क्या बसंत पंचमी पर वृंदावन के इस मंदिर में खुलता है रहस्यमयी कमरा?
सारांश
Key Takeaways
- बसंत पंचमी पर विशेष आयोजन होते हैं।
- शाहजी मंदिर में 'बसंती कमरा' हर साल एक बार खुलता है।
- मंदिर को बेल्जियम के झूमरों से सजाया गया है।
- राधारमण जी को 56 भोज अर्पित किए जाते हैं।
- मंदिर की अद्भुत बनावट एक आकर्षण का केंद्र है।
नई दिल्ली, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत में 23 जनवरी को बसंत पंचमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाएगा, विशेषकर ब्रज मंडल के क्षेत्रों में।
बसंत पंचमी के अवसर पर, वृंदावन के एक मंदिर में एक अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है, जहां भक्त विदेशों से आते हैं एक खास कमरे को देखने के लिए। हम बात कर रहे हैं शाहजी मंदिर की, जिसे टेढ़े खंभे के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
शाहजी मंदिर, जो प्रभु राधारमण जी को समर्पित है, अपनी आस्था और विशेष आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है। बसंत पंचमी के दिन यहां विशेष समारोह आयोजित होते हैं, जो अन्य मंदिरों में नहीं मिलते। इस दिन रहस्यमयी कमरे का दरवाजा खोला जाता है, जिसे बसंती कमरा कहा जाता है। यह कमरा पूरे साल में सिर्फ एक दिन, बसंत पंचमी के दिन ही खुलता है।
बसंती कमरे को हर साल एक बार खोला जाता है और इसे पीले रंग, फूलों और रंगीन वस्त्रों से सजाया जाता है। इस अवसर पर, राधारमण जी पहले पीले वस्त्र धारण कर भक्तों को दर्शन देते हैं। इस कमरे का उद्घाटन बसंत ऋतु के स्वागत के लिए किया जाता है, जिसमें प्रभु सृष्टि में खुशियां और उत्साह मनाने का संकेत देते हैं। कमरे को आकर्षक तरीके से सजाया जाता है, जिसमें बेल्जियम से लाए गए झूमर और राधा-कृष्ण की लीलाओं की चित्रण भी शामिल हैं।
कमरे के उद्घाटन के साथ, राधारमण जी को 56 भोज अर्पित किए जाते हैं, जिनमें खास तौर पर पीले व्यंजन शामिल होते हैं।
शाहजी मंदिर की अद्भुत बनावट भी दर्शनीय है। यहां के टेढ़े खंभे भक्तों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनते हैं। खंभों की बनावट किसी सांप के समान है। मंदिर की दीवारों पर जटिल नक्काशी और कला को दर्शाते हुए बेहतरीन चित्रण किए गए हैं। यहां राजस्थानी, इटालियन, और बेल्जियम कला का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।
मंदिर को बेल्जियम के झूमरों से सजाया गया है। यहां एक बड़ा सिंहासन भी रखा है, जिस पर राधारमण जी साल में एक बार सावन के महीने में आने वाली शयनी एकादशी पर विराजमान होते हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु, भगवान शिव को सृष्टि का भार सौंपकर निंद्रा में चले गए हैं। प्रभु को सिंहासन पर बैठाना विश्राम का प्रतीक माना जाता है।