' तक, 'वंदे मातरम' क्रांतिकारियों का अजेय युद्धघोष बन गया। 1907 में जर्मनी में भीकाजी कामा द्वारा फहराए गए भारत के पहले विदेशी झंडे पर भी 'वंदे मातरम' लिखा गया था।
आजादी के बाद जब राष्ट्रगान चुनने का समय आया, तो इस गीत के कुछ पदों (जिनमें देवी दुर्गा का उल्लेख था) को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। उस समय की मुस्लिम लीग ने इसका विरोध किया। ऐसे में भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बनाए रखने के लिए संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। तय हुआ कि 'वंदे मातरम' के पहले दो पदों को अपनाया जाएगा और इसे 'जन गण मन' के समकक्ष 'राष्ट्रीय गीत' का दर्जा दिया जाएगा।
ज्ञात हो कि केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में भारत के राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के गायन के लिए आधिकारिक दिशा-निर्देश जारी किए, जिसमें यह निर्धारित किया गया कि सरकारी समारोहों में इसे किस प्रकार और कब प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
8 अप्रैल 1894 को उनका निधन हो गया। उस समय किसी की मृत्यु पर केवल घरों में शोक मनाया जाता था। लेकिन रवींद्रनाथ टैगोर ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के लिए एक विशाल सार्वजनिक शोक सभा का आयोजन किया। यह भारत के इतिहास में पहली बार था जब पूरे देश ने अपने किसी नायक के लिए एक साथ आंसू बहाए।