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क्या भीकाजी कामा ने विदेश में तिरंगा लहराकर आजादी की हुंकार नहीं भरी?

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क्या भीकाजी कामा ने विदेश में तिरंगा लहराकर आजादी की हुंकार नहीं भरी?

सारांश

भीकाजी कामा, एक अद्वितीय वीरांगना, जिन्होंने भारतीय तिरंगे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर फहराया। जानिए उनके साहसिक कार्य और स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान।

मुख्य बातें

भीकाजी कामा की कहानी प्रेरणा देती है।
उन्होंने महिलाओं को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
उनका योगदान भारतीय तिरंगे को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण था।
वे एक सशक्त पत्रकार और संपादक भी थीं।
उनकी बहादुरी आज भी हमें प्रेरित करती है।

नई दिल्ली, 12 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक वीरांगनाओं ने अपने साहस और बलिदान से इतिहास के पन्नों को स्वर्णिम बनाया है। इनमें भीकाजी कामा का नाम गर्व से लिया जाता है। उन्होंने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी स्वतंत्रता की अलख जगाई और भारतीय तिरंगे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर गर्व से फहराया।

भीकाजी कामा का जन्म 24 सितंबर, 1861 को मुंबई के एक समृद्ध पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता, सोराबजी फ्रामजी पटेल, एक प्रसिद्ध व्यापारी थे। धनी परिवार में जन्मी भीकाजी को बचपन से ही शिक्षा और संस्कृति का बेहतर वातावरण मिला। उन्होंने फ्रेंच और अंग्रेजी भाषा में महारत हासिल की, जो आगे चलकर उनके क्रांतिकारी कार्यों में बेहद उपयोगी साबित हुई।

उनकी शादी रुस्तम कामा से हुई, जो एक धनी वकील थे, लेकिन वैचारिक मतभेदों के कारण यह रिश्ता ज्यादा सफल नहीं रहा।

भीकाजी का क्रांतिकारी जीवन तब शुरू हुआ, जब वे 1896 में प्लेग महामारी के दौरान पीड़ितों की सेवा में जुट गईं। इस दौरान अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीयों के प्रति उनके भेदभाव को देखकर उनका मन विद्रोह से भर उठा। 1905 में वे स्वास्थ्य कारणों से लंदन चली गईं, लेकिन वहां उनकी मुलाकात दादाभाई नौरोजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे क्रांतिकारियों से हुई, जिन्होंने उनकी सोच को और निखारा। श्यामजी के 'इंडिया हाउस' में वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गईं।

भीकाजी कामा का सबसे ऐतिहासिक योगदान 22 अगस्त, 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट में हुआ, जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत का तिरंगा झंडा फहराया। इस झंडे में हरा, केसरिया और लाल रंग था।

अपने जोशीले भाषण में उन्होंने ब्रिटिश शासन की बर्बरता का खुलासा किया और भारत की आजादी की मांग को विश्व मंच पर रखा। यह वह दौर था जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में था और भीकाजी ने विदेशों में इसे एक नई आवाज दी।

वे 'बंदे मातरम' नामक पत्रिका की संपादक भी रहीं, जो भारतीय स्वतंत्रता के विचारों को फैलाने का एक सशक्त माध्यम बनी। उनके क्रांतिकारी लेख और भाषण ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा बन गए, जिसके कारण उनकी गिरफ्तारी के आदेश जारी हुए। लेकिन भीकाजी ने हार नहीं मानी। वे पेरिस चली गईं और वहां से क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करती रहीं।

1935 में स्वास्थ्य खराब होने के कारण वे भारत लौटीं और 13 अगस्त, 1936 को उनका निधन हो गया। भीकाजी कामा ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी, बल्कि महिलाओं को यह दिखाया कि वे भी देश की आजादी के लिए पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उन्होंने अपने साहस और शक्ति से आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल कायम की। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता की राह में महिलाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भीकाजी कामा कौन थीं?
भीकाजी कामा एक प्रमुख भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने विदेशों में भारतीय तिरंगे को फहराया।
भीकाजी कामा ने कब और कहाँ तिरंगा फहराया?
उन्होंने 22 अगस्त, 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में तिरंगा फहराया।
भीकाजी कामा का योगदान क्या था?
उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी को प्रेरित किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाई।
भीकाजी कामा का विवाह किससे हुआ था?
उनका विवाह रुस्तम कामा से हुआ था, जो एक धनी वकील थे।
भीकाजी कामा का निधन कब हुआ?
उनका निधन 13 अगस्त, 1936 को हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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